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औरंगाबाद से खरीदी गई थीं बम के लिए बैटरियां और पाउडर, जांच में सामने आ सकते हैं और भी नाम

August 13th, 2018 15:02 IST
औरंगाबाद से खरीदी गई थीं बम के लिए बैटरियां और पाउडर, जांच में सामने आ सकते हैं और भी नाम

डिजिटल डेस्क, औरंगाबाद। मुंबई के नालासोपारा परिसर से विस्फोटक सामग्री बरामदगी के मामले में एटीएस दस्ते ने एक और युवक से पूछताछ की है। एटीएस के आने की भनक लगने के बाद एक युवक फरार हो गया। इस बीच जांच में खुलासा हुआ है कि बम के लिए लगने वाली बैटरियां और पाउडर शहर से खरीदे गए थे। नालासोपारा परिसर के वैभव राऊत के घर पर मुंबई एटीएस ने छापा मारकर देशी बम का जखीरा बरामद किया था। मामले में एटीएस ने वैभव सहित सुधन्वा गोंधलेकर और शरद कलसकर को गिरफ्तार किया है। सुधन्वा सांगली का है। जबकि कलसकर औरंगाबाद तहसील के केसापुरी का रहने वाला है।

वैभव राऊत ने दो सप्ताह पूर्व कैलाश नगर और बसैय्ये नगर के अपने मित्रों से संपर्क किया था। उनके बीच कुछ बातचीत हुई थी। इसकी जानकारी देने से एटीएस ने इनकार कर दिया है। बता दें कि, राऊत और कलसकर दोनों औरंगाबाद में आते थे। दोनों किसके संपर्क में थे। इसकी जांच एटीएस कर रही है। बताया जा रहा है कि वैभव राऊत के घर पर छापा मारकर बरामद की गई बम की सामग्री औरंगाबाद से खरीदी गई थी। इसमें सेफ्टी फ्यूज, दस बैटरी बॉक्स, छह वोल्टेज की बैटरी, सोल्डर मशीन, बैटरी कंटेनर, चार रिले स्विच, तीन पीसीबी सर्किट, छह बैटरी कनेक्टर, दो बैटरी कनेक्टर, छह ट्रान्जिस्टर्स व मल्टी मीटर आदि शामिल हैं।

हमारे बेटे का बम विस्फोट से कोई संबंध नहीं 
शरद भाऊसाहब कलसकर दौलताबाद के समीप के केसापुरी का मूल निवासी है। उसका बम विस्फोट से किसी प्रकार का संबंध नहीं होने का दावा कलसकर परिवार ने किया है। उन्होंने बताया है कि विगत चार-पांच वर्ष पूर्व वर्कशॉप के प्रशिक्षण के लिए वह घर से बाहर निकला था। परिजनों ने बताया कि शरद कलसकर को वर्कशॉप डालनी थी। वह कोल्हापुर की एक कंपनी में मोल्डिंग जॉब तैयार करने का काम करता था।

पत्रकारों से बातचीत में उसके छोटे भाई कृष्णा, पिता भाऊसाहेब और चाचा सोपान ने बताया कि शरद के पिता स्वाध्याय की केसापुरी में पांच एकड़ खेती है। उससे कलसकर परिवार की दिनचर्या चलती है। शरद का भाई व पिता खेती करते हैं। उसकी बहन का विवाह हो गया है। खेती में मन नहीं लगने से शरद कोल्हापुर की निजी कंपनी में काम करने गया था। हर चार-पांच माह बाद वह परिवार से मिलने आता था। 

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