दैनिक भास्कर हिंदी: कांग्रेस की मौजूदा तस्वीर से सिंधिया की अनुपस्थिति के क्या हैं निहितार्थ

December 15th, 2018

अजीत सिंह, जबलपुर। शुक्रवार को कमलनाथ ने राज्यपाल से मिलकर सरकार बनाने के लिए विधिवत तरीके से दावा पेश किया। राजभवन से इस अवसर के जो चित्र बाहर आये हैं वे अपने में कुछ कही अनकही बातों और चंद सवालों को भी समेटे हुए हैं। चित्रों में राज्यपाल श्रीमती आनंदी बेन के साथ भावी मुख्यमंत्री कमलनाथ के अलावा पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह, नेता प्रतिपक्ष रहे अजय सिंह, पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष अरुण यादव आदि नेता तो नजर आ रहे हैं, लेकिन, कल तक मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया नदारद हैं। तस्वीर में ज्योतिरादित्य की गैर मौजूदगी न सिर्फ खल रही है बल्कि कांग्रेस की एकजुटता को लेकर चिंता को भी जन्म दे रही है। साथ ही एक स्वाभाविक सवाल उठ रहा है कि जो सिंधिया दो दिन पहले तक कमलनाथ के साथ कदम से कदम मिलाकर चलते नजर आ रहे थे, वे आज इस अहम तथा मुबारक मौके पर अनुपस्थित क्यों रहे?

दरअसल, गुरुवार को एक बार दिल्ली में फिर वही कहानी दोहरायी गयी जो गत अप्रैल के दूसरे पखवाड़े में लिखी गयी थी, परिणास्वरूप तब कमलाथ को अध्यक्ष बना दिया गया था और इस बार मुख्यमंत्री का ताज उनके सिर सजा दिया गया। तब अध्यक्ष पद के स्वाभाविक दावेदार और अब मुख्यमंत्री पद की दौड़ में शामिल ज्योतिरादित्य सिंधिया दोनों बार ठगे से रह गये। कमलनाथ के नाम का फैसल होने के बाद अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष के सामने सिंधिया जरूर मुस्कराने और सहज दिखने की कोशिश करते नजर आये, लेकिन रात को जब वे दिल्ली से भोपाल लौटे तो एयरपोर्ट पर और प्रदेश कांग्रेस कार्ययालय में उनके चेहरे पर तारी तनाव और उनकी भाव-भंगिमा इस बात की चुगली कर रहे थे कि आलाकमान के निर्णय को उन्होंने कड़वे घूंट के रूप में गले से नीचे उतारा है। शुक्रवार को राजभवन में उनकी अनुपस्थिति ने रही सही कसर को भी पूरा कर दिया।

दरअसल, पहले प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद और अब मुख्यमंत्री की कुर्सी से वंचित रह गये ज्योतिरादित्य सिंधिया की राह का सबसे बड़ा रोड़ा कोई साबित हुआ तो वह हैं पूर्व मुख्यमंत्री और प्रदेश की कांग्रेस राजनीति के चाणक्य माने जाने वाले दिग्विजय सिंह। दिग्गी राजा और सिंधिया घराने की राजनीतिक प्रतिस्पर्धा ज्योतिरादित्य सिंधिया के पिता स्वर्गीय माधवराव सिंधिया के जमाने से चली आ रही है। जो लोग राजनीति के बारे में थोड़ी बहुत भी जानकारी रखते हैं उन्हें पता होगा कि पहले अर्जुन सिंह, जिन्हें दिग्विजय अपना राजनीतिक गुरु मानते हैं, और बाद में उनके खेमे की बागडोर संभालने वाले दिग्विजय सिंह और सिंधिया राजघराने के वारिसों के बीच शह- मात का खेल चलता रहा है। कहा यह भी जाता है कि 1993 में माधवराव सिंधिया को मुख्यमंत्री न बनने देने में और दिग्विजय की ताजपोशी कराने में अर्जुन सिंह की महती भूमिका रही थी। इसी तरह से प्रदेश में विधानसभा चुनाव से करीब छह माह पूर्व 24 अप्रैल को कमलनाथ को प्रदेश अध्यक्ष बनवाने में दिग्विजय सिंह की बड़ी भूमिका रही थी। उन्होंने राहुल गांधी के सामने एक तरह से ज्योतिरादित्य को अध्यक्ष बनाने पर वीटो कर दिया था, जिसके चलते ज्योतिरादित्य को एक बार फिर चुनाव समिति के अध्यक्ष पद से संतोष करना पड़ा था। प्रदेश कांग्रेस की राजनीति में अर्जुन-दिग्विजय खेमा और कमलनाथ लंबे अरसे से समय-समय पर एक दूसरे के मददगार की भूमिका का निर्वाह करते रहे हैं। सो इस बार फिर दिग्विजय सिंह ने कमलनाथ को अपना समर्थन देकर उनकी राह को आसान कर दिया।

खैर, कमलनाथ सोमवार को विधिवत प्रदेश के मुख्यमंत्री बन जायेंगे, हद से हद 30-35 लोग ही मंत्री पद से नवाजे जा सकेंगे। ऐसे में सबसे महती काम होगा पद से वंचित रह गये लोगों के असंतोष की आग को ठंडा करने का। दरअसल, राहुल गांधी के लिए प्रदेश कांग्रेस के बड़े नेताओं की एकजुटता ज्यादा मायने रखती है इसी की खातिर उन्होंने अपने मित्र को धैर्य का पाठ पढ़ाया और अपने चाचा के मित्र की ताजपोशी कर दी। एकजुटता कितनी अपरिहार्य है यह 15 साल वनवास भोगने वाले प्रदेश के नेताओं को भी पता ही होगा!