Gaiety Theatre: गैटी पर लगा अस्थायी ताला, क्या थम जाएगी 54 साल पुरानी सिनेमाई धड़कन?, जानें पूरा मामला

गैटी पर लगा अस्थायी ताला, क्या थम जाएगी 54 साल पुरानी सिनेमाई धड़कन?, जानें पूरा मामला
आइकॉनिक थिएटर गैटी कॉम्प्लेक्स के अस्थायी रूप से बंद होने की खबर सामने आई, तो यह सिर्फ एक थिएटर के बंद होने की खबर नहीं, बल्कि मुंबई की सिनेमाई संस्कृति के एक पुराने अध्याय पर ठहराव जैसा महसूस हुआ।

डिजिटल डेस्क, मुंबई। मुंबई में सिनेमा देखने का मतलब सिर्फ पर्दे पर फिल्म देखना नहीं है। यहां कुछ थिएटर ऐसे हैं, जहां फिल्म देखने की यादें खुद एक कहानी बन जाती हैं। बांद्रा का गैटी-गैलेक्सी भी ऐसा ही एक नाम है। किसी के लिए यह पहली फिल्म की याद है, किसी के लिए दोस्तों के साथ बिताई शाम, तो किसी के लिए अपनी पसंदीदा फिल्म की रिलीज का जश्न। बड़े पर्दे पर सितारों को देखने के साथ-साथ यहां दर्शकों की सीटियों, तालियों और शोर ने भी इस जगह को एक अलग पहचान दी है। ऐसे में जब इस आइकॉनिक थिएटर कॉम्प्लेक्स के अस्थायी रूप से बंद होने की खबर सामने आई, तो यह सिर्फ एक थिएटर के बंद होने की खबर नहीं, बल्कि मुंबई की सिनेमाई संस्कृति के एक पुराने अध्याय पर ठहराव जैसा महसूस हुआ।

क्यों लगा गैटी पर पुलिस का नोटिस ?

बांद्रा स्थितगैटी -गैलेक्सी को लाइसेंस नवीनीकरण से जुड़े मामले में मुंबई पुलिस की कार्रवाई के बाद अस्थायी रूप से बंद किया गया है। पत्रकार नरेंद्र गुप्ता ने सोशल मीडिया पर मुंबई पुलिस की ओर से जारी एक नोटिस की तस्वीर साझा की और जब दैनिक भास्कर की टीम गैटी पर पहुंची तो देखा की थिएटर के बाहर अलग अलग 6 जगहों पर बांद्रा पुलिस की नोटिस लगाई गयी है जिसमें थिएटर के बंद किए जाने की वजह लाइसेंस का नवीनीकरण न होना बताई गई है। जानकारी के मुताबिक, थिएटर 6 सितंबर तक संचालित था, लेकिन 7 सितंबर के लिए यहां कोई शो निर्धारित नहीं किया गया। जो थिएटर दर्शकों की भीड़ से भरा रहता था वहां बाहर अब सन्नाटा था। गेट पर ताला था और फिल्मे के सारे शो अस्थायी रूप से रद्द कर दिए गए। मुंबई पुलिस की ओर से लगाए गए नोटिस में स्पष्ट किया गया है कि प्रबंधन लाइसेंस का नवीनीकरण कराने में विफल रहा, जिसके चलते सिनेमा हॉल को अस्थायी रूप से बंद करने की कार्रवाई की गई। इस खबर के सामने आने के बाद फिल्म ट्रेड और दर्शकों के बीच यह सवाल उठने लगा कि आखिर मुंबई के इस पुराने और लोकप्रिय थिएटर का भविष्य क्या होगा। हालांकि, फिलहाल इसे स्थायी बंदी नहीं माना जा रहा है। व्यापारिक सूत्रों के मुताबिक, गैयटी-गैलेक्सी का प्रबंधन लाइसेंस संबंधी समस्या को दूर करने के लिए संबंधित प्रक्रिया पर काम कर रहा है। उम्मीद जताई जा रही है कि मामला जल्द सुलझ जाएगा और थिएटर में फिर से फिल्मों के शो शुरू हो जाएंगे।थिएटर के कार्यकारी निदेशक मनोज देसाई से इस मामले पर दैनिक भास्कर ने प्रतिक्रिया लेने की कोशिश की, लेकिन उनकी ओर से कोई टिप्पणी उपलब्ध नहीं हो सकी।

24 नवंबर 1972 से शुरू हुआ सफर

गैयटी-गैलेक्सी की कहानी आज से करीब पांच दशक पहले शुरू हुई थी। 24 नवंबर 1972 को इस सिनेमाघर ने दर्शकों के लिए अपने दरवाजे खोले थे। इसकी शुरुआत रमेश सिप्पी की लोकप्रिय फिल्म ‘सीता और गीता’ के प्रदर्शन के साथ हुई थी। उस दौर में जब सिंगल-स्क्रीन थिएटर फिल्म संस्कृति का सबसे बड़ा केंद्र हुआ करते थे, गैटी -गैलेक्सी ने मुंबई के दर्शकों के बीच अपनी अलग जगह बनाई। शुरुआत में यह परिसर तीन थिएटरों गैटी, गैलेक्सी और जेमिनी के साथ शुरू हुआ था। इनमें गैटी और गैलेक्सी सबसे बड़े स्क्रीन रहे हैं। गैटी में करीब 1000 दर्शकों के बैठने की क्षमता है, जबकि गैलेक्सी में लगभग 800 सीटें हैं। जेमिनी में करीब 240 दर्शकों के बैठने की व्यवस्था थी। समय के साथ इस परिसर का विस्तार हुआ। 1990 के दशक के आखिर में चार और थिएटर इसमें जोड़े गए, ग्रेस, जेम, ग्लैमर और गॉसिप। ग्रेस को पूर्वावलोकन थिएटर के तौर पर बनाया गया था, जबकि जेम, ग्लैमर और गॉसिप की अपनी अलग विशेषताएं थीं। इसके बाद पूरा परिसर जी7 मल्टीप्लेक्स के नाम से भी जाना जाने लगा।

सस्ती टिकट से लेकर सितारों की मौजूदगी तक

गैटी-गैलेक्सी की लोकप्रियता का एक बड़ा कारण इसकी किफायती टिकट दरें रही हैं। बांद्रा स्टेशन के करीब होने के कारण यहां पहुंचना भी दर्शकों के लिए आसान रहा है। लेकिन इसकी असली पहचान इसके माहौल ने बनाई। यहां फिल्म देखना अक्सर एक सामूहिक अनुभव रहा है..पर्दे पर हीरो की एंट्री होते ही सीटियों की गूंज, संवादों पर तालियां और किसी बड़े सीन पर दर्शकों का शोर इस थिएटर की खास पहचान रहे हैं। सलमान खान, शाहरुख खान की फिल्मों की रिलीज के दिन दर्शक यहां ढोल नगाड़े बजाते हैं। यही वजह है कि कई बॉलीवुड सितारे भी अपनी फिल्मों की दर्शकों के बीच असली प्रतिक्रिया जानने के लिए गैटी-गैलेक्सी पहुंचते रहे हैं। फिल्म की रिलीज के बाद यहां दर्शकों का रिएक्शन देखना कई कलाकारों और फिल्म निर्माताओं के लिए किसी खास अनुभव से कम नहीं रहा।

फिल्म हिट या फ्लॉप, गैटी से पता चलता है-हुमा कुरैशी

अभिनेत्री हुमा कुरैशी ने दैनिक भासकर से बताया था कि जब उनकी फिल्म बेबी डू डाई डू सिनेमाघरों में रिलीज हुई तो वह बहुत नर्वस थीं कि उन्हें पता नहीं था कि उनकी फिल्म लोगों को पसंद आ भी रही है या नहीं। लेकिन जैसे ही उन्होंने गैटी में दर्शकों की भीड़ देखी और उन्हें सीटियां और तालियां बजाते देखा उनकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं था। गैटी में हुमा चोरी से फिल्म देखने पहुंची थीं। हुमा की तरह ही कई कलाकार छुपकर दर्शकों का असली रेस्पॉन्स देखने के लिए गैटी जाते रहे हैं।

बंद होने से एक दिन पहले अली फजल पहुंचे गैटी

फिल्म मिर्जापुर सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है और अच्छा प्रदर्शन कर रही है। अभिनेता अली फजल भी गैटी के बंद होने से एक रात पहले यानी 6 दिसंबर को दर्शकों से मिलने गैटी पहुंचे थे जहां दर्शकों की भारी भीड़ के बीच उन्होंने सबका धन्यवाद किया। उन्हें खुद नहीं पता था कि एक दिन बाद इसी आइकोनिक थिएटर में कल से उनकी फिल्म उनके फैंस नहीं देख पाएंगे। अली को देखने और उनसे मिलने भारी भीड़ गैटी के बाहर इकठ्ठा हो गयी। लेकिन अब फिलहाल इस थिएटर में सन्नाता पसरा हुआ है।

5 सालों में बंद हुए ऐतिहासिक थिएटर

पिछले पांच वर्षों में मुंबई के सिंगल-स्क्रीन सिनेमाघरों की कहानी धीरे-धीरे बदलती गई है। कई थिएटर कोविड के बाद दोबारा शुरू नहीं हो सके और अब उनकी जगह रियल एस्टेट प्रोजेक्ट ले रहे हैं।

ड्रीमलैंड सिनेमा

ड्रीमलैंड सिनेमा इसका बड़ा उदाहरण है। ग्रांट रोड स्थित यह थिएटर, जो कभी कृष्णा टॉकीज के नाम से जाना जाता था और 1919 में शुरू हुआ था, इस दशक की शुरुआत में स्थायी रूप से बंद हो गया। अब इसकी जगह हाई-एंड रेजिडेंशियल और कमर्शियल टावर विकसित किया जा रहा है।

सहकार प्लाजा

सहकार प्लाजा भी इसी बदलाव की कहानी कहता है। तिलक नगर स्थित यह सिंगल-स्क्रीन 1968 से दर्शकों के बीच लोकप्रिय था और कोविड के बाद कम फुटफॉल तथा ओटीटी के बढ़ते प्रभाव के बीच बंद हो गया। 2026 में इसकी पुरानी इमारत को गिरा दिया गया और वहां 11 मंजिला कमर्शियल कॉम्प्लेक्स बनाया जा रहा है।

सेंट्रल प्लाजा

सेंट्रल प्लाजा, गिरगांव भी महामारी के दौरान 2020 में आर्थिक रूप से संभल न पाने के कारण बंद हुआ था। 1930 के दशक में बने इस थिएटर में मराठी फिल्मों के साथ बॉलीवुड और हॉलीवुड की फिल्में भी दिखाई जाती थीं। अब इसके मालिक इस संपत्ति को रेजिडेंशियल बिल्डिंग में बदलने की योजना बना रहे हैं।

चंदन सिनेमा

चंदन सिनेमा, जुहू की कहानी थोड़ी अलग है। यह थिएटर 2017 में ही बंद हो गया था, 2024 के अंत में इसकी इमारत का ध्वस्तीकरण शुरू हुआ और जनवरी 2025 तक करीब पांच दशक पुराना यह सिनेमाघर पूरी तरह मलबे में बदल गया। 1973 में राज कपूर की ‘बॉबी’ के साथ शुरू हुआ यह थिएटर जुहू के फिल्मी इतिहास का अहम हिस्सा था।

खामोश हो रहे तालियों सीटियों के शोर

इसी तरह जवाहर टॉकीज, मुलुंड और पैराडाइज सिनेमा, माहिम जैसे पुराने थिएटर भी बंद होने के बाद रीडेवलपमेंट की राह पर हैं। वहीं उदय टॉकीज, घाटकोपर को भी नए कमर्शियल प्रोजेक्ट में बदला जा रहा है, जहां पुराने 780 सीटों वाले थिएटर की जगह करीब 265 सीटों का छोटा सिनेमा हॉल रखने की योजना है। सितंबर 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, मुंबई में करीब दो दर्जन बंद पड़े सिनेमाघरों के मालिकों ने अपनी संपत्तियों के पुनर्विकास के प्रस्ताव दिए थे। यह बदलाव अब सिर्फ कुछ पुराने थिएटरों तक सीमित नहीं है। अगस्त 2026 में सामने आए आंकड़ों के मुताबिक, मुंबई महानगर क्षेत्र में अब केवल 45-50 सिंगल-स्क्रीन थिएटर ही सक्रिय रह गए हैं, जबकि करीब 125 थिएटर बंद हो चुके हैं। यही वजह है कि गैटी-गैलेक्सी जैसे थिएटर का अस्तित्व आज पहले से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है। क्योंकि सवाल सिर्फ एक स्क्रीन के बचे रहने का नहीं, बल्कि उस सामूहिक सिनेमाई संस्कृति के बचे रहने का है, जिसमें फिल्म के हिट होने की खुशी सीटियों, तालियों और दर्शकों के शोर में सुनाई देती थी।

Created On :   7 Sept 2026 6:22 PM IST

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