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India-Nepal Dispute: नेपाल के निचले सदन ने विवादित नक्शे को मंजूरी दी, भारत बोला- नेपाल का दावा जायज नहीं

India-Nepal Dispute: नेपाल के निचले सदन ने विवादित नक्शे को मंजूरी दी, भारत बोला- नेपाल का दावा जायज नहीं

हाईलाइट

  • नेपाल के निचले सदन से नए नक्शे के लिए लाए गए संवैधानिक संशोधन बिल को मंजूरी
  • करीब 4 घंटो की चर्चा के बाद सभी 258 सांसदों ने ध्वनिमत से इसका समर्थन किया
  • नए नक्शे में भारत के कालापानी, लिपुलेख और लिंपियाधूरा को नेपाल का हिस्सा बताया गया है

डिजिटल डेस्क, काठमांडू। नेपाल के निचले सदन (प्रतिनिधि सभा) ने शनिवार को अपने नए नक्शे के लिए लाए गए संवैधानिक संशोधन बिल को सर्वसम्मति से मंजूरी दे दी। करीब 4 घंटो की चर्चा के बाद सदन में मौजूद सभी 258 सांसदों ने ध्वनिमत से इसका समर्थन किया। निचले सदन से पास होने के बाद अब ये विधेयक नेशनल असेंबली के पास जाएगा और फिर राष्ट्रपति की मंजूरी मिलते ही ये लागू हो जाएगा। नए नक्शे में भारत के रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण कालापानी, लिपुलेख और लिंपियाधूरा को नेपाल का हिस्सा बताया गया है। जबकि भारतीय नक्शे में ये सभी हिस्से उत्तराखंड में पड़ते हैं। नेपाल के नए नक्शे को पिछले महीने नेपाल की सत्तारूढ़ पार्टी ने जारी किया था। भारत ने एक बार फिर इस पर आपत्ति जताई  है।

भारत ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की
भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने कहा, 'हमने गौर किया है कि नेपाल की प्रतिनिधि सभा ने नक्शे में बदलाव के लिए संशोधन विधेयक पारित किया है ताकि वे कुछ भारतीय क्षेत्रों को अपने देश में दिखा सकें। हालांकि, हमने इस बारे में पहले ही स्थिति स्पष्ट कर दी है। यह ऐतिहासिक तथ्यों और सबूतों पर आधारित नहीं है। ऐसे में उनका दावा जायज नहीं है। यह सीमा विवाद पर होने वाली बातचीत के हमारे मौजूदा समझौते का उल्लंघन भी है।' इससे पहले भी जब नपेला ने नय नक्शा जारी किया था तब भारत ने कहा था- यह ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित नहीं है। 

20 मई को जारी किया गया नया नक्शा
भारत के नेपाल के साथ रिलेशन जितने गहरे रहे हैं उतने दुनिया में किसी और देश के साथ नहीं। दोनों देशों के लोग न सिर्फ एक दूसरे के यहां बिना पासपोर्ट के ट्रैवल कर सकते हैं बल्कि रह भी सकते हैं और काम भी कर सकते हैं। लेकिन बीते कुछ समय से दोनों देशों के बीच जमीन के एक हिस्से को लेकर डिस्प्यूट चल रहा है जिसका असर दोनों देशों के रिलेशन पर भी पड़ा है। ये डिस्प्यूट और भी ज्यादा बढ़ गया जब 8 मई को भारत ने उत्तराखंड के लिपुलेख से कैलाश मानसरोवर के लिए सड़क का उद्घाटन किया। भारत के इस कदम से नेपाल नाराज हो गया और प्रधानमंत्री केपी ओली शर्मा ने 20 मई को उनके देश का एक नया नक्शा जारी कर दिया। इस नक्शे में भारत के कंट्रोल वाले कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को नेपाल का हिस्सा दिखाया गया।

Government unveils new political map including Kalapani, Lipulekh and Limpiyadhura inside Nepal borders

सर्वसम्मति से पास हुआ संविधान संशोधन विधेयक
नक्शे को देश के संविधान में जोड़ने के लिए 27 मई को संसद में प्रस्ताव भी रखा जाना था। लेकिन नेपाल सरकार ने ऐन मौके पर संसद की कार्यसूची से इसे हटा दिया। हालांकि इसके बाद कानून मंत्री शिवा माया तुंबामफे ने 31 मई को विवादित नक्शे को लेकर संशोधन विधेयक नेपाली संसद में पेश किया। नेपाली संविधान में संशोधन करने के लिए संसद में दो तिहाई मतों का होना आवश्यक है। शनिवार को इस विधेयक पर करीब 4 घंटो तक चर्चा चली। इसके बाद वोटिंग हुई जिसमें सदन में मौजूद सभी 258 सांसदों ने ध्वनिमत से इसका समर्थन किया। 

Nepal Parliament set to vote on new political map including ...

300 स्क्वायर किलोमीटर के एरिया को लेकर विवाद
ट्रायंगुलर सा दिखने वाला जमीन का ये टुकड़ा करीब 300 स्क्वायर किलोमीटर का है। इस इलाके के नॉर्थ में लिम्पियाधुरा, साउथ ईस्ट में लिपुलेख पास और साउथ वेस्ट में कालापानी है। नेपाल और भारत दोनों इसे अपना हिस्सा मानते हैं। लेकिन ऐसा क्यों है इस क्रॉन्ट्रोवर्सी को समझने के लिए हमें करीब 200 साल पीछे 1814 में जाना होगा जब गोरखा किंगडम और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच युद्ध हुआ था।  इसे एंग्लो-नेपाल वॉर (Anglo-Nepalese War) के नाम से जाना जाता है। युद्ध की वजह नेपाल के गोरखा किंगडम का तेजी से  विस्तार था। इस किंगडम ने वेस्ट में आने वाली सतलज नदी से लेकर ईस्ट की तीस्ता नदी तक अपने साम्राज्य को फैला दिया था। सिक्किम, कुमाऊं और गढ़वाल पर गोरखा किंगडम का कब्जा हो गया था।

1816 में साइन हुई सुगौली ट्रिटी
युद्ध का एक कारण यह भी था कि ईस्ट इंडिया कंपनी तिब्बत के साथ व्यापार करना चाहती थी लेकिन नेपाल के राजा ने उन्हें रास्ता देने से मना कर दिया था। उस समय भारत के अवध और नेपाल के बीच तराई रीजन को लेकर बाउंड्री डिस्प्यूट भी चल रहा था। अंग्रेजों ने इसी को कारण बनाकर गोरखा किंगडम के साथ युद्ध छेड़ दिया जो 1814 से लेकर 1816 तक चला। इस युद्ध में गोरखा सैनिक बहुत ही बहादुरी से लड़े लेकिन ईस्ट इंडिया कंपनी के पास काफी एडवांस हथियार थे। जब गोरखा किंगडम को लगा की वह जीत नहीं पाएंगे तो उन्होंने अंग्रेजों के साथ एक ट्रिटी साइन की। इसे सुगौली के नाम से जाना जाता है। 4 मार्च 1816 को ये ट्रिटी साइन की गई थी। सुगौली ट्रिटी के तहत नेपाल के राजा को कुमाऊं, गढ़वाल, सिक्किम और तराई के इलाकों को ब्रिटिशर्स को सौंपना पड़ा। 

Treaty of Sugauli - Wikipedia

नेपाल की वेस्टर्न बाउंड्री महाकाली रिवर विवाद की जड़
इस ट्रिटी के साइन होने के बाद नेपाल की वेस्टर्न बाउंड्री महाकाली और ईस्टर्न बाउंड्री मेची रिवर से डिफाइन की जाने लगी। आज भी इसी आधार पर नेपाल की बाउंड्री डिफाइन की जाती है। अब ये विवाद शुरू होता है नेपाल की वेस्टर्न बाउंड्री महाकाली रिवर से। इसे शारदा रिवर भी कहा जाता है। मैप पर जब आप देखेंगे तो इस रिवर के दो सोर्स दिखाए देते हैं। एक सोर्स है लिम्पियाधुरा जहां से निकलने के बाद ये रिवर फैली हुई दिखती है जबकि दूसरे सोर्स कालापानी से पतली। जब ये ट्रिटी हुई तो ब्रिटिशर्स और गोरखा किंगडम के सामने भी यहीं प्रॉब्लम थी कि बाउंड्री को रिवर के किस सोर्स के आधार पर माना जाए। क्योंकि, लिम्पियाधुरा से निकलने के बाद नदी फैली हुई थी इसलिए दोनों में तय हुआ कि इसी को बाउंड्री का आधार माना जाएगा। ब्रिटिशर्न ने इसी आधार पर अपना मैप भी बनाया। इस तरह ट्रायंगुलर सा दिखने वाला जमीन का ये टुकड़ा नेपाल को मिल गया।

Explained: नेपाल सही या भारत? जानिए क्या है दोनों देश के बीच बॉर्डर डिस्प्यूट की वजह

1860 के दशक में ब्रिटिशर्स ने बदला मैप
कुछ समय बाद जब ब्रिटिशर्स को लगा कि नेपाल को मिला जमीन को वो टुकड़ा रणनीतिक रूप से उनके लिए महत्वपूर्ण है तो उन्होंने बड़ी ही चालाकी से 1860 के दशक में इस मैप को बदल दिया। ब्रिटिशर्स अब दूसरे सोर्स कालापानी को बाउंड्री का आधार बताने लगे। उस समय नेपाल किंगडम को इससे कोई परेशानी नहीं हुई क्योंकि पहाड़ी इलाका होने के कारण वहां न तो ज्यादा लोग रहते थे और केवल एक रास्ता गुजरता था जो कैलाश मानसरोवर के लिए जाता था। इसके बाद नेपाल ने अपने मैप में भी कभी लिम्पियाधुरा को शामिल नहीं किया। 1962 में जब इंडिया और चाइना के बीच वॉर हुआ उस समय भारत ने नेपाल की मोनार्की से यहां आर्मी तैनात करने की परमिशन मांगी। नेपाल को भी इससे कोई परेशानी नहीं थी और उन्होंने इंडिया को परमिशन दे दीं। तब से लेकर आज तक इस इलाके में इंडियन आर्मी तैनात है।

नेपाल सही या भारत?
नेपाल सुगौली को ही आखिरी ट्रिटी मानता है। इस ट्रिटी के बाद दोनों देशों के बीच बॉर्डर को लेकर कभी कोई ट्रिटी साइन नहीं हुई। इसलिए वह इसी के आधार पर अपने इलाके को डिफाइन करने की बात कह रहा है। लेकिन भारत के पक्ष में एक बात जाती है कि सालों से वह कालापानी को बाउंड्री को आधार के तौर पर इस्तेमाल करता रहा है। नेपाल के किसी भी किंगडम को इससे परेशानी नहीं हुई। 1990 में नेपाल में लोकतंत्र के आने के बाद भी इसी को बॉर्डर माना गया। ऐसे में अचानक केपी ओली शर्मा सरकार का इसे अपना हिस्सा बताना सही नहीं है। 

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राजस्थान में सियासी घमासान फिर तेज, मंत्रिमंडल विस्तार पर गहलोत-पायलट आमने सामने


डिजिटल डेस्क, जयपुर। पंजाब में जब से कांग्रेस हाईकमान ने मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को दरकिनार कर कांग्रेस प्रदेश कमेटी का अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू को बनाया है, तब से राजस्थान में पायलट गुट का भी जोश हाई है। अब पायलट गुट के दबाव के कारण मंत्रिमंडल पर नए सिरे से चर्चा हो रही है। मंत्रिमंडल विस्तार या फेरबदल पर अशोक गहलोत और सचिन पायलट गुट के बीच तलवारें खिंच गईं हैं,  दोनों गुट आमने-सामने आ गये हैं। फिलहाल विस्तार की कोई तारीख तय नहीं है लेकिन यह माना जा रहा है कि अगले महीने इस पर कोई फैसला लिया जा सकता है। अभी गहलोत कैबिनेट में 9 पद खाली हैं। अगर कांग्रेस 'एक व्यक्ति एक पद' के फॉर्मूले को मानती है तो शिक्षा राज्य मंत्री और कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गोविंद डोटासरा को अपना पद छोड़ना होगा। वैसे गोविंद डोटासरा ने यह कहकर कि 'मैं दो-चार दिन का मेहमान हूं' अपने जाने के संकेत दे दिये हैं। एक पद विधानसभा उपाध्यक्ष का भी खाली है।   
 
आंकड़ों के हिसाब से गहलोत कैबिनेट में कुल 11 पद खाली हैं। लेकिन इन सभी पदों पर फिलहाल मंत्री नहीं बनाए जाएंगे। अंदेशा है कि विस्तार के बाद भी नाराजगी रह सकती है। उन हालातों का सामना करने के लिए फिलहाल कैबिनेट में दो या तीन पद खाली ही रखे जाएंगे। 
मत्रिमंडल विस्तार पर अगर पूरी तरह गहलोत हावी रहे तो 2 या 3 ही मंत्रियों की छुट्टी होगी। पर ये फैसला लेना भी गहलोत के लिए आसान नहीं होगा,  क्योंकि उन्हें उन लोगों के बीच फैसला लेना होगा जिन लोगों ने मुश्किल वक्त में उनका साथ दिया था। 
अगर विस्तार पर पायलट गुट का दबाव रहा तो फिर 6 से 7 मंत्री आउट होना तय माने जा रहे हैं। और, अगर आलाकमान ने प्रदर्शन को आधार माना तो कई मंत्रियों को जाना पड़ सकता है, लेकिन इसकी उम्मीद कम ही है। हालांकि, अजय माकन का 28-29 को जयपुर दौरा है। जिसमें वह जयपुर आकर हर विधायक से बात करेंगे। उसके बाद यह तय होगा कि कौन रहेगा और कौन जाएगा?   

इन मंत्रियों की कुर्सी पर खतरा


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इनकी हो सकती मंत्रिमंडल में एंट्री- पायलट गुट के 3 और गहलोत गुट के 7 चहेरों को मंत्रिमंडल में जगह मिल सकती है। 

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डोटासरा के बयान से उनके जाने के संकेत

प्रदेश में मंत्रिमंडल फेरबदल की चर्चाऐं जारी हैं उस बीच शिक्षा राज्य मंत्री गोविंद सिंह डोटासरा का एक वीडियो तेजी से सोशल मीडिया पर छा गया है। इसमें उनको राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष डीपी जारोली से कहते सुना जा सकता हैं- ‘मेरे पास एक घंटे फाइल नहीं रुकेगी, आप सोमवार को आ जाओ। एक मिनट में निकाल दूंगा, जितनी कहोगे। मैं दो-पांच दिन का ही मेहमान हूं। मुझसे जो कराना है करा लो।’ इसके बाद बोर्ड अध्यक्ष डीपी जारोली ने हाथ जोड़कर कहा कि मैं आता हूं सर। इस वायरल वीडियो के बाद से ये कयास तेज हो गए हैं कि मंत्रिमंडल से डोटासरा की रवानगी तय है। 
 

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Habibganj Railway Station: भारत का पहला वर्ल्ड क्लास हबीबगंज रेलवे स्टेशन आपके लिए तैयार, यहां की सेफ्टी, सिक्योरिटी और फैसिलिटी सबसे अलग


डिजिटल डेस्क, भोपाल। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में भारत का पहला वर्ल्ड क्लास हबीबगंज रेलवे स्टेशन बनकर तैयार हो चुका है। री-डेवलपमेंट के बाद इस स्टेशन पर ऐसी सुविधाएं मिलेंगी जो मौजूदा समय में भारत के किसी भी रेलवे स्टेशन पर नहीं है। हबीबगंज रेलवे स्टेशन पर शॉपिंग कॉम्प्लेक्स, अस्पताल, मॉल, स्मार्ट पार्किंग, हाई सिक्योरिटी समेत कई सुविधाएं मिलेंगी। इसके लोकार्पण की तैयारियां शुरू हो गई हैं। अगले महीने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस स्टेशन का लोकार्पण कर सकते हैं। आइये जानते हैं कैसे एक सामान्य रेलवे स्टेशन बना वर्ल्ड क्लास रेलवे स्टेशन...

16 अप्रैल 1853 बॉम्बे से 14 कोच और 400 यात्रियों के साथ भारत की पहली ट्रेन ठाणे के लिए रवाना हुई। इस ट्रेन ने 34 किलोमीटर की दूरी तय की। इसके बाद भारत ने नए युग की ओर पहला कदम तब रखा जब उसने स्टीम इंजनों का निर्माण शुरू किया। राजपूताना मालवा के अजमेर वर्कशॉप में पहला स्टीम लोको नंबर F-734 1895 बनाया गया था। इसके बाद बढ़ती आवश्यकता को देखते हुए 1901 में रेलवे बोर्ड का गठन किया गया।

आजादी के बाद भारत को विरासत में मिले रेल नेटवर्क में काफी सुधार की जरूरत थी। महत्वपूर्ण शहरों को जोड़ने के लिए कई लाइनों को री-रूट किया गया और नई लाइन का निर्माण किया गया। भारत की 42 रियासतों के स्वामित्व वाले रेलवे को जोड़कर इंडियन रेलवे का गठन हुआ। 1947 में आजादी के बाद भारतीय रेल का 55 हजार किलोमीटर का नेटवर्क था। 1952 में मौजूदा रेल नेटवर्क को एडमिनिस्ट्रेटिव पर्पज के लिए 6 ज़ोन में डिवाइड किया गया। 

भारतीय इकोनॉमी के समृद्ध होने के साथ भारतीय रेलवे ने सभी प्रोडक्शन देश में ही करना शुरू कर दिया। 1985 के बाद धीरे-धीरे स्टीम इंजनों की जगह बिजली और डीजल लोकोमोटिव्स ने ले ली। कई सालों तक इलेक्ट्रिफिकेशन से लेकर ट्रैक और स्टेशनों के डेवलपमेंट पर काम हुआ। फिर आई 14 जुलाई 2016 की तारीख। भारतीय रेल के लिए ऐतिहासिक दिन। पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के तहत इंडियन रेलवे ने 1979 में तैयार हुए हबीबगंज स्टेशन के मॉडर्नाइजेशन के लिए पहला कॉन्ट्रेक्ट किया। 

5 सालों तक चले मॉडर्नाइजेशन प्रोजेक्ट के बाद जुलाई 2021 में हबीबगंज स्टेशन बनकर तैयार हो गया। इस स्टेशन में वर्ल्ड क्लास सुविधाएं है जिसके लिए करीब 100 करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं। हबीबगंज स्टेशन पर 5 प्लेटफॉर्म है, जिन्हें अलग-अलग शेडों से कवर किया गया है। यात्रियों को किसी तरह की कोई परेशानी न हो उसे ध्यान में रखते हुए सुविधाएं देने की कोशिश की गई है। दिव्यांगों के लिए अलग से शौचालय बनाए गए हैं। आने वाले समय में स्टेशन को ब्रिज के जरिए तैयार हो रहे मेट्रो स्टेशन से भी जोड़ा जाएगा।

हबीबगंज स्टेशन को इस तरह से डिजाइन किया गया है कि प्रवेश करने और ट्रेनों से उतरकर बाहर निकलने वाले यात्री एक-दूसरे से नहीं टकराएंगे। प्रवेश करने वाले यात्री दोनों तरफ मुख्य भवनों से प्रवेश करेंगे। लिफ्ट, ट्रेवलेटर, एस्केलेटर से एयर कॉन्कोर पर पहुंचेंगे। वहां आराम करेंगे और ट्रेन के आने पर प्लेटफार्म पर उतरकर यात्रा शुरू करेंगे। दूसरें शहरों से हबीबगंज पहुंचने वाले यात्री ट्रेन से उतरेंगे और अंडरग्राउंड सब-वे से बाहर निकल जाएंगे। 

स्टेशन पर एक साथ 1100 यात्रियों के बैठने की व्यवस्था है। इस स्टेशन पर साफ-सुथरे AC वेटिंग रूम से लेकर रिटायरिंग रूम और डोर्मिटरी की सुविधा है। वीआईपी लाउंज भी बनाया गया है। एयरपोर्ट टर्मिनल्स पर जिस तरह की शॉप्स होती है उसी तरह की सुविधाओं के लिए यहां रिटेल स्पेस का प्रोविजन किया गया है। 

स्टेशन और लोगों की सुरक्षा का भी ध्यान रखा गया है। इसके लिए यहां 162 हाई रिजोल्यूशन कैमरे लगाए गए हैं। कंट्रोल रूम में बैठकर पूरे स्टेशन पर नजर रखी जाती है। इन कैमरों के डेटा को डेढ़ सौ टेराबाइट के सर्वर पर एक महीने तक स्टोर किया जाता है। फायर डिटेक्टर से लेकर सुरक्षा से जुड़े अन्य उपकरण यहां इंस्टॉल किए गए हैं। स्टेशन के बाहर के इलाके को 300 करोड़ रुपए की लागत से डेवलप किया जा रहा है जहां मॉल समेत अन्य सुविधाएं होंगी। 

हबीबगंज रेलवे स्टेशन की बिल्डिंग को इनवॉयरमेंट फेंडली बनाया गया है। बिजली की खपत को कम करने के लिए स्टेशन को इस तरह से डिजाइन किया गया है कि दिन में लाइट की जरुरत ही नहीं है। टेंप्रेचर को कंट्रोल करने के लिए छत पर इंसुलेटड शीटिंग की गई है। इसके अलावा बिजली की आपूर्ति के लिए प्लेटफॉर्म के शेड पर सोलर पैनल लगाए गए हैं। इस स्टेशन को बनाते समय कंस्ट्रक्शन टीम को कई तरह के इंजीनियरिंग चैलेंजेज का भी सामना करना पड़ा।

अब सवाल उठता है कि क्या इतनी सारी सुविधाओं से युक्त ये स्टेशन आम लोगों की पहुंच से दूर हो गया है? क्या अब इस स्टेशन पर रेलवे का कोई कंट्रोल नहीं है? क्या ये स्टेशन प्राइवेट है? इसे समझने के लिए हमे समझना होगा पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप यानी पीपीपी को।स्टेशन पूरी तरह तैयार है। जैसे ही यात्रियों का दबाव बढ़ेगा, लिफ्ट, ट्रेवलेटर, एस्केलेटर शुरू कर दिए जाएंगे। अभी न के बराबर यात्री आ रहे हैं, इसलिए ये सुविधाएं बंद हैं।

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ओलंपिक में जिमनास्टिक खिलाड़ियों ने पहली बार पहने ऐसे कपड़े, जिसने देखा रह गए हैरान

ओलंपिक में जिमनास्टिक खिलाड़ियों ने पहली बार पहने ऐसे कपड़े, जिसने देखा रह गए हैरान

डिजिटल डेस्क, टोक्यो। टोक्यो ओलंपिक में पूरी दुनिया से आए हुए खिलाड़ी अपनी प्रतिभा दिखा रहे हैं। खेल में अपनी प्रतिभा दिखाने के अलावा जर्मन की महिला जिमनास्टिक्स ने फ्रीडम ऑफ चॉइस यानी अपने मन के कपड़े पहनने की आजादी को अपने खेल के जरिए प्रमोट करने का फैसला किया है, जिससे उनकी हर तरफ चर्चा हो रही है। 

Germany Women's Gymnastics Team Wear Unitards at Olympics | POPSUGAR Fitness

जर्मनी की महिला जिमनास्ट रविवार को हुए टोक्यो ओलंपिक मुकाबले में फुल बॉडी सूट पहने नजर आई। खिलाड़ियों ने बताया कि इस सूट को फ्रीडम ऑफ चॉइस यानी अपनी पसंद के कपड़े पहनने की आजादी को बढ़ावा देने साथ ही महिलाओं को प्रोत्साहित करने के लिए डिजाइन किया गया है जिसे पहनकर महिला खिलाड़ी आरामदायक महसूस कर सकें।

Germany's gymnasts wear body-covering unitards, rejecting 'sexualization' of sport - CNN 
 

जर्मनी की 4 जिमनास्ट जिनके नाम है पॉलीन शेफर-बेट्ज, सारा वॉस, एलिजाबेथ सेट्ज और किम बुई लाल और सफेद रंग के इस यूनिटार्ड सूट में नजर आई जो लियोटार्ड और लेगिंग्स को मिलाकर बनाया गया था। खिलाड़ी इसी को पहन कर मैदान में उतरीं थी। 

German gymnastics team, tired of 'sexualisation,' wears unitards | Deccan Herald
 

जर्मनी की टीम ने अपनी ट्रेनिंग में भी इसी तरह के कपड़े पहने हुए थे और अपने कई इंटरव्यूज में खिलाड़ियों ने कहा था कि इस साल फाइनल कॉम्पटीशन में भी वो फ्रीडम ऑफ चॉइस को प्रमोट करने के लिए इसी तरह के कपड़े पहनेंगी। खिलाड़ी सारा वॉस ने द जापान टाइम्स को बताया था यूनिटार्ड को फाइनल करने से पहले उन्होंने इस पर चर्चा भी की थी। सारा ने ये भी कहा कि जैसे जैसे एक महिला बड़ी होती जाती है, वैसे ही उसे अपने शरीर के साथ सहज होने में काफी मुश्किल होती हैं। हम ऐसा कुछ करना चाहते थे जिसमें हम अच्छे भी दिखे और सहज भी महसूस करें। चाहे वो कोई लॉन्ग यूनिटार्ड हो या फिर शॉर्ट। 

Germany Women's Gymnastics Team Wear Unitards at Olympics | POPSUGAR Fitness
 

सारा ने यह भी बताया कि उनकी टीम ने इससे पहले यूरोपीय चैंपियनशिप में भी इसी तरह का फुल बॉडी सूट पहना था और इसका उद्देश्य सेक्सुलाइजेशन को कम करना है। हम लोगों के लिए एक रोल मॉडल बनना चाहते थे जिससे वो हमे फॉलो कर सकें। जर्मन के खिलाड़ियों की लोग काफी प्रशंसा भी कर रहे हैं। 


ओलंपिक प्रतियोगिताओं में जिमनास्ट महिलाओं को फुल या हाफ बाजू के पारंपरिक लियोटार्ड ही पहनना होता है साथ ही अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में फुल कपड़े पहनने की अनुमति तो है लेकिन किसी भी महिला जिमनास्ट ने इस तरह के कपड़े नहीं पहने थे। यह पहली बार था जब जर्मन खिलाड़ी महिलाओं ने इस तरह के कपड़े पहने थे। 
बीते कुछ सालों में खेल प्रतियोगिताओं में महिलाओं के शारीरिक शोषण के बढ़ते मामलों को देख महिला खिलाड़ियो की चिंता बढ़ती जा रही है अब एथलीटों की सुरक्षा को देखते हुए नए सेफ्टी प्रोटोकॉल बनाए जा रहे हैं।