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वैशाख माह में करें ये कार्य, पापों से मिलेगी मुक्ति

वैशाख माह में करें ये कार्य, पापों से मिलेगी मुक्ति

डिजिटल डेस्क। वैशाख मास का विशेष महत्व है, इस मास में व्रत, पूजा,दान, करने एवं किसी पवित्र नदी या सरोवर में स्नान करने का लाभ मिलता है। वैशाख मास इस बार 20 अप्रैल से शुरू हुआ है और 18 मई 2019 तक रहेगा। "न माधवसमो मासो न कृतेन युगं समम्। न च वेदसमं शास्त्रं न तीर्थं गंगया समम्।।" अर्थात् वैशाख मास का अपना ही महत्त्व होता है इसके समान कोई मास नहीं है, सतयुग के समान कोई युग नहीं है, वेद के समान कोई शास्त्र नहीं है और गंगासागर के समान कोई तीर्थ नहीं है। अपने कतिपय वैशिष्ट्य के कारण वैशाख मास उत्तम माना गया है।

व्रत कथा :-
नारद जी ने एक बार राजा अम्बरीष से कहा कि वैशाख मास को ब्रह्माजी ने सब मासों में उत्तम सिद्ध किया है। यह माता की भांति सब जीवों को सदा अभीष्ट वस्तु प्रदान करता है। धर्म, यज्ञ, क्रिया और तपस्या का सार है। वैशाख मास संपूर्ण देवताओं द्वारा पूजित है। जैसे विद्याओं में वेद-विद्या, मंत्रों में प्रणव, वृक्षों में कल्पवृक्ष, धेनुओं में (गाय) कामधेनु, देवताओं में विष्णु, वर्णों में ब्राह्मण, प्रिय वस्तुओं में प्राण, नदियों में गंगा, तेजों में सूर्य, अस्त्र-शस्त्रों में चक्र, धातुओं में स्वर्ण, वैष्णवों में शिव तथा रत्नों में कौस्तुभमणि:-

कौस्तुभमणि को भगवान विष्णु धारण करते हैं। माना जाता है कि यह मणि देवताओं और असुरों द्वारा किये गए समुद्र मंथन के समय प्राप्त चौदह मूल्यवान वस्तुओं में से एक है। यह बहुत ही कांतिमय है और जहां भी यह मणि होती है, वहां किसी भी प्रकार की दैवीय आपदा नहीं होती। उसी प्रकार धर्म के साधनभूत में वैशाखमास उत्तम माना जाता है।

इन आठ बातों का त्याग करना चाहिए-

तैलाभ्यघ्गं दिवास्वापं तथा वै कांस्यभोजनम्।

खट्वानिद्रां गृहे स्नानं निषि(स्य च भक्षणम्।।

वैशाखे वर्जयेदष्टौ द्विभुक्तं नक्तभोजनम्।।

वैशाख में व्रत का पालन करने वाला जो जातक पद्म पत्ते (पलाश के पत्ते) पर भोजन करता है, वह सब पापों से मुक्त हो जाता है। जो भी विष्णुभक्त वैशाखमास में नदी,तालाब में स्नान करता है, वह तीन जन्मों के पापों से मुक्त हो जाता है।  

सूर्योदय के समय किसी समुद्रगामिनी नदी में वैशाख-स्नान करता है, वह सात जन्मों के पापों से तत्काल मुक्त जाता है। सूर्यदेव के मेष राशि में आने पर भगवान विष्णु का वरदान प्राप्त करने के उद्देश्य से वैशाख मास-स्नान का व्रत लेना चाहिए। स्नान के उपरांत भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए।

स्कंदपुराण के अनुसार वैशाख मास के देवता भगवान मधुसूदन हैं।

वैशाखमास में मधुसुदन जी से इस प्रकार की स्तुति करनी चाहिए

मधुसूदन देवेश वैशाखे मेषगे रवौ। प्रातःस्नानं करिष्यामि निर्विघ्नं कुरु माधव।।

भावार्थ :-

हे मधुसूदन! हे देवेश्वर माधव ! मैं सूर्य के मेष राशि में स्थित होने पर वैशाख मास में प्रातः स्नान करूंगा, आप इसे निर्विघ्न पूर्ण कीजिए।’

इसके बाद निम्न मंत्र से सूर्य को अर्क देना चाहिए :-

वैशाखे मेषगे भानौ प्रातः स्नानपरायणः। अघ्र्यं तेऽहं प्रदास्यामि गृहाण मधुसूदन।।

वैशाख मास में मनुष्य संकल्पादि कार्य में यदि पुष्परेणु तक का परित्याग करके गोदान करता है, तो उसे अपार सुख की प्राप्ति होती है। इस पुरे वैशाखमास में व्रत रखकर गोदान करने वाला इस भीमव्रत के प्रभाव से श्री हरिस्वरूप हो जाता है। यह मास अति उत्तम व पवित्र है।

इस मास में ऊपर दिए गए नियमों का पालन करने वाला व्यक्ति इसलोक के सुखों को भोग करता हुआ धर्म

भावार्थ :-

काम-मोक्ष चारों पुरुषार्थों को भी प्राप्त कर लेता है। अतः सभी को वैशाख मास के सदाचार, नियमों और धर्मों का पालन करना चाहिए।

वैशाख मास महत्त्व :-
भगवान विष्णु को प्रसन्न करने वाला इसके समान दूसरा कोई मास नहीं है, जो वैशाखमास में सूर्योदय से पहले स्नान करता है, उससे भगवान विष्णु सदा प्रेम करते हैं। पाप तभी तक कष्ट देतें हैं, जब तक मनुष्य वैशाख मास में प्रातःकाल जल में स्नान नहीं करता। वैशाख माह में सब तीर्थ, देवता आदि बाहर के जल अर्थार्त सामन्य नदी तालाबों में भी सदैव स्थित रहते हैं। विष्णुजी की आज्ञा से मानव का कल्याण करने के लिए वे सूर्योदय से लेकर छह दंड के भीतर सभी देव उपस्थित रहते हैं।

वैशाख सर्वश्रेष्ठ मास है और विष्णुजी को सदा प्रिय है। जो पुण्य फल कई प्रकार के दान से होता है और जो फल सब तीर्थों स्थलों के दर्शन से मिलता है ये सभी पुण्यफल की प्राप्ति वैशाखमास में मात्र जल का दान करने से प्राप्त हो जाती है। जो जलदान में असमर्थ है, ऐसे ऐश्वर्य की अभिलाषा रखने वाले पुरुष को उचित है कि वह दूसरे को प्रबोध करे इस मास में जल का दान करने से बढ़कर कोई हितकारी कार्य नही है।

जो भी जातक वैशाख मास में मार्ग पर यात्रियों के लिए प्याऊ लगाता है, वह विष्णुलोक में प्रतिष्ठित होता है। प्रपादान अर्थात पौसला या प्याऊ के द्वारा जल दान करता है वह देवताओं, पितरों तथा ऋषियों को अत्यंत प्रिय होता है। जो भी जातक इस वैशाख मास में प्याऊ लगाकर राहगीरों की प्यास बुझाता है, उस पर ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि देवतागण प्रसन्न होते हैं।

वैशाख मास में जल की इच्छा रखने वाले को जल, गरीबों या राहगीरों को छाता और पंखे की इच्छा रखने वाले को पंखा देना। और जो पीड़ित महात्माओं को प्रेम से शीतल जल प्रदान करता है, उसे उतनी ही मात्र से दस हजार राजसूय यज्ञों का फल प्राप्त होता है।

वैशाख मास में धूप और परिश्रम से पीड़ित ब्राह्मण या संत को जो पंखा डुलाकर शीतलता प्रदान करता है, वह निष्पाप होकर भगवान का पार्षद हो जाता है। जो मार्ग में थके हुए श्रेष्ठ द्विज को हवा,पानी और शारीरिक सेवा देता है, वह भगवान विष्णु का सायुज्य प्राप्त कर लेता है।

जो शुद्ध मन से हाथ वाला पंखा दान करता है उसके पापों का शमन हो जाता है। जो भी इस विष्णुप्रिय वैशाखमास में पादुका दान करता है, वह विष्णुलोक को जाता है। जो मार्ग में राहगीरों के ठहरने के लिए विश्रामशाला इस मास में बनवाता है उसे अनेक तीर्थों के बराबर फल प्राप्त करता है।

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