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इस वर्ष 15 दिन के पितृ पक्ष, जानिए क्यों जरूरी है श्राद्ध ?

September 05th, 2017 11:25 IST
इस वर्ष 15 दिन के पितृ पक्ष, जानिए क्यों जरूरी है श्राद्ध ?

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म में पितृपक्ष की बहुत मान्यता है। 5 सितंबर से पितृपक्ष शुरु हो रहे हैं, जो कि 19 सितंबर तक चलेंगे। पितृपक्ष के इन 16 दिनों में लोग अपने पितरों को जल देते हैं। जिस दिन उनके परिजानों की मृत्यु हुई होती है, उस दिन उनका श्राद्ध करते हैं। कहा जाता है कि ऐसा करने से पितरों की अतृप्त आत्मा को शांति मिलती है और वे अपने वंशजों को आशीर्वाद देते हैं। शास्त्रों में वर्णन मिलता है कि भगवान राम के पिंडदान के बाद ही राजा दशरथ को मोक्ष प्राप्त हुआ था। 

16 की बजाए 15 दिन

बताया जाता है कि पितरों का ऋण श्राद्ध करके चुकाया जाता है। श्राद्ध आश्विन माह के कृष्णपक्ष की प्रतिपदा से अमावस्या तक 15 दिन के होते हैं। इसके अलावा इसमें पूर्णिमा के श्राद्ध के लिए भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा को भी शामिल किया जाता है। इस तरह कुल 16 श्राद्ध होते हैं।  हालांकि इस वर्ष तिथि में फेर की वजह से 16 की बजाए 15 दिन के श्राद्ध पक्ष पड़ रहे हैं।  

नहीं मिलती मुक्ति 

शास्त्रों में उल्लेख है कि जब तक पितरों का श्राद्ध या पिंडदान नहीं किया जाता। उनकी अतृप्त आत्मा मुक्ति नहीं पाती। पितर अपनी संतान के आगमन का हर साल इंतजार करते रहते हैं। और यदि उनके प्रिय नहीं आते तो वे दुखी होकर भूखे ही लौट जाते हैं। कई बार कुपित होकर ये श्राप भी दे देते हैं। जब तक इनकी आत्मा अतृप्त रहती है तब तक परिवार में भी कोई न कोई विपत्ति आती रहती है। 

कौए का महत्व 

ज्योतिष के अनुसार कौए पितर का रूप होते हैं श्राद्ध के दिन पितर कौए का रूप लेकर आते हैं इसलिए श्राद्ध के समय भोजन का बना हुआ पहला खाना कौओं के लिए निकाला जाता है। कहा जाता है कि यदि कौए इसे खाने आ जाएं तो समझिए पितरों ने इसे ग्रहण कर लिया। ऐसी भी मान्यता है कि यदि कौए इसे खाने नहीं आते तो वह कुपित हैं।

ये भी कर सकते हैं श्राद्ध 

श्राद्ध का जिक्र शास्त्रों में भी किया गया है। ब्रह्मवैवर्त पुराण और मनुस्मृति के मुताबिक पितरों को पिंडदान पुत्र, भतीजा, भांजा कर सकते हैं। अगर किसी को संतान नहीं हुई है तो उनके भाई, भतीजे, चाचा और ताऊ के परिवार में से कोई भी पुरुष सदस्य पिंडदान कर सकता है।

सात्विक भोजन का ही लगाएं भोग

श्राद्ध के दिन लहसुन, प्याज रहित सात्विक भोजन ही घर की रसोई में बनना चाहिए। जिसमें उड़द की दालए बडे, चावल, दूध, घी से बने पकवान, खीर, मौसमी सब्जी जैसे तोरई, लौकी, सीतफल, भिण्डी कच्चे केले की सब्जी ही भोजन में मान्य है। आलू, मूली, बैंगन, अरबी तथा जमीन के नीचे पैदा होने वाली सब्जियां पितरों को नहीं चढ़ती है। 

इन बातों का रखें खास ख्याल

- श्राद्ध के दिन अपने पितरों के नाम से ज्यादा से ज्यादा गरीबों को दान करें।
- बताया जाता है कि श्राद्ध दोपहर के बाद ही किया जाना चाहिए। शास्त्रों में इसका जिक्र है कि जब सूर्य की छाया पैरों पर पड़ने लगे तो श्राद्ध का समय हो जाता है।
- ब्राह्राण भोज के वक्त खाना दोनों हाथों से पकड़कर पराेसें, एक हाथ से खाने को पकड़ना अशुभ माना जाता है।
- श्राद्ध के दिन घर में सात्विक भोजन ही बनना चाहिए। इस दिन लहसुन और प्याज का इस्तेमाल खाने में नहीं होना चाहिए।   
- श्राद्ध पूजन के बाद अपने पितरों का स्मरण करें।

महत्वपूर्ण तिथियां 

6 सितंबर- पूर्णिमा/प्रतिपदा
7 सितंबर- द्वितीया
8 सितंबर- तृतीया
9 सितंबर- चतुर्थी/पंचमी
10 सितंबर- पंचमी
11 सितंबर- छठ
12 सितंबर- सप्तमी
13 सितंबर- अष्टमी
14 सितंबर- नवमी
15 सितंबर- दशमी
16 सितंबर- एकादशी
17 सितंबर- द्वादशी
18 सितंबर- त्रयोदशी
19 सितंबर- चतुर्दशी
20 सितंबर- अमावस्या

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