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कामदा एकादशी व्रत, कथा पढ़ने से मिलता है इस यज्ञ के समान फल

कामदा एकादशी व्रत, कथा पढ़ने से मिलता है इस यज्ञ के समान फल

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को कामदा एकादशी कहा जाता है। इस कामदा एकादशी का विशेष महत्व होता है। इसका एक कारण यह भी है कि यह हिंदू संवत्सर की पहली एकादशी होती है। इस बार कामदा एकादशी 15 अप्रैल 2019 को पड़ रही है जो कि बहुत ही फलदायी होती है, इसलिए इसे फलदा एकादशी भी कहा जाता है, मान्यता है कि कामदा एकादशी का व्रत रखने वाले व्रती को प्रेत योनि से भी मुक्त करा सकती है। आइए जानते हैं कामदा एकादशी की व्रत कथा व पूजा विधि के बारे में।

कामदा एकादशी व्रत की पूजा विधि
एकादशी व्रत के दिन स्नानादि के पश्चात शुद्ध होकर निर्मल वस्त्र धारण कर व्रत का संकल्प लेना चाहिए। व्रत का संकल्प लेने के बाद भगवान श्री हरि यानि विष्णु भगवान की फल, फूल, दूध, तिल, पंचामृत इत्यादि सामग्री के साथ पूजा करनी चाहिए। एकादशी व्रत की कथा सुननी चाहिए।

रात्रि में भगवान का भजन-कीर्तन करते हुए जागरण करना चाहिए। द्वादशी के दिन ब्राह्मण या किसी भूखे गरीब को भोजन करवाकर, दान-दक्षिणा देकर संतुष्ट करने पर ही स्वयं भोजन ग्रहण करना चाहिए।

कामदा एकादशी 
कामदा एकादशी का उपवास चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को रखा जाता है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार वर्ष 2019 में कामदा एकादशी का व्रत 15 अप्रैल को पड़ रही है।

कामदा एकादशी का शुभ मुहूर्त 
एकादशी के पारण का समय 16 अप्रैल को 13:38 से 16:10 बजे के मध्य
हरि वासर समय एकादशी समाप्ती 16 अप्रैल को प्रात: 09:39 बजे

एकादशी तिथि प्रारंभ 
15 अप्रैल को प्रातः 07:08 बजे

एकादशी तिथि समाप्त का समय 
16 अप्रैल को प्रात: 04:23 बजे

पौराणिक कथा :-
कथानुसार एक बार धर्मराज युद्धिष्ठिर ने भगवान श्री कृष्ण के सामने चैत्र शुक्ल एकादशी का महत्व, व्रत कथा व पूजा विधि को समझने की जिज्ञासा प्रगट की। तब भगवान श्री कृष्ण ने कहा हे कुंती पुत्र बहुत समय पहले वशिष्ठ मुनि ने यह कथा राजा दिलीप को सुनाई थी वही मैं तुम्हें सुनाने जा रहा हूं।

कथा के अनुसार एक बार एक रत्नपुर नाम का नगर हुआ करता था जिसमें पुण्डरिक नामक राजा राज्य किया करते थे। रत्नपुर का जैसा नाम था वैसा ही उसका वैभव भी था। अनेक अप्सराएं, गंधर्व यहां वास करते थे। यहीं पर ललित और ललिता नामक गंधर्व पति-पत्नी का जोड़ा भी रहता था। ललित और ललिता एक दूसरे से बहुत प्रेम करते थे, यहां तक कि दोनों के लिये क्षण भर की दूर रहना भी पहाड़ जितनी लम्बा हो जाता।

एक दिन राजा पुण्डरिक की सभा में नृत्य का समारोह चल रहा था जिसमें गंधर्व गायन कर रहे थे और अप्सराएं नृत्य कर रही थीं। गंधर्व ललित भी उस दिन सभा में गा रहा था लेकिन गाते-गाते वह अपनी पत्नी ललिता की याद में खो गया जिससे उसका एक पद थोड़ा सुर से बिगड़ गया। कर्कोट नामक नाग ने उसकी इस भूल को भांप लिया और उसके मन में झांक कर इस भूल का कारण जान कर राजा पुण्डरिक को तत्काल बता दिया। तब पुण्डरिक यह जानकर बहुत क्रोधित हुए और ललित को श्राप देकर एक विशालकाय राक्षस बना दिया। 

तब अपने पति की इस स्थिति को देखकर ललिता को बहुत भारी दुख हुआ। वह भी राक्षस योनि में विचरण कर रहे ललित के पीछे- पीछे चलती और उसे इस पीड़ा से मुक्त करने का मार्ग खोजती। एक दिन चलते-चलते वह श्रृंगी ऋषि के आश्रम में जा पंहुची और ललिता ने सारी व्यथा महर्षि के सामने रखदी। तब ऋषि बोले तुम बहुत ही सही समय पर आई हो देवी। अभी चैत्र शुक्ल एकादशी तिथि आने वाली है। इस व्रत को कामदा एकादशी कहा जाता है इसका विधिपूर्वक पालन करके अपने पति को उसका पुण्य देना, उसे राक्षसी जीवन से मुक्ति मिल सकती है। ललिता ने वैसा ही किया जैसा ऋषि श्रृंगी ने उसे बताया था। 

व्रत का पुण्य अपने पति को देते ही वह राक्षस रूप से पुन: अपने सामान्य रूप में आ गया और कामदा एकादशी के व्रत के प्रताप से ललित और ललिता दोनों विमान में बैठकर स्वर्ग लोक में वास करने लगे। मान्यता के अनुसार जगत में कामदा एकादशी के समान कोई अन्य व्रत नहीं है। इस व्रत की कथा को श्रवण अथवा पढ़ने मात्र से ही वाजपेय यज्ञ के समान फल की प्राप्ति होती है।

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