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17 सितंबर को मनाई गई विश्वकर्मा जयंती, जगह-जगह की गई पूजा

17 सितंबर को मनाई गई विश्वकर्मा जयंती, जगह-जगह की गई पूजा

डिजिटल डेस्क। प्रत्येक वर्ष सूर्य के कन्या राशि में प्रवेश होने पर या कन्या सक्रांति पर विश्वकर्मा जयंती मनाई जाती है। हिंदू धर्म के अनुसार इसी दिन देवताओं के शिल्पकार विश्वकर्मा का जन्म हुआ था। इस वर्ष विश्वकर्मा जयंती 17 सितंबर 2019 मंगलवार को मनाई गई । बता दें कि इस दिन कारखानों, उद्योगों, फैक्ट्रियों, हर प्रकार की मशीनों और औजारों की पूजा की जाती है। मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, दिल्ली आदि राज्यों में भगवान विश्वकर्मा की भव्य प्रतिमा स्थापित कर उनकी सेवा आराधना की जाती है। 

महत्व
श्री विश्वकर्मा जी को विश्व के पहले इंजीनियर के रूप में माना गया है। बताया जाता है कि प्राचीन काल में जितनी भी राजधानियां थी, प्राय: सभी को विश्वकर्मा जी ने बनाया है। सतयुग का 'स्वर्ग लोक', त्रेता युग की 'लंका', द्वापर की 'द्वारिका’ हस्तिनापुर' और इन्द्रप्रस्थ आदि सभी विश्वकर्मा जी द्वारा ही रचित हैं। 'सुदामापुरी' की रचना के विषय में भी यह कहा जाता है कि उसके निर्माता विश्वकर्मा जी ही थे।

विश्वकर्मा जयंती के दिन प्रतिष्ठान के सभी औजारों या मशीनों या अन्य उपकरणों की अच्छे से सफाई कर लें। उन पर तिलक लगाएं और फूल भी चढ़ाएं। हाथ में फूल, अक्षत लेकर भगवान विश्वकर्मा का ध्यान करते हुए घर और प्रतिष्ठान में इन्हें छिड़क देना चाहिए।

पूजा विधि
- विश्वकर्मा जयंती के दिन प्रातः काल स्नान आदि करने के बाद पत्नी सहित पूजा स्थान पर बैठें। 
-  इसके बाद विष्णु भगवान का ध्यान करते हुए हाथ में पुष्प, अक्षत लेकर- 
ॐ आधार शक्तपे नम:, ॐ कूमयि नम:, ॐ अनन्तम नम: और ॐ पृथिव्यै नम: 
कहते हुए चारों दिशाओं में अक्षत छिड़कें और पीली सरसों लेकर चारों दिशाओं को बांधे। 
- अपने हाथ में रक्षासूत्र बांधे तथा पत्नी को भी रक्षासूत्र बांधे। 
- पुष्प जल पात्र में छोड़ें। हृदय में भगवान श्री विश्वकर्मा जी का ध्यान करें। 
- रक्षा दीप जलाएं, जल के साथ पुष्प एवं सुपारी लेकर संकल्प करें। 
- शुद्ध भूमि पर अष्टदल (आठ पंखुड़ियों वाला) कमल बनाएं। उस स्थान पर सात अनाज रखें। उस पर मिट्टी और तांबे का जल डालें। 
- इसके बाद पंचपल्लव (पांच वृक्षों के पत्ते), सात प्रकार की मिट्टी, सुपारी, दक्षिणा कलश में डालकर कपड़े से कलश को ढ़क दें। एक अक्षत (चावल) से भरा पात्र समर्पित कर ऊपर - विश्वकर्मा भगवान की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें फिर वरुण देव का आह्वान करें।
- पुष्प चढ़ाकर कहें – हे भगवान् विश्वकर्मा जी, इस प्रतिमा में विराजमान होकर मेरी पूजा को स्वीकार कीजिए। इसके बाद कथा पढ़ें, सुनें और सुनाएं।

विश्वकर्मा जी की प्रचलित कथा :-
एक बार वाराणसी में धार्मिक व्यवहार से चलने वाला एक रथकार अपनी पत्नी के साथ रहता था। वह अपने कार्य में निपुण था, परंतु अनेक नगरों में भ्रमण करने पर भी भोजन से अधिक धन प्राप्त नहीं कर पाता था। अपने पति की भांति रथकार की पत्नी भी पुत्र न होने के कारण बहुत चिंतित रहा करती थी। पुत्र प्राप्ति के लिए वे दोनों साधु-संतों एवं मंदिरों में जाते थे, किन्तु उनका मनोरथ पूर्ण नहीं हो रहा था।

तब एक उनके पड़ोसी ब्राह्मण ने रथकार की पत्नी से कहा कि तुम भगवान विश्वकर्मा जी की शरण में जाओ,  तुम्हारा मनोरथ अवश्य ही पूरा होगा और अमावस्या तिथि को उनका व्रत कर भगवान विश्वकर्मा जी की कथा श्रवण करो। तब से रथकार ने अपनी पत्नी सहित अमावस्या के दिन भगवान विश्वकर्मा की पूजा की, और विश्वकर्मा जी का आशीर्वाद प्राप्त हुआ तब उसे धन-धान्य और पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई और वे सुखी जीवन व्यतीत करने लगे। भारत के अनेक भागों में इस पूजा का बहुत महत्व माना जाता है।

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