जम्मू-कश्मीर की वो पवित्र गुफा, जहां आज भी परिवार संग विराजे हैं महादेव

जम्मू-कश्मीर की वो पवित्र गुफा, जहां आज भी परिवार संग विराजे हैं महादेव
जम्मू-कश्मीर के रियासी जिले में स्थित शिवखोड़ी एक ऐसी पवित्र गुफा है, जिसे देखने और अनुभव करने के लिए हर साल हजारों श्रद्धालु आते हैं। यह गुफा संगर गांव में है और भगवान शिव को समर्पित है। यहां का सबसे बड़ा आकर्षण है इसका स्वयंभू शिवलिंग, जिसे देखकर हर भक्त की श्रद्धा और बढ़ जाती है।

रियासी, 30 मार्च (आईएएनएस)। जम्मू-कश्मीर के रियासी जिले में स्थित शिवखोड़ी एक ऐसी पवित्र गुफा है, जिसे देखने और अनुभव करने के लिए हर साल हजारों श्रद्धालु आते हैं। यह गुफा संगर गांव में है और भगवान शिव को समर्पित है। यहां का सबसे बड़ा आकर्षण है इसका स्वयंभू शिवलिंग, जिसे देखकर हर भक्त की श्रद्धा और बढ़ जाती है।

गुफा प्राकृतिक रूप से बनी है और इसे देखकर ऐसा लगता है कि यह भगवान की बनाई हुई कोई सुरंग हो। गुफा लगभग 200 मीटर लंबी है और इसमें स्वयंभू शिवलिंग, माता पार्वती, गणेश और कार्तिकेय के प्राकृतिक चिन्ह मौजूद हैं। इसके अलावा, यहां नंदी की मूर्ति, पार्वती की मूर्ति और गुफा की छत पर सांप की आकृति जैसी प्राकृतिक संरचनाएं भी हैं, जो अपने आप बनी हैं। यही कारण है कि इसे देखकर हर श्रद्धालु चकित रह जाता है।

महाशिवरात्रि के समय शिव खोड़ी में विशेष मेला लगता है। इस समय पूरे इलाके में भक्तों की भीड़ उमड़ती है और हर कोई भगवान शिव के दर्शन करने के लिए दूर-दूर से आता है। कहा जाता है कि गुफा और इसके आसपास के क्षेत्र में 33 कोटि देवी-देवताओं का निवास है, इसलिए इसे 'देवताओं का घर' भी कहा जाता है।

शिव खोड़ी केवल एक गुफा नहीं, बल्कि आस्था और रहस्य का संगम है। मान्यता है कि भगवान शिव ने भस्मासुर से बचने के लिए इस गुफा में खुद को छिपाया था। पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान शिव ने भस्मासुर को वरदान दिया था कि वो जिसके भी सिर पर हाथ रखेगा, वह भस्म हो जाएगा। भस्मासुर ने इस वर को भगवान शिव पर ही आजमाने की कोशिश की। ऐसे में भगवान शिव इसी गुफा में आकर विराजमान हो गए थे। इसी दौरान भगवान विष्णु सुंदर रूप धारण करके आए और भस्मासुर को अपने ही वर से भस्म कर दिया।

गुफा का एक और रहस्य यह भी है कि कहा जाता है इसका दूसरा छोर अमरनाथ गुफा तक जाता है। इस रहस्य ने शिव खोड़ी को और भी आकर्षक और रहस्यमय बना दिया है। हालांकि इस बात की पुष्टि नहीं हुई है लेकिन स्थानीय मान्यताओं के अनुसार पहले साधु-संत इसी रास्ते से अमरनाथ जाया करते थे।

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Created On :   30 March 2026 3:35 PM IST

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