लक्ष्य हासिल करने के लिए दोगुनी करनी होगी नवीकरणीय ऊर्जा की रफ्तार
नई दिल्ली, 9 अप्रैल (आईएएनएस)। आईआईटी मद्रास की रिसर्च में वैश्विक ऊर्जा को लेकर एक गंभीर व यथार्थवादी स्टडी सामने आई है। इस अध्ययन के अनुसार, अगर वर्तमान गति से ही काम चलता रहा तो नवीकरणीय ऊर्जा वर्ष 2050 तक भी जीवाश्म ईंधनों (कोयला, तेल और गैस) को पीछे नहीं छोड़ पाएगी। हालांकि, शोधकर्ताओं का मानना है कि बहुत तेज और आक्रामक प्रयासों की स्थिति में यह लक्ष्य 2040 के दशक के अंत तक हासिल हो सकता है।
इस अध्ययन के मुताबिक वैश्विक जलवायु लक्ष्यों को हासिल करने के लिए तुरंत बड़े पैमाने पर निवेश बढ़ाने की जरूरत है। खासकर नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश को कम से कम दोगुना करना होगा। इसके साथ ही बिजली ग्रिड और ऊर्जा भंडारण (स्टोरेज) पर खर्च लगभग 73 प्रतिशत तक बढ़ाना जरूरी है। आईआईटी मद्रास का यह शोध एक प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग जर्नल में प्रकाशित हुआ है। इसमें वैज्ञानिकों ने पिछले 10 वर्षों के आंकड़ों के आधार पर यह विश्लेषण किया है।
शोध में यह स्वीकार किया गया है कि वैश्विक स्तर पर नवीकरणीय ऊर्जा की दिशा में प्रगति तो हुई है, लेकिन यह प्रगति अभी भी आवश्यकता के अनुरूप पर्याप्त नहीं है। आईआईटी के शोधकर्ताओं का स्पष्ट कहना है कि तकनीक उपलब्ध है, लेकिन दुनियाभर में अभी भी उस गति और स्तर पर निवेश नहीं हो रहा है, जितनी आवश्यकता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, नवीकरणीय ऊर्जा के लक्ष्यों और उसके लिए की जा रही वास्तविक कार्रवाई के बीच का अंतर अभी भी काफी बड़ा है। शोधकर्ताओं के मुताबिक वर्तमान वृद्धि दर लगभग 5.48 फीसदी प्रति वर्ष है। इसके अनुसार नवीकरणीय ऊर्जा 50 को प्रतिशत हिस्सेदारी तक पहुंचने में 2047 से 2053 तक का समय लगेगा। वहीं अगर यह वृद्धि दर दोगुनी यानी लगभग 10.96 प्रतिशत हो जाए तो ऐसे में यह लक्ष्य 2035 से 2037 के बीच हासिल किया जा सकता है। हालांकि सबसे धीमे परिदृश्य में यह लक्ष्य 2074 तक भी नहीं मिल पाएगा, या सदी के अंत तक भी संभव नहीं होगा।
रिसर्च बताती है कि पिछले एक दशक में नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता में 128 प्रतिशत की वृद्धि हुई है और यह 3869.7 गीगावाट तक पहुंच गई है। इसके बावजूद, यह कुल वैश्विक ऊर्जा खपत का केवल 14.56 फीसदी ही हिस्सा है। वहीं, जीवाश्म ईंधन यानी कोयला, तेल और गैस आदि अभी भी दुनिया की 81 प्रतिशत से अधिक ऊर्जा जरूरतों को पूरा कर रहे हैं। यह ईंधन 95 प्रतिशत से ज्यादा कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार हैं। वहीं भारत के सामने एक जटिल चुनौती है।
एक तरफ देश तेजी से विकास कर रहा है और ऊर्जा की मांग बढ़ रही है, वहीं दूसरी तरफ पर्यावरणीय लक्ष्यों को भी पूरा करना है। भारत ने 2030 तक 485 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता हासिल करने का लक्ष्य रखा है। इसमें सौर, पवन, जल विद्युत और बायोएनर्जी शामिल हैं। यह लक्ष्य न केवल भारत बल्कि दुनिया के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है।
आईआईटी द्वारा किया गया अध्ययन यह भी बताता है कि सिर्फ नवीकरणीय ऊर्जा के भरोसे 2050 तक नेट-जीरो लक्ष्य हासिल करना मुश्किल होगा। इसके लिए कई अन्य उपायों की भी जरूरत होगी। इनमें कार्बन कैप्चर और भंडारण तकनीक, उन्नत ऊर्जा भंडारण (बैटरी, पंप्ड हाइड्रो, ग्रीन हाइड्रोजन), ऊर्जा दक्षता में सुधार व स्मार्ट ग्रिड का विकास शामिल है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह अध्ययन एक स्पष्ट चेतावनी देता है कि केवल लक्ष्य तय करना पर्याप्त नहीं है। यदि दुनिया को समय पर जलवायु संकट से निपटना है, तो तुरंत ठोस कदम उठाने होंगे। बड़े स्तर पर निवेश, नीतिगत सुधार और तकनीकी विकास के बिना 2050 तक नेट-जीरो का लक्ष्य हासिल करना बेहद कठिन होगा।
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Created On :   9 April 2026 6:14 PM IST












