संपूर्ण अयोध्या कांड: 1528 में बाबर ने बनवाई थी मस्जिद, जानें 500 साल के इतिहास में कब-कब, क्या-क्या हुआ

संपूर्ण अयोध्या कांड: 1528 में बाबर ने बनवाई थी मस्जिद, जानें 500 साल के इतिहास में कब-कब, क्या-क्या हुआ

Bhaskar Hindi
Update: 2020-08-05 01:10 GMT
संपूर्ण अयोध्या कांड: 1528 में बाबर ने बनवाई थी मस्जिद, जानें 500 साल के इतिहास में कब-कब, क्या-क्या हुआ

डिजिटल डेस्क, अयोध्या। 500 वर्षों से भी ज्यादा की जद्दोजहद, संघर्ष और आंदोलन के बाद आज (बुधवार, 5 अगस्त) को राम मंदिर निर्माण के लिए भूमिपूजन होने जा रहा है। राम की नगरी अयोध्या भूमि पूजन के लिए पूरी तरह सज धज कर तैयार है। अयोध्या में राम मंदिर के भूमि पूजन की तैयारियां लगभग पूरी हो चुकी हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भूमि पूजन करेंगे, जिसके बाद राम मंदिर का निर्माण कार्य तेजी से शुरू हो जाएगा। सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं और साथ ही कोरोना संकट के कारण सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों का ख्याल भी रखा जा रहा है। 

लोगों को जिस घड़ी का इंतजार था आखिर वो आ ही गया। अब से कुछ ही छणों बाद भगवान राम के मंदिर का निर्माण पीएम मोदी के नीव रखते ही आखिरकार शुरू हो जाएगा। लेकिन, यह दिन ऐसे ही नहीं आ गया। इस दिन के पीछे लोगों का 5 शताब्दी से भी ज्यादा का संघर्ष है। असल में पूरा विवाद 1528 से शुरू हुआ था। मुगल बादशाह बाबर ने विवादित जगह पर मस्जिद का निर्माण कार्य कराया। हालांकि, हिंदुओं का दावा था कि यहां पर भगवान राम का जन्म हुआ। आईए जानते तब से आज तक का इतिहास...

 

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1528 में बाबर ने बनाई बाबरी मस्जिद
अयोध्या के रामकोट मुहल्ले में एक टीले पर लगभग 500 साल पहले वर्ष 1528 से 1530 में बनी मस्जिद पर लगे शिलालेख और सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक यह मस्जिद हमलावर मुगल बादशाह बाबर के आदेश पर उसके गवर्नर मीर बाकी ने बनवाई। लेकिन, इसका कोई रिकॉर्ड नहीं है कि बाबर अथवा मीर बाकी ने यह जमीन कैसे हासिल की और मस्जिद से पहले वहां क्या था? मस्जिद के रख-रखाव के लिए मुगल काल, नवाबी और फिर ब्रिटिश शासन में वक्फ के जरिए एक निश्चित रकम मिलती थी। ऐसा कहा-सुना जाता है कि इस मस्जिद को लेकर स्थानीय हिंदुओं और मुसलमानों में कई बार संघर्ष हुए।

साल 1813 में पहली बार किया गया था मंदिर को लेकर दावा
ब्रिटिश हुकूमत के वक्त साल 1813 में हिंदू संगठनों ने पहली बार यह दावा किया था कि वर्ष 1526 में जब बाबर आया तो उसने राम मंदिर को तुड़वाकर ही विवादित ढांचे का निर्माण कराया था। उसी के नाम पर विवादित ढांचे को बाबरी मस्जिद नाम से जाना गया। उस वक्त भी दोनों पक्षों के बीच हिंसात्मक घटनाएं हुई थीं। 

1855 की में हनुमान गढ़ी पर भी हुआ था हमला
अनेक ब्रिटिश इतिहासकारों ने लिखा है कि 1855 में नवाबी शासन के दौरान मुसलमानों ने बाबरी मस्जिद पर जमा होकर कुछ सौ मीटर दूर अयोध्या के सबसे प्रतिष्ठित हनुमानगढ़ी मंदिर पर कब्जे के लिए धावा बोला। उनका दावा था कि यह मंदिर एक मस्जिद तोड़कर बनाई गई थी। तब खूनी संघर्ष में हिंदू वैरागियों ने हमलावरों को हनुमान गढ़ी से खदेड़ दिया, जो भागकर बाबरी मस्जिद परिसर में छिपे, लेकिन वहां भी तमाम मुस्लिम हमलावर मारे गए, जो वहीं कब्रिस्तान में दफन हुए।

कई गजेटियर्स में मंदिर के पहले से होने का उल्लेख
कई गजेटियर्स, विदेशी यात्रियों के संस्मरणों और पुस्तकों में उल्लेख है कि हिंदू समुदाय पहले से इस मस्जिद के आसपास की जगह को राम जन्मस्थान मानते हुए पूजा और परिक्रमा करता था।

1857 में हिंदू संगठनों ने बनाया चबूतरा
1857 में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद नवाबी शासन समाप्त होने पर ब्रिटिश कानून, शासन और न्याय व्यवस्था लागू हुई। माना जाता है कि इसी दरम्यान हिंदुओं ने मस्जिद के बाहरी हिस्से पर कब्जा करके चबूतरा बना लिया और भजन-पूजा शुरू कर दी, जिसको लेकर वहां झगड़े होते रहते थे।

1858 में मौलवी ने अंग्रेजों से शिकायत
बाबरी मस्जिद के एक कर्मचारी मौलवी मोहम्मद असगर ने 30 नवंबर 1858 को लिखित शिकायत की कि हिंदू वैरागियों ने मस्जिद से सटाकर एक चबूतरा बना लिया है और मस्जिद की दीवारों पर राम-राम लिख दिया है। 

1859 में अंग्रेजों ने मंदिर और चबूतरे के बीच बनवाई दीवार
शांति व्यवस्था कायम करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने साल 1859 में विवादित जगह पर तार की एक बाड़ बनवा दी। यही नहीं प्रशासन ने चबूतरे और मस्जिद के बीच दीवार बना दी, लेकिन मुख्य दरवाजा एक ही रहा। इसके बाद भी मुसलमानों की तरफ से लगातार लिखित शिकायतें होती रहीं कि हिंदू वहां नमाज में बाधा डाल रहे हैं।

1883 में निर्मोही अखाड़ा ने डिप्टी कमिश्नर से मंदिर की अनुमति मांगी
अप्रैल 1883 में निर्मोही अखाड़ा ने डिप्टी कमिश्नर फैजाबाद को अर्जी देकर मंदिर बनाने की अनुमति मांगी, लेकिन मुस्लिम समुदाय की आपत्ति पर अर्जी नामंजूर हो गई। इसी बीच मई 1883 में ही मुंशी रामलाल और राममुरारी राय बहादुर का लाहौर निवासी कारिंदा गुरमुख सिंह पंजाबी वहां पत्थर वगैरह सामग्री लेकर आ गया और प्रशासन से मंदिर बनाने की अनुमति मांगी, लेकिन डिप्टी कमिश्नर ने वहां से पत्थर हटवा दिए।

1885 में पहली बार महंत रघुबर दास ने मंदिर को लेकर याचिका लगाई
निर्मोही अखाड़े के महंत रघुबर दास ने चबूतरे को राम जन्म स्थान बताते हुए भारत सरकार और मोहम्मद असगर के खिलाफ सिविल कोर्ट में पहला मुकदमा 29 जनवरी 1885 को दायर किया। मुकदमे में 17X21 फीट लम्बे-चौड़े चबूतरे को जन्मस्थान बताया गया और वहीं पर मंदिर बनाने की अनुमति मांगी गई, ताकि पुजारी और भगवान दोनों धूप, सर्दी और बारिश से निजात पाएं।

पहली बार ढांचा साल 1934 में गिराया गया
साल 1934 में विवादित क्षेत्र को लेकर हिंसा भड़की। इस दौरान पहली बार विवादित हिस्सा तोड़ा गया। तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने तब इसकी मरम्मत कराई। इसके बाद 23 दिसंबर 1949 को हिंदुओं ने ढांचे के केंद्र स्थल पर रामलला की प्रतिमा रखकर पूजा-अर्चना शुरू की। इसके बाद से ही मुस्लिम पक्ष ने यहां नमाज पढ़ना बंद कर दिया और वह कोर्ट चला गया।

इसमें दावा किया गया कि वह इस जमीन के मालिक हैं और उनका मौक़े पर कब्जा है। सरकारी वक़ील ने जवाब में कहा कि वादी को चबूतरे से हटाया नहीं गया है, इसलिए मुक़दमे का कोई कारण नहीं बनता। मोहम्मद असगर ने अपनी आपत्ति में कहा कि प्रशासन बार-बार मंदिर बनाने से रोक चुका है। 

जज पंडित हरिकिशन ने मौका मुआयना किया और पाया कि चबूतरे पर भगवान राम के चरण बने हैं और मूर्ति थी, जिनकी पूजा होती थी। इसके पहले हिंदू और मुस्लिम दोनों यहां पूजा और नमाज पढ़ते थे, यह दीवार झगड़ा रोकने के लिए खड़ी की गई। जज ने मस्जिद की दीवार के बाहर चबूतरे और जमीन पर हिंदू पक्ष का कब्जा भी सही पाया। इतना सब रिकॉर्ड करने के बाद जज पंडित हारि किशन ने यह भी लिखा कि चबूतरा और मस्जिद बिलकुल अगल-बगल हैं, दोनों के रास्ते एक हैं और मंदिर बनेगा तो शंख, घंटे वगैरह बजेंगे, जिससे दोनों समुदायों के बीच झगड़े होंगे लोग मारे जाएंगे इसीलिए प्रशासन ने मंदिर बनाने की अनुमति नहीं दी। जज ने यह कहते हुए निर्मोही अखाड़ा के महंत को चबूतरे पर मंदिर बनाने की अनुमति देने से इनकार कर दिया कि ऐसा करना भविष्य में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच दंगों की बुनियाद डालना होगा। इस तरह मस्जिद के बाहरी परिसर में मंदिर बनाने का पहला मुकदमा निर्मोही अखाड़ा साल भर में हार गया।

डिस्ट्रिक्ट जज चैमियर की कोर्ट में अपील दाख़िल हुई। मौका मुआयना के बाद उन्होंने तीन महीने के अंदर फैसला सुना दिया। फैसले में डिस्ट्रिक्ट जज ने कहा कि हिंदू जिस जगह को पवित्र मानते हैं वहां मस्जिद बनाना बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है, लेकिन चूंकि यह घटना 356 साल पहले की है इसलिए अब इस शिकायत का समाधान करने के लिए बहुत देर हो गई है। जज के मुताबिक, "इसी चबूतरे को राम चंद्र का जन्मस्थान कहा जाता है।" जज ने यह भी कहा कि मौजूदा हालत में बदलाव से कोई लाभ होने के बजाय नुकसान ही होगा। चैमियर ने सब जज हरि किशन के जजमेंट का यह अंश अनावश्यक कहते हुए खारिज कर दिया कि चबूतरे पर पुराने समय से हिंदुओं का कब्जा है और उसके स्वामित्व पर कोई सवाल नहीं उठ सकता।

1886 में निर्मोही अखाड़ा की दूसरी अपील
निर्मोही अखाड़ा ने इसके बाद अवध के जुडिशियल कमिश्नर डब्लू यंग की अदालत में दूसरी अपील की। जुडिशियल कमिश्नर यंग ने 1 नवंबर 1886 को अपने जजमेंट में लिखा कि अत्याचारी बाबर ने 350 साल पहले जान-बूझकर ऐसे पवित्र स्थान पर मस्जिद बनाई, जिसे हिंदू रामचंद्र का जन्मस्थान मानते हैं। इस समय हिंदुओं को वहां जाने का सीमित अधिकार मिला है और वे सीता-रसोई और रामचंद्र की जन्मभूमि पर मंदिर बनाकर अपना दायरा बढ़ाना चाहते हैं। जजमेंट में यह भी कह दिया गया कि रिकॉर्ड में ऐसा कुछ नहीं है, जिससे हिंदू पक्ष का किसी तरह का स्वामित्व दिखे। 

इन तीनों अदालतों ने अपने फैसले में विवादित स्थल के बारे में हिंदुओं की आस्था, मान्यता और जनश्रुति का उल्लेख तो किया, लेकिन अपने फैसले का आधार रिकॉर्ड पर उपलब्ध सबूतों को बनाया और शांति व्यवस्था की तत्कालीन जरूरत पर ज्यादा ध्यान दिया।

1934 में भी तोड़ी गई थी बाबरी मस्जिद
1934 में बकरीद के दिन पास के एक गांव में गोहत्या को लेकर दंगा हुआ, जिसमें बाबरी मस्जिद को नुकसान पहुंचा। लेकिन, ब्रिटिश सरकार ने इसकी मरम्मत करवा दी।

1936 में शिया और सुन्नी की लड़ाई
1936 में मुसलमानों के दो समुदायों शिया और सुन्नी के बीच इस बात पर कानूनी विवाद उठ गया कि मस्जिद किसकी है। वक्फ कमिश्नर ने इस पर जांच बैठाई। मस्जिद के मुतवल्ली यानी मैनेजर मोहम्मद जकी का दावा था कि मीर बाकी शिया था, इसलिए यह शिया मस्जिद हुई। लेकिन, जिला वक्फ कमिश्नर मजीद ने 8 फरवरी 1941 को अपनी रिपोर्ट में कहा कि मस्जिद की स्थापना करने वाला बादशाह सुन्नी था और उसके इमाम तथा नमाज पढ़ने वाले सुन्नी हैं, इसलिए यह सुन्नी मस्जिद हुई।

1946 में शिया समुदाय का दावा खारिज
इसके बाद शिया वक्फ बोर्ड ने सुन्नी वक्फ बोर्ड के खिलाफं फैजाबाद के सिविल जज की कोर्ट में मुकदमा कर दिया। सिविल जज एसए अहसान ने 30 मार्च 1946 को शिया समुदाय का दावा खारिज कर दिया। यह मुकदमा इसलिए प्रासंगिक है, क्योंकि आज भी शिया समुदाय के कुछ नेता इसे अपनी मस्जिद बताते हुए मंदिर निर्माण के लिए जमीन देने की बात करते हैं।

जब अंग्रेजी राज खत्म होने को आया तो हिंदुओं की तरफ से फिर चबूतरे पर मंदिर निर्माण की हलचल हुई, लेकिन सिटी मजिस्ट्रेट शफी ने दोनों समुदायों के परामार्श से लिखित आदेश पारित किया कि न तो चबूतरा पक्का बनाया जाएगा, न मूर्ति रखी जाएगी और दोनों पक्ष यथास्थिति बहाल रखेंगे। इसके बाद भी मुसलमानों की ओर से लिखित शिकायतें आती रहीं कि हिंदू वैरागी नमाजियों को परेशान करते हैं। देश विभाजन के बाद बड़ी तादाद में अवध के मुसलमान, खास तौर पर रसूख वाले लोग, पाकिस्तान चले गए।

1948 वक्फ इंस्पेक्टर की शिकायत 
वक्फ इंस्पेक्टर मोहम्मद इब्राहिम 10 दिसंबर 1948 को अपनी रिपोर्ट में मस्जिद पर खतरे के बारे में प्रशासन को विस्तार से सतर्क करते हैं। उन्होंने लिखा कि हिंदू वैरागी वहां मस्जिद के सामने तमाम कब्रों-मजारों को साफ करके रामायण पाठ कर रहे हैं और वे जबरन मस्जिद पर कब्जा कर रहे हैं।

1949 उत्तरप्रदेश का चुनावी मुद्दा बना 
इसी बीच समाजवादियों ने कांग्रेस से अलग होकर अपनी पार्टी बनाई और आचार्य नरेंद्र देव समेत सभी विधायकों ने विधानसभा से त्यागपत्र दे दिया। मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत ने अयोध्या उपचुनाव में आचार्य नरेंद्र देव के खिलाफ एक बड़े हिंदू संत बाबा राघव दास को उम्मीदवार बनाया। ये चुनाव भी जीत गए और इससे मंदिर समर्थकों के हौसले बुलंद हुए और उन्होंने जुलाई 1949 में उत्तर प्रदेश सरकार को पत्र लिखकर फिर से मंदिर निर्माण की अनुमति मांगी। उत्तर प्रदेश सरकार के उप-सचिव केहर सिंह ने 20 जुलाई 1949 को फैजाबाद डिप्टी कमिश्नर केके नायर से जल्दी से अनुकूल रिपोर्ट मांगते हुए पूछा कि वह जमीन नजूल की है या नगरपालिका की।

सिटी मजिस्ट्रेट गुरुदत्त सिंह ने 10 अक्टूबर को कलेक्टर को अपनी रिपोर्ट दी, जिसमें उन्होंने कहा कि वहां मौके पर मस्जिद के बगल में एक छोटा-सा मंदिर है। इसे राम जन्मस्थान मानते हुए हिंदू समुदाय एक सुंदर और विशाल मंदिर बनाना चाहता है। सिटी मजिस्ट्रेट ने सिफारिश की कि यह नजूल की जमीन है और मंदिर निर्माण की अनुमति देने में कोई रुकावट नहीं है।

1949 में मस्जिद के अंदर मूर्तियां
हिंदू वैरागियों ने अगले महीने 24 नवंबर से मस्जिद के सामने कब्रिस्तान को साफ़ करके वहां यज्ञ और रामायण पाठ शुरू कर दिया, जिसमें काफी भीड़ जुटी। झगड़ा बढ़ता देखकर वहां एक पुलिस चौकी बनाकर सुरक्षा में अर्धसैनिक बल पीएसी लगा दी गई। पीएसी तैनात होने के बावजूद 22-23 दिसंबर 1949 की रात अभय रामदास और उनके साथियों ने दीवार फांदकर राम-जानकी और लक्ष्मण की मूर्तियां मस्जिद के अंदर रख दीं और यह प्रचार किया कि भगवान राम ने वहां प्रकट होकर अपने जन्मस्थान पर वापस कब्जा प्राप्त कर लिया है। मुस्लिम समुदाय के लोग शुक्रवार सुबह की नमाज के लिए आए मगर प्रशासन ने उनसे कुछ दिन की मोहलत मांगकर उन्हें वापस कर दिया। मुसलमानों ने इस पर विरोध व्यक्त किया और दोनों पक्षों ने अदालत में मुकदमा दायर कर दिया। सरकार ने इस स्थल को विवादित घोषित करके ताला लगा दिया।

जवाहर लाल नेहरु का पत्र
दिल्ली में नाराज प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने 26 दिसंबर को मुख्यमंत्री पंत को तार भेजकर कहा कि अयोध्या की घटना से मैं बहुत विचलित हूं। मुझे पूरा विश्वास है कि आप इस मामले में व्यक्तिगत रुचि लेंगे। खतरनाक मिसाल कायम की जा रही है, जिसके परिणाम बुरे होंगे।

आजाद भारत में ऐसे बना बड़ा मुद्दा
साल 1950 में फैजाबाद की अदालत से गोपाल सिंह विशारद ने रामलला की पूजा-अर्चना करने के लिए विशेष अनुमति मांगी थी। 16 जनवरी 1950 को गोपाल सिंह विशारद ने सिविल जज की अदालत में, सरकार, ज़हूर अहमद और अन्य मुसलमानों के खिलाफ मुकदमा दायर कर कहा कि जन्मभूमि पर स्थापित भगवान श्रीराम और अन्य मूर्तियों को हटाया न जाए और उन्हें दर्शन और पूजा के लिए जाने से रोका न जाए। सिविल जज ने उसी दिन यह स्थागनादेश जारी कर दिया, जिसे बाद में मामूली संशोधनों के साथ जिला जज और हाईकोर्ट ने भी अनुमोदित कर दिया।

इसके बाद दिसंबर 1959 में निर्मोही अखाड़े ने विवादित स्थल को उसे हस्तांतरित करने और दिसंबर 1961 में उत्तर प्रदेश सुन्नी वक्फ बोर्ड ने विवादित ढांचे के मालिकाना हक के लिए मुकदमा दायर कर दिया। इस तरह आजाद भारत में राम मंदिर का मुद्दा एक बार फिर बड़ा मुद्दा बनना शुरू हो गया। 1961 में सुन्नी वक्फ बोर्ड और 9 स्थानीय मुसलमानों की ओर से चौथा कुकदमा दायर हुआ। इसमें न केवल मस्जिद बल्कि अगल-बगल कब्रिस्तान की जमीनों पर भी स्वामित्व का दावा किया गया।

मंदिर-मस्जिद की राजनीति   
इमरजेंसी के बाद 1977 में जनसंघ और अन्य विपक्षी दलों के विलय से बनी जनता पार्टी ने इंदिरा गांधी को सत्ता से बेदखल कर दिया, लेकिन इनकी आपसी फूट से सरकार तीन साल भी नहीं पूरे नहीं कर पाई। इंदिरा गांधी 1980 में सत्ता में वापस आ गईं। संघ परिवार ने मंथन शुरू किया कि अगले चुनाव से पहले हिंदुओं को कैसे राजनीतिक रूप से एकजुट करें? हिंदुओं के तीन सबसे प्रमुख आराध्य राम, कृष्ण और शिव से जुड़े स्थानों अयोध्या, मथुरा और काशी की मस्जिदों को केंद्र बनाकर आंदोलन छेड़ने की रणनीति बनीं। 7-8 अप्रैल को दिल्ली के विज्ञान भवन में धर्म संसद का आयोजन कर तीनों धर्म स्थानों की मुक्ति का प्रस्ताव पास किया गया। चूंकि काशी और मथुरा में स्थानीय समझौते से मस्जिद से सटकर मंदिर बन चुके हैं। इसलिए पहले अयोध्या पर फोकस करने का निर्णय किया गया।

1984 राम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति का गठन
27 जुलाई 1984 को राम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति का गठन हुआ। एक मोटर का रथ बनाया गया, जिसमें राम-जानकी की मूर्तियों को अंदर कैद दिखाया गया। 25 सितंबर को यह रथ बिहार के सीतामढ़ी से रवाना हुआ, 8 अक्टूबर को अयोध्या पहुंचते-पहुंचते हिंदू जन समुदाय में अपने आराध्य को इस लाचार हालत में देखकर आक्रोश और सहानुभूति पैदा हुई। मुख्य मांग यह थी कि मस्जिद का ताला खोलकर जमीन मंदिर निर्माण के लिए हिन्दुओं को दे दी जाए। इसके लिए साधु-संतों का राम जन्मभूमि न्यास बनया गया। प्रबल जन समर्थन जुटाती हुई यह यात्रा लखनऊ होते हुए 31 अक्टूबर को दिल्ली पहुंची। उसी दिन इंदिरा गांधी की हत्या के कारण उत्पन्न अशांति के कारण दो नवंबर को प्रस्तावित विशाल हिंदू सम्मेलन और आगे के कार्यक्रम स्थगित करना पड़ा।

विश्व हिंदू परिषद ने भी बनाया मुद्दा
विश्व हिंदू परिषद ने साल 1984 में विवादत ढांचे के ताले खोलने, राम जन्मभूमि को स्वतंत्र कराने और यहां विशाल मंदिर निर्माण के लिए एक अभियान शुरू किया। इस दौरान देशभर में जगह-जगह प्रदर्शन किए गए। विहिप के साथ भारतीय जनता पार्टी ने भी इस मुद्दे को हिंदू अस्मिता के साथ जोड़ते हुए संघर्ष शुरू किया। बाद में इस अभियान का नेतृत्व भारतीय जनता पार्टी के एक प्रमुख नेता लालकृष्ण आडवाणी ने संभाल लिया।

बाबरी एक्शन कमेटी 1986 में बनाई गई
कोर्ट में चल रहे मामले के दौरान साल 1986 में फैजाबाद जिला न्यायाधीश की ओर से पूजा की इजाजत दी गई तब ताले दोबारा खोले गए। हालांकि इससे नाराज मुस्लिम पक्ष ने बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी गठित करने का फैसला लिया।

1989 में मंदिर के नजदीक नीव रखी
विश्व हिंदू परिषद ने राम मंदिर निर्माण के लिए अभियान तेज किया और विवादित स्थल के नजदीक राम मंदिर की नींव रखी।

1990 में बाबरी मस्जिद को कुछ नुकसान पहुंचाया
विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं ने बाबरी मस्जिद को कुछ नुकसान पहुंचाया। तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने वार्ता के जरिए विवाद सुलझाने के प्रयास किए मगर अगले वर्ष वार्ताएं विफल हो गईं। 

1992 में बाबरी मस्जिद ढहा दी गई
6 दिसंबर को कारसेवकों ने भारी संख्या में अयोध्या पहुंचकर विवादित ढांचा एक बार फिर ढहा दिया। इसके परिणाम स्वरूप देश भर में हिंदू और मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे, जिसमें 2000 से ज्यादा लोग मारे गए। इसी दौरान अस्थाई राम मंदिर भी बनाया गया। इसके बाद से ही मंदिर निर्माण के लिए पत्थरों को तराशने के काम में तेजी भी आई। दिसंबर 1992 में ही लिब्रहान आयोग गठित किया गया। 

2001 में फिर बढ़ा तनाव
बाबरी मस्जिद विध्वंस की बरसी पर तनाव बढ़ गया और विश्व हिंदू परिषद ने विवादित स्थल पर राम मंदिर निर्माण करने के अपना संकल्प दोहराया।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साल 2002 में सुनवाई शुरू की
अयोध्या के विवादित स्थल पर मालिकाना हक को लेकर साल 2002 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के तीन न्यायधीशों की खंडपीठ ने सुनवाई शुरू की। इसके बाद मार्च-अगस्त 2003 में हाईकोर्ट से मिले निर्देश पर पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने विवादित स्थल पर खुदाई की। विभाग ने दावा किया कि खुदाई में विवादित ढांचे के नीचे मंदिर के अवशेष होने के प्रमाण मिले हैं। विवाद सुलझाने के लिए प्रधानमंत्री वाजपेयी ने अयोध्या समिति का गठन किया। वरिष्ठ अधिकारी शत्रुघ्न सिंह को हिंदू और मुसलमान नेताओं के साथ बातचीत के लिए नियुक्त किया गया।

फरवरी 2002 में गुजरात दंगे हुए 
भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए अपने घोषणा पत्र में राम मंदिर निर्माण के मुद्दे को शामिल करने से इनकार कर दिया। विश्व हिंदू परिषद ने 15 मार्च से राम मंदिर निर्माण कार्य शुरु करने की घोषणा कर दी। सैकड़ों हिंदू कार्यकर्ता अयोध्या में इकठ्ठा हुए। अयोध्या से लौट रहे हिंदू कार्यकर्ता जिस रेलगाड़ी में यात्रा कर रहे थे उस पर गोधरा में हुए हमले में 58 कार्यकर्ता मारे गए।

2002 में कोर्ट ने यथास्थिति बरकरार रखने को कहा
13 मार्च को सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि अयोध्या में यथास्थिति बरक़रार रखी जाएगी और किसी को भी सरकार द्वारा अधिग्रहीत जमीन पर शिलापूजन की अनुमति नहीं होगी। केंद्र सरकार ने कहा कि अदालत के फैसले का पालन किया जाएगा।

15 मार्च, 2002: विश्व हिंदू परिषद और केंद्र सरकार के बीच इस बात को लेकर समझौता हुआ कि विहिप के नेता सरकार को मंदिर परिसर से बाहर शिलाएं सौंपेंगे। रामजन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष महंत परमहंस रामचंद्र दास और विहिप के कार्यकारी अध्यक्ष अशोक सिंघल के नेतृत्व में लगभग आठ सौ कार्यकर्ताओं ने सरकारी अधिकारी को अखाड़े में शिलाएं सौंपीं।

22 जून, 2002: विश्व हिंदू परिषद ने मंदिर निर्माण के लिए विवादित भूमि के हस्तांतरण की माँग उठाई।

जनवरी 2003: रेडियो तरंगों के जरिए ये पता लगाने की कोशिश की गई कि क्या विवादित राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद परिसर के नीचे किसी प्राचीन इमारत के अवशेष दबे हैं, कोई पक्का निष्कर्ष नहीं निकला।

मार्च 2003: केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से विवादित स्थल पर पूजापाठ की अनुमति देने का अनुरोध किया जिसे ठुकरा दिया गया।

अप्रैल 2003: इलाहाबाद हाइकोर्ट के निर्देश पर पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग ने विवादित स्थल की खुदाई शुरू की, जून महीने तक खुदाई चलने के बाद आई रिपोर्ट में कहा गया है कि उसमें मंदिर से मिलते जुलते अवशेष मिले हैं।

मई 2003: सीबीआई ने 1992 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के मामले में उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी सहित आठ लोगों के खिलाफ पूरक आरोपपत्र दाखिल किए.

जून 2003: कांची पीठ के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती ने मामले को सुलझाने के लिए मध्यस्थता की और उम्मीद जताई कि जुलाई तक अयोध्या मुद्दे का हल निश्चित रूप से निकाल लिया जाएगा, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।

अगस्त 2003: भाजपा नेता और उप प्रधानमंत्री ने विहिप के इस अनुरोध को ठुकराया कि राम मंदिर बनाने के लिए विशेष विधेयक लाया जाए।

अप्रैल 2004: आडवाणी ने अयोध्या में अस्थायी राममंदिर में पूजा की और कहा कि मंदिर का निर्माण जरूर किया जाएगा।

जुलाई 2004: शिव सेना प्रमुख बाल ठाकरे ने सुझाव दिया कि अयोध्या में विवादित स्थल पर मंगल पांडे के नाम पर कोई राष्ट्रीय स्मारक बना दिया जाए।

जनवरी 2005: लालकृष्ण आडवाणी को अयोध्या में छह दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद के विध्वंस में उनकी कथित भूमिका के मामले में अदालत में तलब किया गया।

जुलाई 2005: 5 हथियारबंद चरमपंथियों ने विवादित परिसर पर हमला किया जिसमें पाँचों चरमपंथियों सहित छह लोग मारे गए, हमलावर बाहरी सुरक्षा घेरे के नजदीक ही मार डाले गए।

06 जुलाई 2005 : इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बाबरी मस्जिद गिराए जाने के दौरान "भड़काऊ भाषण" देने के मामले में लालकृष्ण आडवाणी को भी शामिल करने का आदेश दिया। इससे पहले उन्हें बरी कर दिया गया था।

28 जुलाई 2005 : लालकृष्ण आडवाणी 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में गुरुवार को रायबरेली की एक अदालत में पेश हुए। अदालत ने लालकृष्ण आडवाणी के खिलाफ आरोप तय किए।

04 अगस्त 2005: फैजाबाद की अदालत ने अयोध्या के विवादित परिसर के पास हुए हमले में कथित रूप से शामिल चार लोगों को न्यायिक हिरासत में भेजा।

20 अप्रैल 2006 : कांग्रेस के नेतृत्ववाली यूपीए सरकार ने लिब्रहान आयोग के समक्ष लिखित बयान में आरोप लगाया कि बाबरी मस्जिद को ढहाया जाना सुनियोजित षड्यंत्र का हिस्सा था और इसमें भाजपा, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, बजरंग दल और शिव सेना की "मिलीभगत" थी।

जुलाई 2006 : सरकार ने अयोध्या में विवादित स्थल पर बने अस्थाई राम मंदिर की सुरक्षा के लिए बुलेटप्रूफ कांच का घेरा बनाए जाने का प्रस्ताव किया। इस प्रस्ताव का मुस्लिम समुदाय ने विरोध किया और कहा कि यह अदालत के उस आदेश के खिलाफ है, जिसमें यथास्थिति बनाए रखने के निर्देश दिए गए थे।

19 मार्च 2007: कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने चुनावी दौरे के बीच कहा कि अगर नेहरू-गांधी परिवार का कोई सदस्य प्रधानमंत्री होता तो बाबरी मस्जिद न गिरी होती। उनके इस बयान पर तीखी प्रतिक्रिया हुई।

30 जून 2009: बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के मामले की जांच के लिए गठित लिब्रहान आयोग ने 17 वर्षों के बाद अपनी रिपोर्ट प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सौंपी।

सात जुलाई, 2009: उत्तरप्रदेश सरकार ने एक हलफ़नामे में स्वीकार किया कि अयोध्या विवाद से जुड़ी 23 महत्वपूर्ण फ़ाइलें सचिवालय से गायब हो गई हैं।

24 नवंबर, 2009: लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट संसद के दोनों सदनों में पेश। आयोग ने अटल बिहारी वाजपेयी और मीडिया को दोषी ठहराया और नरसिंह राव को क्लीन चिट दी।

20 मई, 2010: बाबरी विध्वंस के मामले में लालकृष्ण आडवाणी और अन्य नेताओं के ख़िलाफ़ आपराधिक मुकदमा चलाने को लेकर दायर पुनरीक्षण याचिका हाईकोर्ट में खारिज।

26 जुलाई, 2010: रामजन्मभूमि और बाबरी मस्जिद विवाद पर सुनवाई पूरी।

8 सितंबर, 2010: अदालत ने अयोध्या विवाद पर 24 सितंबर को फ़ैसला सुनाने की घोषणा की।

17 सितंबर, 2010: हाईकोर्ट ने फैसला टालने की अर्जी खारिज की।

हाईकोर्ट के फैसले को साल 2011 में सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई
साल 2011 में मामले की सुनवाई कर रही इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने विवादित क्षेत्र को रामलला विराजमान, निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी वक्फ बोर्ड को बराबर तीन हिस्सों में बांटने का फैसला दिया। लेकिन यह फैसला सभी पक्षों को स्वीकार नहीं था। ऐसे में फरवरी 2011 में हाईकोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। तब मई 2011 में सुप्रीम कोर्ट की 2 सदस्यीय पीठ में सुनवाई शुरू हुई।

साल 2017 से अब तक मध्यस्थता के सारे प्रयास विफल रहे
साल 2011 में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई तो शुरू हो गई, लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट से भेजे गए दस्तावेजों का अनुवाद नहीं हो पाने के कारण यह मामला टलता रहा। इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने मामले में मध्यस्थता की पेशकश की, जो विफल रही। इसके बाद 6 अगस्त 2019 से सुप्रीम कोर्ट ने रोजाना सुनवाई कर जल्द से जल्द मामले का निपटारा करने की बात कही।

6 अगस्त, 2019: सुप्रीम कोर्ट ने रोजाना मामले की सुनवाई शुरू की।

16 अक्तूबर, 2019: सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रखा।

9 नवंबर, 2019: सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा: विवादित भूमि पर बनेगा मंदिर, मुस्लिम पक्ष को कहीं और जमीन देने के आदेश दिए गए।
 
5 अगस्त 2020: भगवान राम मंदिर निर्माण के लिए भूमिपूजन।


 

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