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भावनाओं को शब्द देने वाले नाना - अलविदा: कैसे बताऊं मेरे लिए कौन हो तुम..!’ से लेकर किसानों के दर्द तक, इस क्रांतिवीर की आवाज हमेशा दिलों में गूंजती रहेगी

- श्री राजराजेश्वरी नगरी से रहा विशेष नाता, ‘राघू-मैना’ से शुरू हुआ फिल्मी सफर
- पर्दे पर बुलंद आवाज, जमीन पर किसानों के साथ खड़े रहने वाले अभिनेता को कला जगत ने दी श्रद्धांजलि
- ‘नाम’ फाउंडेशन के जरिए सूखा प्रभावित और किसान परिवारों तक पहुंचाई मदद
- ‘क्रांतिवीर’ में कलम की ताकत का संदेश
डिजिटल डेस्क, नागपुर/अकोला. फिल्म ‘वजूद’ (1998) में नाना पाटेकर ने जब बेहद संजीदगी से कहा था “कैसे बताऊं... मेरे लिए कौन हो तुम?”, तो यह महज संवाद नहीं रहा, बल्कि भावनाओं की गहराई को व्यक्त करने वाली कविता बन गया। नाना की बुलंद आवाज, चेहरे के भाव और संवाद अदायगी ने लेखक जावेद अख्तर की इस कविता को यादगार बना दिया। वहीं ‘क्रांतिवीर’ में पत्रकारिता की ताकत को लेकर उनके संवाद ने यह भी दिखाया कि वे पर्दे पर केवल अभिनय नहीं करते थे, बल्कि सामाजिक सरोकारों को भी अपनी आवाज देते थे।
एक ओर वे भावनाओं को शब्द देते थे, तो दूसरी ओर वास्तविक जीवन में किसानों और समाज के कमजोर वर्गों के बीच खड़े दिखाई देते थे। अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ नाम फाउंडेशन के माध्यम से उन्होंने सूखाग्रस्त और आत्महत्याग्रस्त किसान परिवारों के लिए काम किया। यही वजह है कि नाना पाटेकर का जाना केवल सिनेमा जगत की क्षति नहीं, बल्कि उन हजारों परिवारों के लिए भी बड़ा सदमा है, जिनके लिए वे मदद और उम्मीद का आधार बने।
हजारों किसानों के आधार बने ‘नाना’ के अचानक चले जाने से शोक की लहर
हिंदी और मराठी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर (75) के निधन की खबर से अकोला सहित पूरे देश में शोक की लहर है। गोवा के डोना पाउला स्थित घर में उन्हें सीने में तेज दर्द और बेहोशी की हालत में पाया गया। परिवार उन्हें मणिपाल हॉस्पिटल ले गया, जहां करीब 45 मिनट तक सीपीआर देने के बाद भी उन्हें बचाया नहीं जा सका। अस्पताल ने सुबह 5.20 बजे उनके निधन की घोषणा की। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, उनकी मौत का कारण कार्डियक अरेस्ट बताया जा रहा है।
नाना पाटेकर का अकोला से विशेष नाता
नाना पाटेकर का अकोला से विशेष नाता रहा है। उनके फिल्मी सफर की शुरुआत अकोला से मानी जाती है। श्री शिवाजी महाराज विद्यालय के प्राचार्य डैडी देशमुख द्वारा निर्मित फिल्म ‘राघू-मैना’ में उनकी भूमिका को खूब सराहा गया था। पहली ही फिल्म के लिए उन्हें उत्कृष्ट अभिनेता का पुरस्कार मिला था। यहीं से शुरू हुआ उनका सफर आगे चलकर बॉलीवुड में उनकी अलग पहचान तक पहुंचा।
नाना के निधन की खबर से अकोला जिले के कला और कृषि जगत में भी शोक की लहर है। उनके साथ निजी और पारिवारिक संबंध रखने वाले कलाकारों को भी उनके निधन से गहरा सदमा लगा है।
किसानों के लिए मसीहा बने नाना
नाना पाटेकर केवल पर्दे के अभिनेता नहीं थे, बल्कि जमीन से जुड़े संवेदनशील इंसान के रूप में भी उनकी पहचान थी। 2015 में अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ उन्होंने ‘नाम फाउंडेशन’ की स्थापना की। विदर्भ सहित सूखाग्रस्त इलाकों में फाउंडेशन ने आत्महत्याग्रस्त किसान परिवारों को आर्थिक मदद, बच्चों की पढ़ाई, स्कूल-कॉलेज फीस तथा तालाब, कुएं और चेक डैम निर्माण जैसे कार्यों के जरिए सहायता पहुंचाई।
फाउंडेशन के माध्यम से 50,908 से अधिक परिवारों को आपदा राहत, 4,957 विधवाओं और 102 शहीद जवानों के परिवारों को सहायता दिए जाने की जानकारी दी गई है। शुरुआत में किसानों की विधवाओं और प्रभावित परिवारों को 15,000 से 25,000 रुपये तक के चेक देकर मदद की गई थी।
‘क्रांतिवीर’ में कलम की ताकत का संदेश
नाना पाटेकर के अभिनय की खासियत केवल उनकी आवाज और संवाद अदायगी नहीं थी। ‘क्रांतिवीर’ में पत्रकारिता और मीडिया की ताकत को लेकर उनका संवाद आज भी याद किया जाता है। फिल्म में पत्रकार मेघा दीक्षित की भूमिका निभाने वाली डिंपल कपाड़िया के साथ संवाद के जरिए अखबार और पत्रकारिता की सामाजिक शक्ति को सामने रखा गया था।
फिल्म में यह संदेश उभरकर आता है कि अखबार केवल खबर पहुंचाने का माध्यम नहीं, बल्कि व्यवस्था को सवालों के घेरे में खड़ा करने और लोगों में बदलाव की चेतना जगाने की ताकत भी रखते हैं। नाना के अभिनय ने इस विचार को प्रभावशाली ढंग से पर्दे पर उतारा।
प्रतिक्रियाएं
- किसानों की चिंता करने वाले नायक को खो दिया
धनंजय मिश्रा, प्रवक्ता, किसान ब्रिगेड ने कहा “किसानों की चिंता करने वाले नायक को हमने खो दिया। मकरंद अनासपुरे के साथ नाम फाउंडेशन के माध्यम से उन्होंने आत्महत्याग्रस्त किसानों के परिवारों का दुख बांटा। किसान समाज उन्हें कभी नहीं भूलेगा।”
- बेहतरीन अभिनेता के साथ अच्छे इंसान थे
प्रशांत देशमुख ने कहा नाना पाटेकर का हमारे परिवार से पारिवारिक रिश्ता रहा है। डैडी देशमुख की ‘राघू-मैना’ में उनके किरदार की खूब सराहना हुई। वे बेहतरीन अभिनेता होने के साथ अच्छे इंसान भी थे। पैसा उनके लिए मायने नहीं रखता था।”
- उनके सामाजिक कार्य अतुलनीय
फिल्म निर्देशक हरीश इथापे ने बताया कि नाना की कमी कभी पूरी नहीं होगी। मानवता, संवेदनशीलता और सामाजिक प्रतिबद्धता को निभाने वाले महान नाना ने ‘नाम’ के जरिए किसानों, खेत मजदूरों और विधवा बहनों के लिए जो काम किया, वह अतुलनीय है।”
- कला और कृषि दोनों क्षेत्रों की भारी क्षति
वरिष्ठ नाट्यकर्मी मधु जाधव ने कहा स्तरीय अभिनय, बुलंद आवाज और दमदार डायलॉग डिलीवरी से अपनी अलग पहचान बनाने वाले नाना का जाना कला और कृषि दोनों क्षेत्रों की बड़ी हानि है। मराठी फिल्म जगत में नीलू फुले और डॉ. श्रीराम लागू के बाद सामाजिक कार्य के लिए नाना का नाम लिया जाता था। महाराष्ट्र के सूखे के दौर में उनका अचानक चले जाना असहनीय है।”
Created On :   8 Oct 2026 9:53 PM IST












