बॉम्बे हाई कोर्ट: बिना संस्थान की अनुमति के वाट्सएप ग्रुप बनाना कदाचार नहीं, टीआईएसएस के प्रोफेसर को नौकरी पर बहाल का आदेश

बिना संस्थान की अनुमति के वाट्सएप ग्रुप बनाना कदाचार नहीं, टीआईएसएस के प्रोफेसर को नौकरी पर बहाल का आदेश
  • 1985 से टीआईएसएस में प्रोफेसर थे गरैन
  • बिना संस्थान की अनुमति के वाट्सएप समूह बनाना गंभीर कदाचार सिद्ध नहीं करता

डिजिटल डेस्क, मुंबई। बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा कि बिना संस्थान की अनुमति के वाट्सएप समूह बनाना अपने-आप में ऐसा गंभीर कदाचार सिद्ध नहीं करता, जिसके आधार पर लंबे समय से कार्यरत प्रोफेसर को अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त कर दिया जाए। उपलब्ध सामग्री से उनके खिलाफ व्यक्तिगत आर्थिक लाभ या प्लेसमेंट व्यवसाय चलाने का पर्याप्त आधार नहीं मिला। अदालत ने प्रोफेसर के निलंबन, अनिवार्य सेवानिवृत्ति और अपीलीय आदेशों को रद्द कर दिया है। इसके साथ ही अदालत ने उन्हें 50 फीसदी पिछला वेतन, नौकरी में बहाली एवं अन्य लाभों को देने का निर्देश दिया है।

हाई कोर्ट की पीठ ने डॉ. स्वपन गरैन की याचिका को स्वीकार करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता ने संस्थान की अनुमति के बिना वाट्सएप समूह बनाया था। केवल इस आधार पर उन्हें अनिवार्य सेवानिवृत्ति देना अत्यधिक कठोर दंड था। कर्मचारी के कृत्य और उसके लिए लगाए गए दंड के बीच उचित संतुलन होना चाहिए। जांच अधिकारी के निष्कर्ष अभिलेख पर उपलब्ध सामग्री के अनुरूप नहीं थे और दंड अत्यधिक था। जबकि टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (टीआईएसएस) की ओर से दलील दी गई कि याचिकाकर्ता ने बिना अनुमति वाट्सएप ग्रुप बनाकर समानांतर प्लेसमेंट सेवा संचालित की। ग्रुप में रोजगार के अवसर साझा किए गए और धन एकत्र करने का प्रयास भी किया गया। इस दौरान टीआईएसएस के वकील ने यह दावा भी किया कि याचिकाकर्ता को जांच रिपोर्ट उपलब्ध कराई गई थी और उन्हें यह बताने का पर्याप्त अवसर दिया गया था कि उनके विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई क्यों न की जाए।

1985 से टीआईएसएस में प्रोफेसर थे गरैन

याचिकाकर्ता डॉ. स्वपन गरैन वर्ष 1985 से टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज में प्रोफेसर के रूप में कार्यरत थे। संस्थान ने उन्हें 29 मार्च 2016 को निलंबित किया और बाद में 6 सितंबर 2017 को अनिवार्य सेवानिवृत्ति का दंड दिया। इसके खिलाफ उन्होंने बॉम्बे हाई कोर्ट में याचिका दायर की।

Created On :   17 Sept 2026 9:42 PM IST

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