बॉम्बे हाई कोर्ट: विदेशी शराब के लाइसेंस का मामले में राज्य सरकार हाई कोर्ट द्वारा घोषित कानून और उसके बाध्यकारी आदेशों की अनदेखी नहीं कर सकती

विदेशी शराब के लाइसेंस का मामले में राज्य सरकार हाई कोर्ट द्वारा घोषित कानून और उसके बाध्यकारी आदेशों की अनदेखी नहीं कर सकती
  • अदालत ने चार दशकों से मुकदमेबाजी कर रहे व्यक्ति पर लगाया ढाई जुर्माना
  • अदालत ने राज्य की कार्यप्रणाली पर गंभीर आपत्ति जताई

डिजिटल डेस्क, मुंबई। बॉम्बे हाई कोर्ट ने पुणे में विदेशी शराब के लाइसेंस को लेकर अपने फैसले में कहा कि राज्य सरकार हाई कोर्ट द्वारा घोषित कानून और उसके बाध्यकारी आदेशों की अनदेखी नहीं कर सकती है। अदालत ने राज्य सरकार की कार्यप्रणाली को लेकर न केवल फटकार लगाई, बल्कि चार दशकों से मुकदमेबाजी कर रहे व्यक्ति की याचिका खारिज करते हुए उस 2 लाख 50 हजार रुपए का जुर्माना लगाया।

न्यायमूर्ति सोमशेखर सुंदरेशन की एकलपीठ के समक्ष सूर्यकांत बाबूराव खलाडकर याचिका को खारिज करते हुए कहा कि 1979 में याचिकाकर्ता खलाडकर और उनके पिता को साझेदार के रूप में शामिल करना रूल 40 के अंतर्गत विधिवत मान्य किया गया था। साझेदारों के अधिकार सीमित करने वाली नीतियां और स्थिति 4 (ए) बाद के वर्षों में लागू हुईं। 1979 में जब खलाडकर को साझेदार के रूप में मान्यता मिली थी, उस समय ऐसी शर्त नहीं थी कि मूल लाइसेंसधारी की मृत्यु के बाद साझेदार का अधिकार समाप्त हो जाएगा। इसलिए 1987 और 1989 या बाद में बनाई गई नीतियों को पूर्वव्यापी प्रभाव से 1979 में प्राप्त अधिकारों को समाप्त करने के लिए लागू नहीं किया जा सकता।

पुणे में विदेशी शराब के लाइसेंस लाइसेंस 1973 में बालकृष्ण रामचंद्र वाडकर के नाम जारी हुआ था। वर्ष 1979 में वाडकर ने सूर्यकांत खलाडकर और उनके पिता बाबूराव खलाडकर को साझेदार बनाया। वाडकर की मृत्यु 23 दिसंबर 1985 को हुई। इसके बाद उनकी पत्नी शोभा वाडकर और खलाडकर ने लाइसेंस पर अपना-अपना दावा पेश किया। शोभा ने स्वयं को मूल लाइसेंसधारी की उत्तराधिकारी बताते हुए लाइसेंस अपने नाम करने की मांग की, जबकि खलाडकर ने साझेदार के रूप में अपना अधिकार बताया।

वर्ष 2002 में हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि वाडकर की मृत्यु के साथ साझेदारी समाप्त हो गई और उसके साथ संबंधित लाइसेंस भी समाप्त हो गया। इसलिए लाइसेंस को शोभा के नाम सीधे स्थानांतरित नहीं किया जा सकता था। इसके बावजूद राज्य सरकार के अधिकारियों ने 2002 और 2016 में हाई कोर्ट के निर्णय के विपरीत फिर से लाइसेंस शोभा के नाम करने की कार्रवाई की। खलाडकर ने पुनः हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

Created On :   13 Sept 2026 9:44 PM IST

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