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ब्रांडेड लूट: दवाएं 80% तक महंगी, ऐसे समझिए कि एक बीमारी, एक सॉल्ट, एक मात्रा, लेकिन दाम बेहिसाब, सवाल की अब आवाज उठाए कौन
Nagpur News. नेशनल मेडिकल कमीशन के नए नियमों के मुताबिक, डॉक्टरों को प्रिस्क्रिप्शन में जेनेरिक दवाएं लिखनी होंगी। आसान भाषा में कहें तो डॉक्टर प्रिस्क्रिप्शन में सिर्फ यह लिखेगा कि उस बीमारी के लिए मरीज को क्या फॉर्मूला लेना है, न की किसी ब्रांड की दवा का नाम। ऐसा न करने वाले डॉक्टरों के खिलाफ कार्रवाई होगी। यहां तक कि कुछ समय के लिए उनका लाइसेंस भी रद्द किया जा सकता है। इसके मुताबिक, देश में लोग अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा स्वास्थ्य पर खर्च कर रहे हैं। जिसमें बड़ी राशि सिर्फ दवाएं पर खर्च की जा रही है। रेगुलेशन में कहा गया कि जेनेरिक दवाएं ब्रांडेड मेडिसन की तुलना में 30% से 80% तक सस्ती हैं। ऐसे में अगर डॉक्टर मरीजों को प्रिस्क्रिप्शन में जेनेरिक दवाएं लिखेंगे तो हेल्थ पर होने वाले खर्च में कमी आएगी, लेकिन शहर में ऐसा होता नहीं दिख रहा है।
इस मरीज को मिली राहत
नागपुर निवासी अरविंद (बदला हुआ नाम) 2010 से शुगर कंट्रोल के लिए चार प्रकार की दवाओं का सेवन करते हैं। हर महीने लगभग 3250 रुपए की दवा खरीदनी पड़ती थी। साल में 39000 रुपए खर्च करने पड़ते थे। अरविंद ने दवाएं जनौषधि केंद्र से खरीदी, जो मात्र 575 रुपए में आईं। यानी सालाना केवल 6900 रुपए खर्च। ब्रांडेड दवाओं के नाम पर मरीजों की लूट हो रही है।
‘सॉल्ट’ असली हिस्सा
दवा का असली इलाज करने वाला हिस्सा उसका एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट या सॉल्ट होता है। उदाहरण के लिए पैरासिटॉमल 650 एमजी एक सॉल्ट है। इसी सॉल्ट को अलग-अलग कंपनियां अलग-अलग ब्रांड नाम से बेचती हैं। यानी नाम बदल जाता है, लेकिन दवा का मूल तत्व वही रहता है। ब्रांडेड दवा किसी कंपनी के व्यापारिक नाम से बिकती है, जबकि जेनेरिक दवा उसी सॉल्ट के सामान्य (जेनेरिक) नाम से उपलब्ध होती है।
जानकारी नहीं, जेब पर मार
मरीजों को दवा का सॉल्ट पता नहीं होता। वे केवल वही ब्रांड खरीदते हैं, जो पर्ची पर लिखा होता है। कभी डॉक्टरों से दवा के सॉल्ट के बारे में पूछताछ या चर्चा भी नहीं करते। अधिकतर डॉक्टर्स भी मरीजों को उपलब्ध सुरक्षित और कम कीमत वाले विकल्प की जानकारी नहीं देते।
निर्देश मानते नहीं
दवा व्यवसाय से जुड़े सूत्र ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने दवा लिखने के संबंध में निर्देश दिया था। इसके अनुसार पर्ची पर दवा का ब्रांड नहीं लिखना है। उसका जेनेरिक नाम लिखना है। यह नाम भी अंगरेजी के कैपिटल अक्षरों में लिखना है, लेकिन अधिकतर इस निर्देश को नहीं मानते। मरीज की समस्या यह होती है कि जब वह किसी डॉक्टर के पास पहुंचता है तो उसके द्वारा लिखी गई दवा ही मरीज के लिए महत्वपूर्ण होती है। चाहे वह ब्रांडेड हाे या जेनेरिक।
Created On :   2 Aug 2026 8:31 PM IST












