नवजीवन: मशक्कत के बाद बची मां-बच्चे की जान, गंभीर एनीमिया के बावजूद हुई सामान्य डिलीवरी - हीमोग्लोबिन था महज 4.2 ग्राम

मशक्कत के बाद बची मां-बच्चे की जान, गंभीर एनीमिया के बावजूद हुई सामान्य डिलीवरी - हीमोग्लोबिन था महज 4.2 ग्राम
  • 10 RDP, 1 SDP, 3 PRC और 2 FFP चढ़ाकर डॉक्टरों ने संभाली बेहद नाजुक स्थिति
  • पहले सीजेरियन के बावजूद 2 किलो के स्वस्थ बच्चे का जन्म
  • 34 वर्षीय गर्भवती महिला के प्लेटलेट्स महज 5 हजार और हीमोग्लोबिन 4.2 ग्राम था
  • मां-बच्चे दोनों की हालत अब स्थिर

Nagpur News. कहते हैं डॉक्टर भगवान से कम नहीं होता। जिसका असल धर्म मरीज को बेहद गंभीर हालत में भी किसी रक्षक की तरह बचाना होता है। महज 4.2 ग्राम हीमोग्लोबिन होने के बावजूद डॉक्टरों ने अपना धर्म निभाते हुए मशक्कत के बाद जच्चा और बच्चा दोनो को बचा लिया। गंभीर एनीमिया के बावजूद सामान्य डिलीवरी हुई। वाड़ी निवासी 34 वर्षीय रानू अमित हिवरकर 36 सप्ताह की गर्भवती थीं। पहले सीजेरियन प्रसव के बाद दूसरी बार गर्भवती होने पर उन्हें डागा अस्पताल से शासकीय वैद्यकीय महाविद्यालय एवं अस्पताल (जीएमसीएच), नागपुर रेफर किया गया। जांच में उन्हें गंभीर रक्तक्षय (Severe Anaemia) और पैनसायटोपेनिया की समस्या सामने आई। पैनसायटोपेनिया में रक्त की तीनों प्रमुख कोशिकाओं लाल रक्त कोशिकाएं, सफेद रक्त कोशिकाएं और प्लेटलेट्स की संख्या बेहद कम हो जाती है।

अस्पताल पहुंचने पर रानू का रक्तगट AB पॉजिटिव था। उनका प्लेटलेट काउंट महज 5 हजार, हीमोग्लोबिन 4.2 ग्राम और WBC काउंट सिर्फ 1 हजार था। सामान्य तौर पर प्लेटलेट्स 1.5 से 4 लाख, हीमोग्लोबिन 11 से 13 ग्राम और WBC 4 से 11 हजार के बीच होना चाहिए। ऐसे में प्रसव कराना डॉक्टरों के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण था।

आधी रात में भी जुटाए गए प्लेटलेट्स और रक्त

पैनसायटोपेनिया की विस्तृत जांच के लिए पर्याप्त समय नहीं था और गर्भावस्था की स्थिति को देखते हुए तत्काल उपचार जरूरी था। महिला को बार-बार रक्त एवं रक्तघटक चढ़ाने की जरूरत पड़ रही थी। AB पॉजिटिव प्लेटलेट्स उपलब्ध नहीं होने और मरीज के परिजनों के पास पर्याप्त संख्या में समान रक्तगट के दाता नहीं होने के कारण अस्पताल की टीम ने विशेष प्रयास शुरू किए।


जीएमसीएच के अधिष्ठाता डॉ. राज गजभिये, चिकित्सा अधीक्षक डॉ. अविनाश गावंडे, डॉ. कीर्ति जयस्वाल, विकृतिविज्ञान विभाग की विभागाध्यक्ष एवं रक्तपेढ़ी प्रमुख डॉ. मुकेश वाघमारे, डॉ. रश्मी वानखेड़े, स्त्रीरोग एवं प्रसूति विभाग की प्रमुख डॉ. मंजुश्री वायकर, प्राध्यापिका डॉ. राजश्री पाटील, डॉ. मानसी श्रीगिरीवार, डॉ. कीर्ति रचवानी, एसडीपी दाता सुधीर कोजराज केवलरामानी तथा समाजसेवा अधीक्षक विक्रम लांजेवार के संयुक्त प्रयासों से AB पॉजिटिव रक्त, रक्तघटक और SDP दाताओं की व्यवस्था की गई। आधी रात में SDP दाता खोजने से लेकर रक्त की प्रक्रिया और जांच तक विशेष प्रयास किए गए। स्वयंसेवी संस्थाओं की मदद से भी रक्त एवं रक्तघटक उपलब्ध कराए गए, ताकि मरीज पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ न पड़े।


72 घंटे में चढ़ाए गए 10 RDP, 1 SDP और 3 PRC

अस्पताल में भर्ती होने से लेकर प्रसव तक 72 घंटे के दौरान महिला को 10 RDP, 1 SDP, 3 PRC और 2 FFP दिए गए। इससे रक्तस्राव और रक्त के जमने की क्षमता को नियंत्रित करने में मदद मिली। पहले सीजेरियन हो चुका होने के बावजूद डॉक्टरों ने लगातार निगरानी रखते हुए सामान्य प्रसव कराया। डॉ. रश्मी सोलंकी, डॉ. निकिता खानोरकर, डॉ. नेहा कांबले और डॉ. नमामी दुबे की टीम की देखरेख में महिला ने 2 किलो वजन के बच्चे को जन्म दिया।

प्रसव के बाद टांके वाली जगह के आसपास हेमेटोमा (रक्त का जमाव) बन गया। इसके बाद महिला को स्वास्थ्य में सुधार के लिए 2 PRC और 2 RDP यूनिट तथा एनीमिया दूर करने के लिए अतिरिक्त 2 PRC यूनिट दिए गए।

समय पर रक्त चढ़ाने से टली बड़ी अनहोनी

अस्पताल की टीम के सामूहिक प्रयास और समय पर रक्त एवं रक्तघटकों की उपलब्धता से मां और बच्चे दोनों की जान बचाई जा सकी। बेहद गंभीर स्थिति से गुजरने के बाद मां और बच्चा अब चिकित्सकीय निगरानी में हैं और दोनों का आगे का उपचार जारी है।

Created On :   8 Sept 2026 7:23 PM IST

Tags

Next Story