Ganesh Chaturthi 2026: पहली बार मछुआरों की पारंपरिक पोशाक में विराजे थे 'लाल बागचा राजा', स्थापना के पीछे थी दिलचस्प वजह, इस साल इतनी है प्रतिमा की ऊंचाई

डिजिटल डेस्क, मुंबई। मुंबई के लालबाग इलाके में गणेश उत्सव के वक्त एक अलग ही रंग नजर आता है। यहां पर हर साल बहुत ही बड़ी संख्या में लोग गणपति बप्पा के दर्शन करने के लिए आते हैं। लालबागचा राजा की मूर्ति देशभर में बहुत ही ज्यादा प्रसिद्ध है लेकिन इसकी शुरुआत किसी भव्य आयोजन या बड़े पंडाल से नहीं की गई थी। इसके पीछे मुंबई के आम लोगों की परेशानी और उनकी एक सच्ची आस्था और मन्नत की कहानी है। मजदूर, मछुआरे और छोटे दुकानदार उस समय रोजी-रोटी के लिए भी तरस रहे थे और भारी संघर्ष कर रहे थे। इस ही मुश्किल वक्त में उन्होंने गणपति बप्पा से प्रार्थना की थी और आगे चलकर उनकी यही मन्नत लालबागचा राजा की पहचान बन गई। ऐसे में चलिए लगभग 90 साल शुरू हुई यह खास परंपरा की पूरी कहानी के बारे में जानते हैं।
1930 के दशक में लालबाग की हालत
यह बात उस समय की है जब मुंबई का लालबाग इलाका मिल मजदूरों के लिए जाना जाता था। यहां कपड़ा मिलों की संख्या काफी थी और बड़ी आबादी इन्हीं मिलों में काम करती थी। मछुआरे, छोटे दुकानदार और सड़क किनारे सामान बेचने वाले लोग भी इसी इलाके में अपना काम करते थे। साल 1932 के आसपास पुराने बाजार के बंद होने से कई लोगों की कमाई पर सीधा असर पड़ना शुरू हो गया। जिन लोगों का कारोबार उसी बाजार से चलता था, उनके सामने अचानक से एक बड़ी परेशानी आकर खड़ी हो गई। उनके पास सामान बेचने की जगह तक नहीं बची थी। मुश्किल वक्त में स्थानीय मछुआरों और दुकानदारों ने भगवान गणेश से प्रार्थना की और उन्होंने मन्नत मांगी कि अगर उन्हें कारोबार के लिए एक अच्छी और स्थायी जगह मिल जाती है, तो वे वहां सार्वजनिक रूप से गणपति उत्सव मनाएंगे। उनकी यह प्रार्थना सिर्फ धार्मिक भावना से ही नहीं जुड़ी थी बल्कि इसमें अपने परिवार का पेट पालने और दोबारा अपने पैरों पर खड़े होने की उम्मीद भी शामिल थी।
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12 सितंबर को पहली बार रखी गई मूर्ति
स्थानीय लोगों और कुछ प्रमुख नागरिकों ने बाजार के लिए जगह तलाशना शुरू कर दिया और उनकी कोशिश आखिरकार रंग लाई। जमीन की मालकिन रजाबाई तैयबअली ने बाजार के लिए जगह देने पर सहमति जताई और जगह मिलने के बाद लोगों ने अपनी मन्नत पूरी करने की तैयारी शुरू कर दी। 12 सितंबर 1934 को लालबाग-परेल इलाके में बने नए बाजार के एक हिस्से में पहली बार गणपति बप्पा की मूर्ति रखी गई और यही आयोजन आगे चलकर लालबागचा राजा के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस आयोजन में स्थानीय लोगों के साथ-साथ कुंवर जी जेठाभाई शाह, श्यामराव विष्णु बोधे, रामचंद्र तावड़े, वी.बी. कोरगांवकर और नखावा कोकम मामा जैसे लोगों की भूमिका बताई जाती है।
कैसी नजर आती थी लालबागचा राजा की पहली मूर्ति?
अगर पहली मूर्ति की बात करें तो, जो आज लालबागचा राजा की भव्य मूर्ति देखने को मिलती है वो उससे बहुत ही ज्यादा अलग थी। लालबागचा राजा की अभी की मूर्ति देखकर शायद यकीन करना मुश्किल हो कि इसकी शुरुआत इतनी सादगी से हो सकती है। पहली मूर्ति छोटी और मिट्टी से बनी थी और मूर्ति कोली मछुआरा समाज की पारंपरिक पोशाक में सजाई गई थी। धोती और टोपी वाला यह रूप इलाके के आम लोगों और उनकी संस्कृति से जुड़ा हुआ था। इसके अगले ही साल, यानी 1935 में मूर्ति बनाने की जिम्मेदारी मधुसूदन कांबली ने संभाली थी। इसके बाद कांबली परिवार भी इस परंपरा से जुड़ गया। तब से परिवार की कई पीढ़ियां लालबागचा राजा की मूर्ति बनाने का काम करती आ रही हैं। लगभग 90 सालों बाद भी यह परंपरा जारी है। आज लालबागचा राजा सिर्फ गणेश उत्सव का एक बड़ा नाम नहीं है बल्कि इसकी कहानी उन आम लोगों की उम्मीद से जुड़ी है, जिन्होंने मुश्किल समय में बप्पा पर भरोसा रखा और अपनी मन्नत पूरी होने के बाद गणपति बप्पा को धन्यवाद दिया था।
इस बार बप्पा की कैसी मूर्ति है?
बप्पा के दर्शन के लिए देश-विदेश से करोड़ों श्रद्धालु आते हैं। इस बार लालबागचा राजा की मूर्ति की ऊंचाई लगभग 14 फीट बताई जा रही है। इस पारंपरिक ऊंचाई को बीते कुछ समय से एक जैसी रखने की कोशिश की जा रही है। इस बार की सबसे खास बात यह है कि दरबार को खास बनाने के लिए धार्मिक आस्था के साथ आधुनिक तकनीक और पर्यावरण संरक्षण का भी ध्यान रखा गया है। इस बार पंडाल में सबसे बड़ा आकर्षण इसका भव्य प्रवेश द्वार रखा गया है। पंडाल का मुख्य द्वार लगभग 80 फीट ऊंचा और 60 फीट चौड़ा बनाया गया है। मुख्य प्रवेश द्वार पर भगवान शिव की लगभग 35 फीट ऊंची विशाल प्रतिमा स्थापित की गई है।
Created On :   14 Sept 2026 4:31 PM IST










