दैनिक भास्कर हिंदी: बाबा बर्फानी के दर्शन के लिए अमरनाथ यात्रा शुरू, जानिए क्या है इस धाम की कहानी

June 28th, 2018

 

 

डिजिटल डेस्क । बाबा बर्फानी के दर्शन के लिए बुधवार को श्रद्धालुओं का पहला जत्था रवाना हुआ ये यात्रा 26 जून से शुरू हो कर 26 अगस्त तक चलेगी। अमरनाथ के लिए रवाना होने वाले हर जत्थे को थ्री लेयर सिक्‍योरिटी दी जा रही है। अमरनाथ गुफा दक्षिण कश्मीर के हिमालयवर्ती क्षेत्र में है। ये श्रीनगर से लगभग 141 किमी. की दूरी पर 3,888 मीटर (12,756 फुट) की ऊंचाई पर स्थित है। इस तीर्थ स्थल पर पहलगाम और बालटाल मार्गों से पहुंचा जा सकता है। अमरनाथ धाम का इतिहास ऐसा माना जाता है कि मध्यकाल के बाद लोगों ने इस गुफा को भुला दिया था।

15वीं शताब्दी में एक बार फिर एक गडरिए, बुट्टा मलिक ने इसका पता लगाया। कहा जाता है कि एक महात्मा ने बुट्टा मलिक को कोयले से भरा हुआ एक थैला दिया। घर पहुंचने पर जब उसने उस थैले को सोने से सिक्कों से भरा हुआ पाया, तो उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। खुशी से वो महात्मा का धन्यवाद करना चाहता था, लेकिन वो महात्मा उसे कहीं नहीं मिले।

 

क्या है गुफा की कहानी?

जहां उस गडरिए को वो महात्मा मिले थे उस जगह उसने पवित्र गुफा देखी और उसमें उसे शिवलिंग के दर्शन हुए। उसने गांववालों को इसके बारे में जानकारी दी तब से ये तीर्थ यात्रा का पवित्र स्थल बन गया। अमरनाथ गुफा के बारे में ये कथा बहुत प्रचलित है कि इसी गुफा में माता पार्वती को भगवान शिव ने अमरकथा सुनाई थी, जिसे एक घोसले में पक्षी के अंडे में अजन्मे बच्चे शुक-शिशु (पक्षी का बच्चा) ने सुन लिया था और वो शुकदेव ऋषि के रूप में अमर हो गए थे।

गुफा में आज भी श्रद्धालुओं को कबूतरों का एक जोड़ा दिखाई दे जाता है, जिन्हें श्रद्धालु अमर पक्षी बताते हैं। वो भी अमरकथा सुनकर अमर हुए हैं। ऐसी मान्यता भी है कि जिन श्रद्धालुओं को कबूतरों को जोड़ा दिखाई देता है, उन्हें शिव पार्वती अपने प्रत्यक्ष दर्शनों से निहाल करके उस प्राणी को मुक्ति प्रदान करते हैं।

 

 

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ये भी है कहानी?

ये भी माना जाता है कि भगवान शिव ने अपनी अद्र्धागिनी माता पार्वती को इस गुफा में एक ऐसी कथा सुनाई थी, जिसमें अमरनाथ की यात्रा और उसके मार्ग में आने वाले अनेक स्थलों का वर्णन था। यs कथा आज अमरकथा के नाम से विख्यात हे।

कुछ विद्वानों का मत है कि भगवान शंकर जब पार्वती को अमर कथा सुनाने ले जा रहे थे, तो उन्होंने अपने छोटे-छोटे अनंत नागों को अनंतनाग में छोड़ दिया था। माथे के चंदन को चंदनबाड़ी में उतार दिया था, और  अन्य पिस्सुओं को पिस्सू टॉप पर और कंठ मे धारण करने वाले शेषनाग को शेषनाग नामक स्थल पर छोड़ा था। ये सभी स्थल अब भी अमरनाथ यात्रा में आते हैं।

 

मुसलमान गडरिए के वंशजों दिया जाता है चौथाई चढ़ावा 

अमरनाथ गुफा का पता सबसे पहले पूर्वार्ध में एक मुसलमान गडरिए को चला था। आज भी चौथाई चढ़ावा उस मुसलमान गडरिए के वंशजों को मिलता है। आश्चर्य की बात ये है कि अमरनाथ गुफा एक नहीं है। अमरावती नदी के पथ पर आगे बढ़ते समय और भी कई छोटी-बड़ी गुफाएं दिखती हैं। वो सभी बर्फ से ढंकी हैं। एक और कथा के मुताबिक, बहुत समय पहले कश्मीर घाटी पूर्णता: जलमग्न हो गई थी और कश्यप मुनि ने अनेक नदियों और नालों की सहायता से इसका पानी निकाल था। इस प्रकार जब पानी उतर गया, तो भृगु मुनि ने भगवान अमरनाथ के सबसे पहले दर्शन किए। इसके बाद लोगों ने अमरनाथ हिमलिंगम के बारे में सुना तो ये आस्था वाले सभी लोगों के लिए भगवान भोले नाथ का स्थान बन गया और तब से हर साल लाखों लोग तीर्थ यात्रा करते चले आ हैं।

 

 

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कड़ी सुरक्षा के बीच चलते है श्रद्धालु

 

अमरनाथ यात्रा के समय सुरक्षाबलों के जरिए रक्षा की जाती है क्योंकि इस यात्रा में बहुत कठिनाइयां आती है, मौसम, कठिन रास्ते और अब तो आतंकवादियों से भी खतरा रहता है।वार्षिक तीर्थ यात्रा जम्मू और कश्मीर श्री अमरनाथजी तीर्थस्थल अधिनियम 2000 के अंतर्गत गठित श्री अमरनाथजी तीर्थस्थल बोर्ड एस,ए,एस,बी द्वारा आयोजित की जाती है। बोर्ड के अध्यक्ष जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल होते हैं।

 

स्वस्थ प्रमाण पत्र (मेडिकल सर्टिफिकेट) एस,ए,एस,बी और राज्य सरकार के निर्देशों पर प्रत्येक तीर्थ यात्री को मान्यता प्राप्त डॉक्टर का एक वैध स्वास्‍थ्‍य प्रमाणपत्र साथ ले जाना होता है और यात्रा आरंभ करने से पहले पंजीकरण कराना होता है। कैंपों में हजारों टैंट अमरनाथ यात्रा के समय बालटाल और पहलगाम के दो आधार कैंपों में हजारों टैंट लगाये जाते हैं जहां यात्रियों के सोने-रहने और भोजन की व्यवस्था की जाती है।

 

 

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गुफा तक जाते हैं दो रास्ते 

 

अमर नाथ यात्रा पर जाने के दो रास्ते हैं। एक सोनमर्ग बलटाल से और दूसरा पहलगाम होकर । पहलगाम और बलटाल तक किसी भी सवारी से पहुँचते हे, यहाँ से आगे जाने के लिए अपने पैरों का ही उपयोग करना होता है। अशक्त या वृद्धों के लिए सवारियों का प्रबंध सशुल्क किया जा सकता है। पहलगाम से जानेवाले रास्ते को सरल और सुविधाजनक समझा जाता है।

बलटाल से अमरनाथ गुफा की दूरी केवल 14 किलोमीटर है और यह बहुत ही दुर्गम रास्ता है और सुरक्षा की दृष्टि से भी संदिग्ध है। इसीलिए सरकार इस मार्ग को सुरक्षित नहीं मानती और अधिकतर यात्रियों को पहलगाम के रास्ते अमरनाथ जाने के लिए प्रेरित करती है। किन्तु रोमांच का आनंद लेने वाले लोग इस मार्ग से यात्रा करना पसंद करते हैं। इस मार्ग से जाने वाले लोग अपने ही बलबूते पर यात्रा करते है। इस रास्ते में किसी अनहोनी के लिए भारत सरकार जिम्मेदारी नहीं लेती है।

 

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दूसरा रास्ता पहलगाम से  

पहलगाम जम्मू से 315 किलोमीटर की दूरी पर है। यह विख्यात पर्यटन स्थल भी है और यहाँ का नैसर्गिक सौंदर्य देखते ही बनता है। पहलगाम तक जाने के लिए जम्मू-कश्मीर पर्यटन केंद्र से सरकारी बस उपलब्ध रहती है। पहलगाम में गैर सरकारी संस्थाओं की ओर से लंगर की व्यवस्था की जाती है। तीर्थयात्रियों की पैदल यात्रा यहीं से आरंभ होती है।
पहलगाम के बाद पहला पड़ाव चंदनबाड़ी है, जो पहलगाम से आठ किलोमीटर की दूरी पर है। पहली रात तीर्थयात्री यहीं बिताते हैं। यहाँ रात्रि निवास के लिए कैंप लगाए जाते हैं। इसके ठीक दूसरे दिन पिस्सु घाटी की चढ़ाई शुरू होती है। कहा जाता है कि पिस्सु घाटी पर देवताओं और राक्षसों के बीच घमासान लड़ाई हुई जिसमें राक्षसों की हार हुई। लिद्दर नदी के किनारे-किनारे पहले चरण की यह यात्रा ज्यादा कठिन नहीं है। चंदनबाड़ी से आगे इसी नदी पर बर्फ का यह पुल सलामत रहता है।

चंदनबाड़ी से 14 किलोमीटर दूर शेषनाग में अगला पड़ाव है। यह मार्ग खड़ी चढ़ाई वाला और खतरनाक है। यहीं पर पिस्सू घाटी के दर्शन होते हैं। अमरनाथ यात्रा में पिस्सू घाटी काफी जोखिम भरा स्थल है।

पिस्सू घाटी समुद्रतल से 11,120 फुट की ऊँचाई पर है। यात्री शेषनाग पहुँच कर तरोताजा होते हैं। यहाँ पर्वतमालाओं के बीच नीले पानी की बहुत सुन्दर झील है।