मनोरंजन: अब अपनी उम्र और अनुभव के अनुसार चुनती हूं किरदार, दैनिक भास्कर से एक्सक्लूसिव बातचीत में बोलीं एक्ट्रेस कंगना रनौत

अब अपनी उम्र और अनुभव के अनुसार चुनती हूं किरदार, दैनिक भास्कर से एक्सक्लूसिव बातचीत में बोलीं एक्ट्रेस कंगना रनौत
कंगना रनौत को अक्सर बेबाक बयानों, दमदार किरदारों और अपने फैसलों पर अडिग रहने वाली अभिनेत्री के रूप में देखा जाता है।

डिजिटल डेस्क, मुंबई। कंगना रनौत को अक्सर बेबाक बयानों, दमदार किरदारों और अपने फैसलों पर अडिग रहने वाली अभिनेत्री के रूप में देखा जाता है। लेकिन इस बार वह पर्दे पर किसी रानी, योद्धा या राजनीतिक शख्सियत का नहीं, बल्कि उन गुमनाम नायकों का चेहरा बनकर लौट रही हैं, जिन्होंने 26/11 मुंबई आतंकी हमलों की भयावह रात में अपनी जान की परवाह किए बिना सैकड़ों लोगों की जिंदगी बचाई थी। 12 जून को रिलीज होने जा रही फिल्म ‘भारत भाग्य विधाता’ में कंगना एक ऐसी नर्स की भूमिका निभा रही हैं, जिसकी कहानी साहस, मानवता और कर्तव्यनिष्ठा की मिसाल है। फिल्म उन अनसुने अस्पताल कर्मियों को श्रद्धांजलि है, जिन्होंने आतंक के साये में भी मानवता का दामन नहीं छोड़ा। अपनी इस खास फिल्म, उसके संदेश, राजनीति और निजी जीवन से जुड़े कई अनछुए पहलुओं पर कंगना रनौत ने दैनिक भास्कर से खुलकर बातचीत की।

सवाल - इस कहानी के क्यों चुना आपने ?

जवाब-मुझे लगता है इस कहानी ने मुझे चुना। पिछले 7 साल से यह कहानी फिल्म निर्माण के लिए घूम रही है लेकिन किसी ने इस पर फिल्म नहीं बनाई। मेरे पास यह स्क्रिप्ट आयी तो मुझे लगा कि उस आतंकी हमले में मारे गए लोगों की कहानियां तो सबको याद है लेकिन उन नर्सेस ने उस रात 400 जिंदगियां बचाई थीं...20 डिलिवरी भी की थी।उसके बारे में कम लोग जानते हैं। पर मेरे लिए सबसे चौकाने वाला वो पल था जब हम उनकी जिन्दगी पर शूट कर रहे थे। लोकल ट्रेन में सफर करते हुए सब्जी भी काटना , रोज वही ट्रेन पकड़ना। मरीजों को रोज उसी तरह से देखभाल करना। बेहद मुश्किल है। हम एक्टर्स तो एक फिल्म करके दूसरी फिल्म से या काम से पहले ब्रेक ले लेते हैं। छुट्टियां मना लेते हैं लेकिन ये महिलाएं सालों से एक ही काम में जुटी हैं। मैंने भी इनसे वही निष्ठा सीखी।

सवाल - इसकी शूटिंग किन जगहों पर हुई ?

जवाब-इनकी शूटिंग के लिए हमने कामा हॉस्पिटल से परमिशन ली थी। अस्पताल है, भीड़ रहती है तो हमने उनकी नयी बिल्डिंग में ज्यादा सेट लगाए थे। लेकिन इस कहानी को जब हम शूट कर रहे थे तो मुझे भी कई बार यह एहसास हुआ कि हम एक अलग दुनिया में अब तक जी रहे थे। यह बिलकुल अलग लोग हैं इतने सालों से निरंतर उन्ही कामों में ढले रहना और अचानक जब हथियारों से लैस आतंकी आते हैं तो यह निहत्थे लोग अपनी बहादुरी से उन्हें भी हरा देते हैं। यह फिल्म मुझे काफी कुछ सीखा गयी।

सवाल - सांसद बनने के बाद अब फिल्में कैसे चुनती हैं ?

जवाब-भगवान की बड़ी कृपा है कि मुझमे उम्र और समय के साथ गंभीरता और समझदारी आ गयी है। मेरे पास ‘क्वीन 2’ के समय भी एक ऐसी स्क्रिप्ट आयी थी तो मैंने उन्हें कहा था कि अब मैं उस लड़की का किरदार नहीं निभा सकती जो भटकी हुई है,बॉयफ्रेंड्स से लेकर करियर के बीच फंसी हुई है। मैं 40 साल की महिला हूं , मेरे टाइप के अलग रोल मुझे करने चाहिए। मैंने उन्हें यही सलाह दी थी और उस हिसाब से ‘क्वीन 2’ के लिए स्क्रिप्ट बनीं। मेरे पास कई ऐसी स्क्रिप्ट आती है , वह मुझे कहते हैं कि आपको इस सकिरदार में देखकर हमें अच्छा लगेगा मैं उन्हें जवाब देती हूं कि लेकिन मुझे अच्छा नहीं लगेगा। आपने मुझे कभी भी ऐसी सिचुएशन या किरदार में नहीं देखा होगा जिसमे मैं खुद असहज हूं।

सवाल - बेबाक छवि रही है आपकी, लेकिन क्या कभी अपने फैसलों पर रिग्रेट हुआ ?

जवाब- मेरे साथ हमेशा ऐसे होता है। लेकिन उन गलतियों से आप सीखते भी तो हैं। मैं उसका बोझ लेकर नहीं चलती, मुस्कुराकर उससे सीखकर आगे बढ़ जाती हूं। उदाहरण के तौर पर कहूं तो मैंने अर्ली 20 की उम्र में अपने लिप्स फिलर्स के जरिये मोटे करवा लिए थे जिसका काफी मजाक भी उड़ाया गया था। आज जब उसे याद करती हूं तो सोचती हूं कि क्या बैवकूफ़ी की थी मैंने। आज भी अपने तस्वीरें देखती हूं जिसमे कपड़ों और वजन को लेकर सोचती हूं ऐसा ना करने की सीख भी लेती हूं।

सवाल - अपनी बुक या बायोपिक का शीर्षक क्या रखेंगी?

जवाब-मैंने पहले सोचा था इसके बारेकि जब कभी मेरी जिंदगी पर किताब लिखूंगी या फिल्म बनाउंगी तो उसका नाम ‘माउंटेन गर्ल’ रखूंगी , उस समय यही सीमित सोच थी मेरी। लेकिन आज सोच बदल गयी है। मेरे सोचने का दायरा बढ़ गया है। मैं एक कृष्ण भक्त हूं तो अपनी किताब के लिए मैं शीर्षक ‘मोरपंख' या ‘पीकॉक फेदर ' रखूंगी। अपने कृष्ण के लिए मैं वही खुद को समझती हूं। उनसे मेरा गहरा जुड़ाव है।

Created On :   7 Jun 2026 8:58 PM IST

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