जर्नलिस्ट 'गांधी': लाठी से पहले बापू ने थामी 'कलम', ट्रेन से उतारे गए तो जागा भीतर का पत्रकार, इन नाम से छापा पहला अखबार

डिजिटल डेस्क, भोपाल। महात्मा गांधी, यह नाम सुनते ही हमारे मन में आमतौर पर एक ऐसे नेता की तस्वीर बनती है, जिसने देश की आजादी की लड़ाई में बड़ी भूमिका निभाई। दुनिया उन्हें स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक और सत्य और अहिंसा के पुजारी के रूप में जानती है। लेकिन इसके अलावा गांधी के कहानी का एक पहलू ऐसा भी है, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं।
महात्मा गांधी एक पत्रकार भी थे। पत्रकारिता उनके लिए कोई पेशा या व्यवसाय नहीं था। वह जनता तक अपने विचारों को पहुंचाने और अन्याय के खिलाफ जनमत तैयार करने के माध्यम के रूप में पत्रकारिता को एक सशक्त साधन मानते थे। 1903 से शुरू हुई उनकी पत्रकारिता लगभग 45 साल तक चली। इन वर्षों में गांधी ने अखबारों को संपादित किया, लेख लिखे और उन्हें प्रकाशित किया। उनके लिखे गए लेख ने धीरे धीरे एक बड़े जनआंदोलन को जन्म दिया। उनकी पत्रकारिता का प्रभाव सिर्फ भारत ही नहीं उनके सार्वजनिक जीवन पर भी ऐसा पड़ा कि मोहनदास करमचंद गांधी, महात्मा गांधी बन गए।
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कहां से हुई पत्रकारिता की शुरुआत?
गांधी की पत्रकारिता की शुरूआत भारत से नहीं बल्कि लंदन से हुई थी। लंदन में वकालत की पढ़ाई के दौरान गांधी की रूचि लेखन में बढ़ी। वे लंदन की वेजिटेरियन पत्रिका के लिए शाकाहारवाद पर लेख लिखा करते थे। गांधी ने उस समय तक सोचा भी नहीं था कि आगे चलकर पत्रकारिता उनके सामाजिक और राजनीतिक जीवन का बड़ा माध्यम बन जाएगी।
अफ्रिका के जनआंदोलन का भी है पत्रकारिता में योगदान
साल 1893 में महात्मा गांधी एक मुकदमे के सिलसिले में दक्षिण अफ्रिका गए। वहां उन्होंने देखा की एशियाई लोगों के साथ रंग, नस्ल और जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव किया जा रहा है। उनके अधिकारों को दबाया जा रहा है।
गांधी खुद इसके शिकार बने। मुकदमे के काम से वे डरबन से प्रिटोरिया जा रहे थे। उनके पास ट्रेन के प्रथम श्रेणी यानी फर्स्ट क्लास का टिकट था। लेकिन एक गोरे यात्री ने आपत्ति जताई कि वह किसी अश्वेत के साथ यात्रा नहीं कर सकता। इस कारण गांधी को जबरन कड़कड़ाती ठंड में भी ट्रेन से उतार दिया गया।
इस स्थिति ने गांधी को अंदर तक प्रभावित किया। वहीं से उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत हुई।
संपादकों को लिखा पत्र
दक्षिण अफ्रिका में एशियाईयों के अधिकार के लिए संघर्ष के दौरान गांधी ने वहां के समाचार पत्रों के संपादकों को पत्र लिखना शुरू किया। गांधी को एक बात अच्छी तरह समझ में आ गई थी। अगर लोगों के साथ अन्याय हो रहा है, तो सिर्फ उसके खिलाफ खड़ा होना काफी नहीं है। लोगों को उस अन्याय के बारे में बताना और उनकी आवाज को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाना भी जरूरी है। यहीं से गांधी के लिए पत्रकारिता का महत्व बढ़ता गया।
उन्होंने अपने पत्रों, लेखों और दूसरे लिखित दस्तावेजों के जरिए सरकार और बड़े समाचार पत्रों के सामने एशियाई लोगों के साथ हो रहे नस्लभेद की समस्याएं उठाईं। गांधी का उद्देश्य किसी से बेवजह लड़ना नहीं बल्कि सभी प्रकार के भेदभाव को समाप्त कर एक आदर्श समाज की दिशा में आगे बढ़ना था। इसका एक उदाहरण 25 अक्टूबर 1894 को लिखे गए उनके एक पत्र में मिलता है।
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दक्षिण अफ्रीका के 'टाइम्स ऑफ नेटाल' अखबार में 'राममीसामी' नाम से एक अपमानजनक संपादकीय छपा था। गांधी ने इसका जवाब देते हुए अखबार को पत्र लिखकर कहा कि, “आप किसी भी परिस्थिति में भारतीय या मूल निवासी को मतदान का अधिकार नहीं देंगे, सिर्फ इसलिए कि उनकी त्वचा का रंग काला है। आप सिर्फ बाहरी रूप देखेंगे। जब तक त्वचा सफेद है, आपको इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा कि उसके नीचे जहर छिपा है या अमृत।”
गांधी ने आगे अखबार से सवाल किया कि क्या वह अपने इस रवैये को ईसाई धर्म और ब्रिटेन की अच्छी परंपराओं के साथ सही ठहरा सकता है। उन्होंने पूछा, “क्या आप अपने नए नियम को फिर से पढ़ेंगे? क्या आप उपनिवेश की अश्वेत आबादी के प्रति अपने दृष्टिकोण पर विचार करेंगे?”
बापू का अखबार
दक्षिण अफ्रीका में गांधी का संघर्ष लगातार चल रहा था। करीब दस साल तक संघर्ष करने के बाद उन्हें लगा कि लोगों की राय बनाने और सरकार के फैसलों पर दबाव डालने के लिए एक अखबार की जरूरत है। जून 1903 गांधी ने 'इंडियन ओपिनियन' नाम के अखबार की शुरुआत की। इस अखबार के उद्देश्य सरकार के दमनकारी फैसलों की आलोचना करना और लोगों को न्याय के लिए एकजुट करना था। इसके लिए उन्होंने अपनी जमापूंजी और लोगों के चंदे के जरिए इसे चलाया। धीरे-धीरे इंडियन ओपिनियन, दक्षिण अफ्रीका में रहने वाले भारतीयों के अधिकारों का आवाज बन गया। इसी अखबार में लिखते हुए गांधी के मन में सत्याग्रह की सोच और मजबूत हुई।
गांधी ने 1903 से लेकर 1915 तक करीब 12 साल तक 'इंडियन ओपिनियन' के संपादक के रूप में काम किया। गांधी अपने लेखों में व्यंग्य के जरिए भेदभाव की सोच पर कटाक्ष करते थे। यह अखबार शुरुआत में दो भाषाओं अंग्रेजी और गुजराती में प्रकाशित होता था। लेकिन कुछ समय बाद इसे हिंदी और तमिल में भी प्रकाशित किया।
भारत लौटने पर भी जारी रही पत्रकारिता
जनवरी 1915 में गांधी वापस भारत लौट आए। भारत में गांधी की पत्रकारिता की शुरूआत 1919 में यंग इंडिया नाम के साप्ताहिक पत्रिका के रूप में हुई। उन्होंने 1919 से 1931 तक लगभग बारह साल यंग इंडिया के संपादक के रूप में काम किया। इसका गुजराती संस्करण नवजीवन के नाम से प्रकाशित होता था। इसके बाद वर्ष 1933 से 1942 तक और फिर 1946 से 1948 गांधी हरिजन नामक साप्ताहिक समाचार पत्र के संपादक रहे।
Created On :   1 Oct 2026 10:14 PM IST











