El-Nino Prediction: 5 बार फेल साबित हो चुकी है अल-नीनो से जुड़ी भविष्यवाणी, सूखा पड़ने की जगह हुई खूब बारिश, इस बार क्या रंग दिखाएगा मौसम?

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। भारत में बारिश सिर्फ एक मौसम नहीं, बल्कि खेती, पानी के साथ करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी से जुड़ा मामला होता है। इस वजह से ही जब भी अल-नीनो का नाम सुनने मिलता है तो किसानों से लेकर मौसम वैज्ञानिकों तक की चिंता बढ़ने लगती है। आमतौर पर ऐसा माना जाता है कि अल-नीनो का मतलब कमजोर मानसून होता है। साथ ही सूखे का खतरा भी बढ़ जाता है। बीते कई दशकों के आंकड़ों के मुताबिक, हर बार ऐसा नहीं हुआ है। कई बार ऐसा भी देखा गया है कि अल-नीनो के बाद भी सामान्य और उससे ज्यादा बारिश हुई है।
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क्या है अल-नीनो?
अल-नीनो तब बनता है, जब प्रशांत महासागर के बीच और पूर्वी हिस्से में पानी सामान्य से ज्यादा गर्म होने लगता है। इसका असर पूरी दुनिया के मौसम पर देखने को मिलता है। भारत में ये आमतौर पर मानसून की हवाओं को और ज्यादा कमजोर करता है, जिससे बारिश कम हो सकती है। हालांकि, हर बार इसका असर एक जैसा देखने को नहीं मिलता है। कई बार दूसरे मौसमी बदलाव भी अल-नीनो के असर को कम कर देते हैं।
कई बार भविष्यवाणी भी साबित हुई गलत
बता दें, साल 1997–98 को दुनिया के सबसे ताकतवर अल-नीनो में गिना जाता है। उस समय पूरी दुनिया में मौसम बिगड़ा, कई देशों में सूखा और बाढ़ आई। भारत में भी खराब मॉनसून की आशंका जताई गई थी। लेकिन इसका बिल्कुल उल्टा देखने को मिला था। देश में सामान्य से ज्यादा बारिश हुई और बड़ा सूखा नहीं पड़ा। इसके पीछे हिंद महासागर की खास स्थिति को वजह माना गया। उस दौरान हिंद महासागर के पश्चिमी हिस्से का पानी ज्यादा गर्म था, जिससे मॉनसून को ताकत मिली और अल-नीनो का असर कमजोर पड़ गया। इसी तरह 1983 और 1994 में भी अल-नीनो के बावजूद अच्छी बारिश हुई। वहीं कुछ साल ऐसे भी रहे, जब कमजोर अल-नीनो ने बड़ा सूखा पैदा कर दिया। साल 2002 और 2009 इसका उदाहरण हैं।
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मौसम का खेल बहुत ही टेढ़ा
वैज्ञानिकों का कहना है कि सिर्फ अल-नीनो देखकर मॉनसून का पूरा अंदाजा लगाना सही नहीं है। कई दूसरी चीजें भी असर डालती हैं। हिंद महासागर का तापमान, हवा का दबाव, समुद्र की गर्मी और दुनिया भर में बढ़ता तापमान मॉनसून को बदल सकते हैं। कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि अब जलवायु परिवर्तन की वजह से पुराने मौसमीय पैटर्न भी बदल रहे हैं। पहले जहां अल-नीनो का असर ज्यादा साफ दिखता था, अब कई बार तस्वीर अलग नजर आती है।
अब बदल गया है मौसम का आंकलन
पहले मौसम विभाग सिर्फ अल-नीनो पर ज्यादा ध्यान देता था, लेकिन अब कई फैक्टर को साथ में देखा जाता है। वैज्ञानिक अब समुद्र के अलग-अलग हिस्सों की गर्मी, हिंद महासागर की स्थिति और वैश्विक तापमान की भी जांच करते हैं। यही वजह है कि अब मौसम की भविष्यवाणी पहले से ज्यादा जटिल हो गई है। विशेषज्ञ मानते हैं कि किसानों और सरकारों को सिर्फ अल-नीनो के भरोसे नहीं रहना चाहिए। पानी बचाने, खेती की तैयारी और मौसम की नई जानकारी पर लगातार नजर रखनी चाहिए और ये बहुत ही जरूरी भी है।
प्रकृति हर बार देती है नया सबक
बीते वर्षों के आंकड़ों के मुताबिक, अल-नीनो हमेशा भारत के लिए बुरी खबर नहीं होता। कई बार जब सूखे का डर जताया गया, तब अच्छी बारिश ने सभी को चौंका दिया। इससे साफ है कि प्रकृति का संतुलन बेहद जटिल है और मौसम को समझना आज भी बड़ी चुनौती बना हुआ है।
Created On :   19 May 2026 5:05 PM IST












