Chicken Neck Corridor: शुभेंदु अधिकारी ने केंद्र सरकार को सौंपा 'चिकन नेक', इसका क्या फायदा होगा? देश के लिए क्यों जरूरी है सिलिगुड़ी कॉरीडोर

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। भारत के मैप में एक बहुत ही छोटी सी लेकिन बहुत ही खास जगह है, जिसको लोग 'चिकन नेक' या सिलीगुड़ी कॉरीडोर के नाम से जानते हैं। ये कॉरीडोर देखने में तो सिर्फ और सिर्फ एक पतली सी जमीन की पट्टी लगती है, लेकिन, असल में ये हिस्सा पूरे उत्तर-पूर्व भारत को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने में मदद करता है। पश्चिम बंगाल की सरकार ने इस इलाके से जुड़े सात अहम राजमार्गों को केंद्र सरकार को सौं दिया है। ऐसा माना जा रहा है कि इससे सुरक्षा, सेना की आवाजाही और विकास के कामों में मदद मिलेगी और तेजी आएगी। ऐसे में चलिए इस चिकन नेक से जुड़ी कुछ अहम बातों के बारे में जानते हैं।
क्यों अहम है चिकन नेक?
सिलीगुड़ी कॉरीडोर पश्चिम बंगाल के उत्तरी हिस्से में स्थित है। इसका आकार इतना ज्यादा पतला है कि इसको 'चिकन नेक' कहा जाने लगा। करीब 60 किमी लंबे इस इलाके की सबसे संकरी जगह सिर्फ 20 से 22 किमी चौड़ी है। छोटा होने के बाद भी ये भारत का सबसे संवेदनशील इलाका माना जाता है। ये वही रास्ता है, जिसकी मदद से असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, सिक्किम और त्रिपुरा जैसे 8 उत्तर-पूर्वी राज्य देश से जुड़े हैं। रेल लाइनें और बड़े राजमार्ग इसी रास्ते से होकर गुजरते हैं। अगर कभी भी यहां पर कोई बड़ी आपदा आती है, तो उत्तर-पूर्व का संपर्क बाकी भारत से टूट सकता है।
क्यों लिया गया है ये फैसला?
पश्चिम बंगाल सरकार की तरफ से जिन सात राष्ट्रीय राजमार्गों को केंद्र को दिया गया है, उनमें पांच सीधे सिलीगुड़ी कॉरीडोर से जुड़े हैं। अब इन सड़कों की देखरेख और विकास का काम राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण और राष्ट्रीय राजमार्ग अवसंरचना विकास निगम की तरफ से संभाला जाएगा। अब तकर राज्य और केंद्र के अलग-अलग विभागों के बीच तालमेल नहीं थी, इसलिए ही कई सड़क परियोजनाएं अटकी हुई थीं और सड़क को चौड़ा करना, मरम्मत करने के साथ नई सुविधाओं का काम भी धीमे चल रहा था। अब केंद्र के सीधे नियंत्रण से इन कामों में तेजी देखने को मिल सकती है।
सीमा से घिरा बेहद संवेदनशील इलाका
यह इलाका सिर्फ देश के अंदरूनी संपर्क के लिए ही जरूरी नहीं है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय नजरिए से भी बहुत ही खास माना जाता है। इसके आसपास नेपाल, बांग्लादेश और भूटान की सीमाएं हैं। वहीं डोकलाम और तिब्बत के इलाके भी ज्यादा दूर नहीं हैं। चीन की नजरें लंबे समय से इस क्षेत्र पर बनी हुई हैं। ऐसे में यहां किसी भी तरह की गड़बड़ी या अव्यवस्था देश की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन सकती है। यही वजह है कि केंद्र सरकार इस इलाके को रणनीतिक तौर पर बहुत ही महत्वपूर्ण मानती है।
सेना को कैसे मिलेगा फायदा?
इस इलाके में सेना की कई अहम यूनिट तैनात हैं। उत्तर-पूर्वी सीमाओं तक हथियार, जरूरी सामान और जवानों को पहुंचाने के लिए मजबूत सड़क नेटवर्क बेहद जरूरी होता है। अब सड़कें सीधे केंद्र के अधीन आने से सेना की आवाजाही और तेज हो सकेगी। इमरजेंसी स्थिति में फौज बिना किसी देरी के सीमाई इलाकों तक पहुंच पाएगी। इससे देश की स्ट्रैटेजिक ताकत और ज्यादा मजबूत हो सकती है।
खत्म होगी सालों की देरी
अब तक कई सड़कें खराब हालत में थीं। खासकर पहाड़ी इलाकों में भूस्खलन और रखरखाव की कमी बड़ी समस्या बनी हुई थी। सिक्किम और दार्जिलिंग को जोड़ने वाले कई रास्तों पर अक्सर परेशानी दे खने को मिलती थी। अब उम्मीद जताई जा रही है कि फाइलों में अटकने वाले काम तेजी से पूरे होंगे। सड़कें बेहतर होंगी तो पर्यटन, व्यापार और स्थानीय कारोबार को भी फायदा मिलेगा। सफर आसान होगा और सामान पहुंचाने में समय और खर्च दोनों कम होंगे।
रणनीतिक रूप से क्यों अहम है यह कदम?
दुनिया में लगातार बदलते हालात और सीमा पर बढ़ते तनाव को देखते हुए भारत अब अपनी संवेदनशील जगहों को और मजबूत करने में जुटा है। ऐसे में 'चिकन नेक' जैसे अहम इलाके का सीधा नियंत्रण केंद्र सरकार के पास होना रणनीतिक तौर पर बड़ा फैसला माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे न सिर्फ देश की सुरक्षा मजबूत होगी, बल्कि उत्तर-पूर्व भारत के विकास को भी नई रफ्तार मिलेगी।
Created On :   19 May 2026 3:23 PM IST












