Sagar Toxic Liquor Case: बिहार और एमपी में भी 'पुलिस एनकाउंटर', आरोपी पर फायर करने की पुलिस को कितनी छूट, क्या कहते हैं एनकाउंटर के नियम

डिजिटल डेस्क, भोपाल। मध्यप्रदेश के सागर में जहरीली शराब से 20 लोगों की मौत के मामले में पुलिस ने फरार आरोपी मनीष लोधी उर्फ यशवंत ठाकुर को पकड़ने के लिए कार्रवाई की। बुधवार तड़के मालथौन इलाके में पुलिस और आरोपियों के बीच गोलीबारी हुई। पुलिस की जवाबी फायरिंग में मनीष के पैर में गोली लगी जबकि उसका साथी आशीष साहू भी घायल हो गया। दोनों को इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया है। इस घटना के बाद एक बार फिर एनकाउंटर को लेकर कई सवाल सामने आने लगे हैं। आखिर पुलिस को एनकाउंटर में कितनी छूट है और इसके बाद क्या नियम लागू होते हैं? तो चलिए इसे हम आसान भाषा में समझने की कोशिश करते हैं।
एनकाउंटर का क्या मतलब है
आसान भाषा में समझें तो एनकाउंटर पुलिस और अपराधी के बीच हुई मुठभेड़ को कहा जाता है। जब पुलिस किसी आरोपी को पकड़ने पहुंचती है और वह पुलिस पर हमला कर देता है तो पुलिस जवाबी कार्रवाई कर सकती है। ऐसी स्थिति को आम तौर पर एनकाउंटर कहा जाता है।
हालांकि, भारतीय कानून में ‘एनकाउंटर’ नाम से कोई अलग कानूनी शब्द या परिभाषा नहीं है। कानून में ऐसी कार्रवाई को आत्मरक्षा यानी अपनी जान बचाने के लिए की गई जवाबी कार्रवाई के तौर पर देखा जाता है।
गिरफ्तारी के समय पुलिस कितना बल इस्तेमाल कर सकती है?
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 43 के मुताबिक, अगर कोई व्यक्ति गिरफ्तारी का विरोध करता है या भागने की कोशिश करता है तो पुलिस उसे पकड़ने के लिए जरूरी बल का इस्तेमाल कर सकती है।
आपको बता दें कि, अगर आरोपी पर ऐसे गंभीर अपराध का आरोप है जिसकी सजा मौत या उम्रकैद हो सकती है तो कुछ परिस्थितियों में पुलिस की कार्रवाई से उसकी मौत भी हो सकती है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि पुलिस हर मामले में जानलेवा बल इस्तेमाल कर सकती है। कानून में इसकी सीमाएं तय हैं। छोटे या कम गंभीर अपराध के मामले में पुलिस को आरोपी की जान लेने की खुली छूट नहीं है।
आत्मरक्षा का अधिकार
भारतीय न्याय संहिता (BNS) में आत्मरक्षा का अधिकार दिया गया है। इसका मतलब है कि पुलिसकर्मी और आम लोग अपनी या किसी दूसरे व्यक्ति की जान बचाने के लिए जरूरी कदम उठा सकते हैं। अगर किसी पुलिस कार्रवाई के दौरान सामने से ऐसा हमला हो जिससे जान जाने का खतरा हो तो पुलिस अपनी या दूसरों की सुरक्षा के लिए जवाबी कार्रवाई कर सकती है। हालांकि, आत्मरक्षा के अधिकार की भी कानूनी सीमाएं हैं।
एनकाउंटर के बाद जांच कैसे होती है?
पुलिस मुठभेड़ में किसी व्यक्ति की मौत होने पर मामले की जांच जरूरी होती है। सुप्रीम कोर्ट ने PUCL बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में पुलिस एनकाउंटर की जांच के लिए कई नियम तय किए थे। इनमें मुठभेड़ में हुई मौत की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच पर जोर दिया गया है।
FIR दर्ज करना
अगर पुलिस की गोली से किसी व्यक्ति की मौत होती है तो घटना को लेकर FIR दर्ज की जानी चाहिए।
अलग टीम से जांच
जिस पुलिस टीम ने गोली चलाई वही टीम मामले की जांच नहीं करेगी। जांच किसी दूसरी पुलिस टीम या स्वतंत्र अधिकारी से कराई जानी चाहिए।
मजिस्ट्रेट की जांच
कुछ परिस्थितियों में मौत के कारण की जांच मजिस्ट्रेट भी कर सकता है। BNSS की धारा 196 में ऐसी जांच का प्रावधान है।
मानवाधिकार आयोग को जानकारी
ऐसे मामलों में मानवाधिकार से जुड़े नियमों के तहत संबंधित आयोग को जानकारी देने की व्यवस्था है।
मेडिकल और फोरेंसिक जांच
घटना में इस्तेमाल हथियारों और अन्य जरूरी सबूतों की जांच की जाती है। अगर कोई व्यक्ति घायल है तो उसे इलाज दिलाना जरूरी है। अगर जांच में यह सामने आता है कि पुलिस ने कानून के खिलाफ जाकर किसी व्यक्ति की जान ली तो संबंधित पुलिसकर्मियों पर मामले के अनुसार आपराधिक कार्रवाई हो सकती है।
याद रहे कि एनकाउंटर का मतलब यह नहीं है कि पुलिस को किसी आरोपी को सीधे मारने का अधिकार मिल जाता है। हर मामले में पुलिस की कार्रवाई की कानूनी जांच हो सकती है।
Created On :   23 Sept 2026 5:16 PM IST










