Gen Z का नया इंडिया: नौकरी, पैसा और पावर से आगे बढ़ी Gen Z की सोच, सर्वे ने बताई नए भारत की तस्वीर

नौकरी, पैसा और पावर से आगे बढ़ी Gen Z की सोच, सर्वे ने बताई नए भारत की तस्वीर
भारत की नई पीढ़ी को अक्सर तेज, डिजिटल और महत्वाकांक्षी कहा जाता है। लेकिन डेलॉइट के ग्लोबल सर्वे से सामने आई तस्वीर इस धारणा में एक दिलचस्प बदलाव दिखा रही है।

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। भारत की नई पीढ़ी को अक्सर तेज, डिजिटल और महत्वाकांक्षी कहा जाता है। लेकिन डेलॉइट के ग्लोबल सर्वे से सामने आई तस्वीर इस धारणा में एक दिलचस्प बदलाव दिखा रही है। भारत की जेन जी और मिलेनियल्स आगे बढ़ना तो चाहते हैं, लेकिन हर कीमत पर नहीं। उनके लिए बड़ी नौकरी, ज्यादा पैसा और नेतृत्व की कुर्सी महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है- आर्थिक स्थिरता, काम और जिंदगी का संतुलन, अपने मूल्यों के मुताबिक काम और ऐसा करियर जिसे लंबे समय तक निभाया जा सके। यही बदलाव आने वाले भारत की तस्वीर को समझने की एक अहम कुंजी है। जेन जी सिर्फ नई चीजें इस्तेमाल करने वाली पीढ़ी नहीं है, बल्कि यह तय करने वाली पीढ़ी भी है कि काम कैसे होगा, सफलता का मतलब क्या होगा और जिंदगी के बड़े फैसले कब लिए जाएंगे।

पहले मजबूत आधार, फिर बड़े फैसले

पिछली पीढ़ियों के लिए जिंदगी की एक पारंपरिक टाइमलाइन रही है- पढ़ाई, नौकरी, शादी, घर और परिवार। जेन जी इस टाइमलाइन को पूरी तरह खारिज नहीं करती, लेकिन इसे अपनी परिस्थितियों के हिसाब से तय करना चाहती है। डेलॉइट के ग्लोबल सर्वे के मुताबिक, जेन जी और मिलेनियल्स जिंदगी के बड़े फैसले लेने से पहले मजबूत आधार बनाना चाहते हैं। यानी करियर और पर्सनल लाइफ में स्थिरता मिलने के बाद ही वे बड़े कदम उठाने को प्राथमिकता दे रहे हैं। यह सोच नौकरी को लेकर भी दिखाई देती है। युवा ऐसा वर्क कल्चर चाहते हैं जहां महत्वाकांक्षा के साथ स्टेबिलिटी भी हो। यानी आज का सवाल सिर्फ 'मैं कितनी जल्दी सफल हो सकता हूं?' नहीं है। सवाल यह भी है कि 'क्या इस सफलता के साथ मेरी जिंदगी भी ठीक रहेगी?'

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महत्वाकांक्षा है, लेकिन 'हर कीमत पर' नहीं

यही जेन जी के नए इंडिया की सबसे दिलचस्प बात है। यह पीढ़ी महत्वाकांक्षी है, लेकिन सफलता के पुराने फॉर्मूले पर आंख बंद करके भरोसा नहीं करती है। डेलॉइट के ग्लोबल सर्वे में भारत के 96 फीसदी जेन जी और 93 फीसदी मिलेनियल्स ने सीनियर लीडरशिप की भूमिका में रुचि दिखाई है। जबकि 89 फीसदी और 87 फीसदी सुपरवाइजरी या मैनेजमेंट के रोल में जाना चाहते हैं। लेकिन जब पूछा गया कि क्या नेतृत्व उनकी पहली प्राथमिकता है, तो तस्वीर बदल जाती है। सिर्फ 9 फीसदी जेन जी और 8 फीसदी मिलेनियल्स ने सीनियर लीडरशिप को अपना प्राथमिक लक्ष्य बताया है। इसका मतलब साफ है- युवा नेतृत्व से दूर नहीं भाग रहे, लेकिन वे यह भी समझते हैं कि बड़ी जिम्मेदारी के साथ काम का दबाव और पर्सनल लाइफ पर असर बढ़ सकता है। उनके लिए नेतृत्व की चाहत से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं:

अच्छा वर्क-लाइफ बैलेंस + आर्थिक स्वतंत्रता + टिकाऊ करियर, जिसका साफ मतलबा है पद चाहिए, लेकिन ऐसा पद नहीं जो पूरी जिंदगी को नौकरी में बदल दे।

एआई: नौकरी का खतरा नहीं, करियर का औजार

जेन जी को डिजिटल पीढ़ी कहना अब पुरानी बात हो चुकी है। असली बदलाव यह है कि यह पीढ़ी एआई को भी अपने रोजमर्रा के काम का हिस्सा बना रही है। डेलॉइट के ग्लोबल सर्वे के अनुसार, भारत में 93 फीसदी जेन जी और 95 फीसदी मिलेनियल्स रोजमर्रा के काम में एआई का इस्तेमाल कर रहे हैं। वहीं 90 फीसदी से ज्यादा दोनों समूहों का मानना है कि एआई उनके प्रॉफेशनल और पर्सनल लाइफ पर सकारात्मक असर डाल रहा है। एआई का सबसे ज्यादा इस्तेमाल सीखने और विकास के लिए हो रहा है। इसके बाद करियर सलाह और काम से जुड़े तनाव से निपटने जैसे इस्तेमाल सामने आते हैं। यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि एआई को लेकर आम बहस अक्सर नौकरियां खत्म होने के डर पर केंद्रित रहती हैं। लेकिन भारतीय युवा इसे अलग नजरिए से देख रहे हैं। यानी जेन जी एआई से मुकाबला करने के बजाय उसे अपने करियर का हिस्सा बना रही है।

अब नौकरी में 'कितना मिलेगा' के साथ 'क्यों करूं' भी जरूरी

जेन जी के नए इंडिया को समझने के लिए एक और आंकड़ा बेहद अहम है। डेलॉइट के ग्लोबल सर्वे में भारत के 99 फीसदी जेन जी और 98 फीसदी मिलेनियल्स ने कहा कि नौकरी से संतुष्टि के लिए काम में उद्देश्य यानी पर्पज होना जरूरी है। यहां बात सिर्फ कंपनी के मिशन की नहीं है। युवा यह देखना चाहते हैं कि उनका काम उनके व्यक्तिगत विश्वासों और मूल्यों से कितना मेल खाता है। भारत में:

48 फीसदी जेन जी ने अपने व्यक्तिगत विश्वासों के कारण किसी संभावित नियोक्ता को ठुकराया।

मिलेनियल्स में यह आंकड़ा 41 फीसदी रहा है।

करीब आधे भारतीय युवाओं ने व्यक्तिगत विश्वासों के खिलाफ जाने वाली किसी परियोजना या जिम्मेदारी को भी ठुकराने की बात कही है।

यह एक बड़ा बदलाव है। पहले नौकरी और व्यक्तिगत विचारों को अक्सर दो अलग-अलग चीजें माना जाता था। अब युवा इन दोनों के बीच स्पष्ट संबंध देख रहे हैं। उनका संदेश कंपनियों के लिए काफी सीधा है- सिर्फ अच्छी सैलरी देकर टैलेंट को लंबे समय तक जोड़े रखना मुश्किल होगा, अगर कंपनी की सोच कर्मचारी की वैल्यूज से मेल नहीं खाती।

कंपनी भी बदलेगी, क्योंकि कर्मचारी बदल रहा है

यही वह जगह है जहां कंपनियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। जेन जी को पुराने ढांचे में फिट करने के बजाय कंपनियों को अपने ढांचे में बदलाव करना होगा। डेलॉइट इंडिया की चीफ पीपल एंड एक्सपीरियंस ऑफिसर दीप्ति सागर ने सुझाव दिया है कि संगठनों को अलग-अलग कर्मचारी समूहों की जरूरतों के हिसाब से अपनी टैलेंट रणनीति और कर्मचारी अनुभव को तैयार करना चाहिए। जिसका सीधा मतलब है कि आने वाले समय में एक ही नीति सभी कर्मचारियों पर लागू करने के बजाय ज्यादा व्यक्तिगत और फ्लेक्सिबल ऑप्शन की जरूरत पड़ सकती है। कंपनियों के लिए चुनौती यह होगी कि वे युवा कर्मचारियों को फ्रीडम दें, लेकिन ऑर्गेनाइजेशनल गोल से भी जोड़े रखें।

पैसे का दबाव कम दिखता है, लेकिन फैसले प्रभावित हो रहे हैं

जेन जी के पास डिजिटल दुनिया की सुविधा है, लेकिन आर्थिक चिंताएं इससे गायब नहीं हुई हैं। डेलॉइट के ग्लोबल सर्वे के मुताबिक, भारत में 54 फीसदी जेन जी और 44 फीसदी मिलेनियल्स ने आर्थिक स्थिति के कारण जिंदगी के बड़े फैसले टाले हैं। घर की कीमत भी बड़ा मुद्दा है। 60 फीसदी से ज्यादा भारतीय जेन जी और मिलेनियल्स का कहना है कि घर की चीजें उनके करियर से जुड़े फैसलों को प्रभावित करती है। मासिक खर्च को लेकर भी तस्वीर पूरी तरह आरामदायक नहीं है:

  • 20 फीसदी जेन जी को हर महीने जीवन-यापन का खर्च पूरा करने में परेशानी होती है।
  • मिलेनियल्स में यह आंकड़ा 13 फीसदी है।
  • वैश्विक स्तर पर जेन जी और मिलेनियल्स दोनों में यह आंकड़ा 34 फीसदी है।
  • यानी भारत की स्थिति वैश्विक औसत से बेहतर दिखाई देती है, लेकिन आर्थिक दबाव खत्म नहीं हुआ है। घर, खर्च और आर्थिक स्वतंत्रता अभी भी करियर और जिंदगी के बड़े फैसलों को प्रभावित कर रहे हैं।

जेन जी का नया इंडिया आखिर किस दिशा में जा रहा है?

इन सभी आंकड़ों को एक साथ देखें तो जेन जी की तस्वीर कुछ डीबेटेबल लग सकती है। यह पीढ़ी नेतृत्व चाहती है, लेकिन उसे प्राथमिक लक्ष्य नहीं मानती। एआई तेजी से अपना रही है, लेकिन तकनीक के साथ मानवीय जरूरतों को भी महत्व देती है। पैसा चाहती है, लेकिन अपने मूल्यों से समझौता नहीं करना चाहती। आगे बढ़ना चाहती है, लेकिन लगातार काम करते रहना नहीं चाहती। असल में यही विरोधाभास जेन जी के नए इंडिया की सबसे बड़ी पहचान है। यह पीढ़ी 'कम काम करो' नहीं कह रही, बल्कि 'बेहतर और टिकाऊ तरीके से काम करो' कह रही है। यह 'करियर मत बनाओ' नहीं कह रही, बल्कि पूछ रही है कि 'करियर के साथ जिंदगी कैसी होगी?' और शायद यही आने वाले भारत में सबसे बड़ा बदलाव साबित होगा। कंपनियों को प्रतिभा रोकने के लिए सिर्फ वेतन बढ़ाने से आगे सोचना होगा। नेतृत्व की परिभाषा बदलेगी। एआई काम करने के तरीके बदल देगा और नौकरी चुनते समय युवा कंपनी की प्रतिष्ठा के साथ उसकी सोच और मूल्यों को भी देखेंगे।

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Created On :   14 Aug 2026 6:58 PM IST

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