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ऐसा है भीमा कोरेगाव जंग का इतिहास.. 800 दलितों ने 28 हज़ार मराठाओं को दी थी मात

BhaskarHindi.com | Last Modified - January 03rd, 2018 15:07 IST

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डिजिटल डेस्क, पुणे। आज महाराष्ट्र के पुणे, कोरेगांव भीमा, पाबल और खिकरापुर में महार दलितों और मराठाओं के बीच जो हिंसा चल रही है,उसकी जड में आज की नहीं बल्कि करीब 200 साल पुरानी कहानी है। 1 जनवरी को महाराष्ट्र के पुणे से शुरु हुई हिंसा अब महानगर मुंबई तक पहुंच चुकी है। इस हिंसा में कई वाहनों को आग के हवाले कर दिया गया, जबकि बवाल में कथित रूप से एक व्यक्ति की मौत हो गई। यह लड़ाई आज की नहीं बल्कि 1818 से चला आ रहा है।

जानकारी के अनुसार महाराष्ट्र में सोमवार को जब यह हिंसा भड़की उस दौरान कोरेगांव भीमा में 1 जनवरी 1818 को पेशवा बाजीराव पर ब्रिटिश सैनिकों की जीत की 200वीं सालगिरह मनाई जा रही थी। दलित नेता 200 साल पुरानी इस परंपरा को 1 जनवरी के दिन मराठाओं पर महार दलितों की बड़ी जीत के जश्न के रूप में मनाते हैं। बताया जाता है कि 1 जनवरी 1818 को ब्रिटिश फ़ौज की तरफ से 800 महार दलितों ने करीब 28 हजार से अधिक मराठाओं को जंग में हराया था। जानकार मानते हैं कि महारों के लिए ये अँग्रेज़ों की नहीं बल्कि अपनी अस्मिता की लड़ाई थी। इसे कोरेगांव की लड़ाई भी कहा जाता है।

800 महार दलितों ने 28 हज़ार मराठाओं को खदेड़ा
जानकार बताते हैं कि पेशवा बाजीराव द्वितीय की अगुवाई में 28 हज़ार मराठा पुणे पर हमला करने की योजना बना रहे थे। इसी दौरान उन्हें रास्ते में 800 सैनिकों से सजी कंपनी फ़ोर्स मिली, जो पुणे में ब्रिटिश सैनिकों की ताक़त बढ़ाने के लिए जा रही थी। यह कंपनी फोस्स जब कोरेगांव पहुंची, उसी दौरान पेशवा ने उन पर हमला करने के लिए अपने 2 हज़ार सैनिक भेज दिए। इस कंपनी फोर्स की अगुवाई कप्तान फ्रांसिस स्टॉन्टन कर रहे थे। उनकी अगुवाई में ईस्ट इंडिया कंपनी की इस टुकड़ी ने क़रीब 12 घंटे तक अपनी पोज़ीशन संभाले रखी और मराठाओं को नाकामयाब करते हुए खदेड़ दिया।

अलग-अलग इतिहासकारों के मुताबिक इस लड़ाई में 834 कंपनी फ़ौजियों में से 275 मारे गए, घायल हुए या फिर लापता हो गए। इनमें दो अफ़सर भी शामिल थे। इंफ़ैंट्री के 50 लोग मारे गए और 105 ज़ख़्मी हुए। ब्रिटिश अनुमानों के मुताबिक पेशवा के 500-600 सैनिक इस लड़ाई में मारे गए या घायल हुए।

इस तरह बना ये इतिहास
इस टुकड़ी में भारतीय मूल के ज़्यादातर महार दलित थे और वो बॉम्बे नेटिव इनफ़ैंट्री से ताल्लुक रखते थे। ऐसे में दलित कार्यकर्ता इस घटना को दलित इतिहास का अहम हिस्सा मानते हैं। दलित नेता ब्रिटिश फ़ौज की इस जीत को महार दलितों की जीत मानते हैं और जश्न मनाते हैं। महार दलितों को उस समय अछूत माना जाता था। अछूत मानकर उस समय उनका काफी शोषण भी होता था।

जेम्स ग्रांट डफ़ ने अपनी किताब 'ए हिस्टरी ऑफ़ द मराठाज़' में इस लड़ाई का ज़िक्र किया है। इसमें लिखा है कि रात भर चलने के बाद नए साल की सुबह दस बजे भीमा के किनारे पहुंचे जहां उन्होंने करीब 25 हज़ार मराठाओं को रोके रखा। जबकि हेनरी टी प्रिंसेप की किताब हिस्टरी ऑफ़ द पॉलिटिकल एंड मिलिट्री ट्रांजैक्शंस इन इंडिया में इस लड़ाई में महार दलितों से सजी अंग्रेज़ टुकड़ी के साहस का ज़िक्र मिलता है।

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