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सर्वपितृ अमावस्या : ये है पितरों की शांति का मुहूर्त, अगले दिन स्नानदान

September 16th, 2017 16:43 IST
सर्वपितृ अमावस्या : ये है पितरों की शांति का मुहूर्त, अगले दिन स्नानदान

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। श्राद्ध पितरों का यज्ञ कहलाता है। सर्वपितृ अमावस्या 19 सितम्बर 2017 मंगलवार 11.52 से प्रारम्भ होकर अगले दिन 20 सितम्बर 2017 बुधवार 11.15 तक होगी। भगवान राम के पिता महाराज दशरथ का पिंडदान भी दोपहर में ही किया गया था। इसलिए मान्यता है कि पितृ पक्ष से जुड़े कर्मकांड दोपहर में किए जाने चाहिए। इस वजह से 19 को ही सर्वपितृ अमावस्या मनाई जाएगी, अगले दिन इसे स्नान-दान अमावस्या का योग है। श्राद्ध पक्ष सोलह दिन के होते हैं लेकिन इस बार पंद्रह दिन के हैं।  इसमें अमावस्या का बड़ा महत्व है। आश्विन मास की अमावस्या पितरों की शांति का सबसे अच्छा मुहूर्त है। जिन लोगों ने अपने पूर्वजों का तीन वर्ष तक श्राद्ध न किया हो, उनके पितर पितृ योनि से वापस प्रेत योनि में आ जाते हैं अत: उनकी शांति के लिए तीर्थस्थान में श्राद्ध किया जाता है।

पितरों की मिलती है कृपा
धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि पितृ को पिण्डदान करने वाला गृहस्थ दीर्घायु पुत्र-पौत्रादि, यश, स्वर्ग, पुष्टि, बल, लक्ष्मी, पशु, सुख साधन तथा धन की प्राप्ति करता है। साथ ही पितरों की कृपा से उसे सब प्रकार की समृद्धि, सौभाग्य, राज्य तथा मोक्ष भी मिलता है। पितृपक्ष में पितरों को उम्मीद रहती है कि हमारे पुत्र-पौत्रादि हमें पिण्डदान तथा तिलांजलि प्रदान कर संतुष्ट करेंगे। 

अमवस्या तिथि का श्राद्ध उनके लिए होता है, जिनकी मृत्यु अमावस्या तिथि, पूर्णिमा तिथि या चतुर्थी तिथि पर हुई हो। जो लोग अन्य तिथियों में अपने पूर्वजों का तर्पण नहीं कर पाते वे भी अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए इसी दिन श्राद्ध करते है। इसके अलावा यदि पित्रों की मृत्यु तिथि याद नहीं है तो भी श्राद्ध इसी दिन किया जा सकता है। इसी वजह से इसे सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या कहा जाता है।

ऐसे करें पूजा 

  • पितृमोक्ष या पितृ विसर्जनी अमावस्या को प्रातः स्नान के बाद गायत्री मंत्र जपते हुए सूर्य को जल चढ़ाएं। 
  • इस दिन पवित्र नदियों में भी स्नान का अति महत्व है। 
  • इसके बाद घर में बने भोजन में से पंचबलि जिसमें सर्वप्रथम गाय के लिए, फिर श्वान के लिए, फिर कौए के लिए, फिर देवादि बलि एवं उसके बाद चीटियों के लिए भोजन का अंश देकर श्रद्धापूर्वक पितरों से सभी प्रकार का मंगल होने की प्रार्थना करें।
  •  पितरों की शांति के निमित्त तर्पण, ब्राह्मण भोजन, साधा (कच्चा अन्न), वस्त्र, भूमि, गोदान, स्वर्ण दान इत्यादि कर्म किए जाते हैं।
    इस प्रकार संकल्प में गौ भूमि इत्यादि देने के पहले जल छोड़ें।
  • अपने रहने के स्थान का नाम (देश, प्रदेश, मोहल्ला) इत्यादि उच्चारण करें तथा सूर्य का स्थान, ऋतु, मास का नाम, पक्ष, तिथि, दिन, अपना गौत्र इत्यादि उच्चारण करें। यह करना कठिन लगे तो अपनी भाषा में कार्य, अपना नाम, गोत्र इत्यादि बोलकर जल छोड़ें।
  • पितृपक्ष में श्रीमद् भागवत का मूल पाठ करवाएं। गयाजी में पिंडदान करवाएं। यह सभी कार्य पितरों की शांति के लिए उत्तम उपाय है। 
  • यदि आप घर में जल दे रहे थे ताे आमंत्रित करके लाए गए पितरों को श्रद्धापूर्वक विधि-विधान से विदा करें और उनसे ने आशीर्वाद देने की प्रार्थना करें।
  • अमावस्या पर श्राद्ध मुख्य रूप से जिस भी स्थान या पवित्र नदी के तट पर कर रहे हैं। उसे पंडित के द्वारा ही विधि-विधान से ही पूर्ण कराएं।

ऐसे जाएं शरण में
यदि अपरिहार्य परिस्थितियों अथवा आर्थिक समस्याआें के कारण श्राद्ध  संभव न हो, तो अंतिम विकल्प के रूप में आप विधि के इस विकल्प का विचार कर सकते हैं ।

बाहर खुले स्थान पर जाएं तथा दक्षिण की आेर मुख करें ।
अपने दोनों हाथ ऊपर उठाएं (शरणागति दर्शाने हेतु) आैर भगवान दत्तात्रेय से प्रार्थना करें – मैं असहाय हूं, मैं अपने सभी पूर्वजों को प्रणाम करता हूं । मेरे सभी मृत पूर्वज मेरी भक्ति से प्रसन्न हों । हे भगवान दत्तात्रेय, आप कृपा कर मेरे मृत पूर्वजों को गति प्रदान करें आैर मुझे पितरों के ऋण से मुक्त करें ।

श्राद्ध के लिए प्रसिद्ध 
श्राद्ध के लिए सबसे पवित्र स्थान गया तीर्थ है। जिस प्रकार पितृ के मुक्ति के लिए गया को परम पुण्यदायी माना गया हैए उसी प्रकार माता के लिए काठियावाड़ का सिद्धपुर स्थान परम फलदायी माना गया है। यह स्थान मातृगया के नाम से भी प्रसिद्ध है।

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