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पढ़ने-लिखने की उम्र में मजदूरी करने के लिए मजबूर हैं भारत के एक करोड़ बच्चे !

पढ़ने-लिखने की उम्र में मजदूरी करने के लिए मजबूर हैं भारत के एक करोड़ बच्चे !

डिजिटल डेस्क, मुम्बई। बचपन जिंदगी का सबसे अनमोल पल होता है, सब लोग इसे बहुत ही बेहतर तरीके से जीते है, लेकिन इस दुनिया में वैसे भी कुछ लोग होते हैं, जिन्हें अपना बचपन भी नसीब नहीं होता है। उनकी मजबूरी उनके बचपन पर हावी हो जाती है और वे बच्चे मजदूरी करने पर विवश हो जाते है। अगर हम भारत की बात करें तो पाएंगे कि बाल मजदूरी हमारे देश की बहुत पुरानी एवं सबसे बड़ी समस्या रही है। पढ़ने और खेलने कूदने की उम्र में दुनिया के लगभग 152 मिलियन बच्चों में से 50 प्रतिशत बच्चे बाल श्रम में लगे हुए हैं। परिवार ​की जिम्मेदारी के बोझ तले ये बच्चे, अपने परिवार को पालने के लिए फेक्ट्री, कारखानों में काम करने लगते हैं।

आपको यह जानकर हैरानी होगी कि कारखानों और फेक्ट्री में काम के दौरान हर दिन करीब 10 बच्चे अपनी जान गवा देते हैं। विश्वभर में बच्चों के साथ हो रहे इस अपराध के विरुद्ध लोगों को जागरुक करने के लिए, हर साल 12 जून को विश्वभर में विश्‍व बाल श्रम निषेध दिवस (World Day Against Child Labour) मनाया जाता है। 

विश्‍व बाल श्रम निषेध दिवस की थीम
इस दिन की शुरुआत साल 2002 में 'द इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन' की ओर से की गई थी। इसका उद्देश्य बाल मजदूरी के खिलाफ जागरूकता फैलाने और 14 साल से कम उम्र के बच्‍चों को इस काम से निकालकर उन्‍हें शिक्षा दिलाना है। ​हर साल एक विशेष थीम के अंतर्गत इस दिन को मनाया जाता है। इस बार भी बाल श्रम दिवस को ‘Children shouldn’t work in fields, but on dreams!’ थीम पर मनाया जा रहा है। यह थीम दुनिया भर में कृषि क्षेत्र में काम करने वाले बच्चों के विकास पर केंद्रित है। लगभग 152 मिलियन बच्चे अभी भी खेती, बाल श्रम में लगे हुए हैं। 

एक करोड़ बाल श्रमिक सिर्फ भारत में
अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) की रिपोर्ट के अनुसार 15 करोड़ बच्चे दुनिया बाल श्रम करने को मजबूर हैं। यह आंकड़ा तब और भयानक लगता है। जब हमें यह पता चलता है कि इनमें से 1 करोड़ से ज्यादा बाल मजदूर भारत में हैं। यह आंकड़ा साल 2011 की जनगणना के अनुसार है। बाल संरक्षण से जुड़े कार्यकर्ताओं के अनुसार हर साल बाल श्रमिकों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। लाख कोशिशों के बावजूद इनके हालातों में कमी होने का नाम ही नहीं ले रही है। 

बढ़ रहा क्राइम है कारण
हर साल ह्यूमन ट्रैफिकिंग कर मासूम बच्चों को उनके परिवारों से अलग कर दिया जाता है और बाल मजदूरी करने पर ​मजबूर किया जाता है। बांग्लादेश, नेपाल समेत सीमा से सटे देशों से नाबालिग बच्चों को गैरकानूनी रूप से भारत लाया जाता है। मासूमों को मजबूर और नाबालिग लड़कियों को वेश्यावृत्ति के रास्ते पर ढकेल दिया जाता है। बच्चों की खरीद-फरोख्त भी इनमें शामिल है। उनके अंगों का कारोबार भी किया जाता है। 

देश में है बाल मजदूरी के खिलाफ कानून

बच्चों की इस स्थिति को सुधारने के लिए देश में बाल मजदूरी से जुड़ा कानून बनाया गया। जब इसमें कुछ सुधार नजर नहीं आया तो साल साल 2016 में इसमें बदलाव कर इसे और सख्त बनाया गया। इसके बावजूद भी सुधार की कोई गुजाइंश नजर नहीं आईं। 

कैलाश सत्यार्थी ने किया इस विषय पर काम
नोबेल पुरस्कार से सम्मानित कैलाश सत्यार्थी कई दशकों से बाल मजदूरी के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं। उनके संगठन ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ के अनुसार, देश में करीब 7 से 8 करोड़ बच्चों को उनका हक यानी नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा नहीं मिल पा रही है। यह बच्चे स्कूल जाने के बजाय बाल मजदूरी के जाल में फंसे हुए हैं। वह पढ़ना चाहते हैं, लेकिन मजदूरी की मजबूरी ने उनके पैरों को बेड़ियों में जकड़ा हुआ है। देश में अगर सरकार, संबंधित विभाग, गैर-सरकारी संस्थाएं और पंचायती व्यवस्थाएं मिलकर काम करें तो भारत से बाल मजदूरी का अंत निश्चित है।

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