स्वास्थ्य मंत्रालय की विशेष पहल, बाल कैंसर के इलाज में बेहतर पहुंच पर जोर

स्वास्थ्य मंत्रालय की विशेष पहल, बाल कैंसर के इलाज में बेहतर पहुंच पर जोर
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के तहत स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय (डीजीएचएस) के उप महानिदेशक एल. स्वस्तिचरण ने गुरुवार को कहा कि बचपन के कैंसर से निपटने के लिए केंद्र सरकार सारी परेशानियों को खत्म करने के लिए प्रतिबद्ध है। इसका मकसद है कि पीड़ित सभी बच्चे स्वस्थ भविष्य गुजार सकें।

नई दिल्ली, 21 मई (आईएएनएस)। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के तहत स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय (डीजीएचएस) के उप महानिदेशक एल. स्वस्तिचरण ने गुरुवार को कहा कि बचपन के कैंसर से निपटने के लिए केंद्र सरकार सारी परेशानियों को खत्म करने के लिए प्रतिबद्ध है। इसका मकसद है कि पीड़ित सभी बच्चे स्वस्थ भविष्य गुजार सकें।

इंडियन चाइल्डहुड कैंसर इनिशिएटिव (आईसीसीआई) द्वारा आयोजित एक कार्यशाला में स्वस्तिचरण ने कहा कि बचपन का कैंसर सरकारी कार्यक्रमों के लिए सबसे आसान लक्ष्य है। उन्होंने बताया कि खासकर बच्चों के कैंसर में मरीजों की जीवित रहने की दर बढ़ाना अन्य बीमारियों की तुलना में ज्यादा आसान है।

यह कार्यशाला ‘राष्ट्रीय बचपन कैंसर कार्यक्रम’ के लिए रोडमैप तैयार करने के उद्देश्य से आयोजित की गई थी।

उप महानिदेशक ने सुझाव दिया कि केरल और तमिलनाडु में विकसित मॉडलों से सीख लेनी चाहिए। इन मॉडलों में स्वयं-सहायता समूहों को शामिल किया गया है और 'प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना' से जुड़े आर्थिक सहायता मॉडलों का इस्तेमाल किया गया है।

स्वस्तिचरण ने कैंसर के मरीजों के जीवित रहने के बाद (पोस्ट-सर्वाइवल) मिलने वाली सहायता पर भी जोर दिया।

उन्होंने कहा कि किसी मरीज को ठीक करने के हमारे सभी बेहतरीन प्रयास उसके जीवित रहने के साथ ही खत्म नहीं हो जाने चाहिए, बल्कि आगे भी जारी रहने चाहिए। हमें समुदाय को शामिल करके और कई पक्षों के गठजोड़ के जरिए, कैंसर से उबर चुके लोगों को सहायता देने का काम अपने हाथ में लेना होगा। बचपन के कैंसर से निपटने के लिए उसकी जल्द पहचान होना सबसे ज्यादा जरूरी है।

उन्होंने कहा कि यह 'नोटिफिएबल बीमारी' (जिसकी जानकारी देना जरूरी हो) के रूप में एक अहम मुद्दा है। हम इस विषय पर अभी भी आईसीएमआर के साथ मिलकर काम कर रहे हैं। हमारा मकसद यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी मरीज छूट न जाए।

डब्ल्यूएचओ के दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र में 'कैंसर नियंत्रण' के तकनीकी अधिकारी बिष्णु गिरि ने कहा कि बचपन के कैंसर पर किया जाने वाला खर्च न तो कोई फालतू का खर्च है और न ही पैसे की बर्बादी, बल्कि इस बीमारी पर खर्च किए गए हर एक डॉलर से हमें आर्थिक रूप से 3 डॉलर का फायदा होता है। विकासशील देशों में तो यह फायदा और भी ज्यादा होता है। इसके अलावा सामाजिक फायदे भी होते हैं।

उन्होंने सुझाव दिया कि बचपन के कैंसर की देखभाल और उसके नतीजों को बेहतर बनाने के लिए, फंडिंग के स्रोतों का इस्तेमाल करके एक टिकाऊ आर्थिक व्यवस्था बनाई जानी चाहिए।

आईसीसीआई की गवर्निंग काउंसिल के सदस्य, रमनदीप अरोड़ा ने कहा कि देश में अब क्लिनिकल सुविधाएं और मेडिकल विशेषज्ञता उपलब्ध हैं। अब बस सरकार से थोड़ी सी मदद की जरूरत है ताकि जमीनी स्तर पर इसके नतीजों का दायरा और बढ़ाया जा सके।

उन्होंने आगे कहा कि एक 'राष्ट्रीय बचपन कैंसर कार्यक्रम' शुरू करना, और डब्ल्यूएचओ के साथ एक एमओयू (समझौता ज्ञापन) पर हस्ताक्षर करना है, जिसके तहत भारत को एक साझीदार देश के तौर पर प्राथमिकता दी जाएगी। यह देश में कैंसर के इलाज से जुड़ी वैश्विक स्तर की बेहतरीन पद्धतियों और तकनीकों को लाने में और भी ज्यादा मददगार साबित होगा।

डब्ल्यूएचओ इंडिया में एनसीडी के राष्ट्रीय पेशेवर अधिकारी अभिषेक कुंवर ने कहा कि हमें पहले से चल रहे एनसीडी कार्यक्रमों से ही सीख लेनी चाहिए। किसी एक खास बीमारी के लिए हमें अलग से कोई नया कार्यक्रम शुरू करने की जरूरत नहीं है।

सितंबर 2022 में राज्यसभा में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण पर विभाग से जुड़ी संसदीय स्थायी समिति ने अपनी 139वीं रिपोर्ट में, जिसका शीर्षक था 'कैंसर देखभाल योजना और प्रबंधन: रोकथाम, निदान, अनुसंधान और कैंसर इलाज की सामर्थ्य', भारत में बच्चों के कैंसर के लिए एक खास नीति ढांचे की जरूरत को औपचारिक रूप से स्वीकार किया।

मैक्स हॉस्पिटल के कैंसर विशेषज्ञ रमनदीप अरोड़ा ने कहा कि रिपोर्ट में यह बात कही गई है कि सरकार इस विचार से सहमत है कि मंत्रालय को एक 'राष्ट्रीय बाल कैंसर व्यापक प्रबंधन नीति' बनाने की दिशा में काम करना चाहिए, जिसमें सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्रों में शुरुआती निदान, साझा देखभाल, और बच्चों के कैंसर के लिए एकीकृत देखभाल शामिल हो।

यह वर्कशॉप आईसीसीआई ने आयोजित की थी। आईसीसीआई एक राष्ट्रीय, कई पक्षों वाला मंच है, जिसे 2023 में भारत में बच्चों के कैंसर की देखभाल को मजबूत करने के लिए, मिलकर काम करने और नीति बनाने में शामिल होने के मकसद से शुरू किया गया था।

आईसीसीआई और दूसरी स्टडीज के मुताबिक, भारत में हर साल बच्चों के कैंसर के लगभग 75,000 नए मामले सामने आते हैं, और उनके बचने की दर लगभग 60 प्रतिशत है।

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Created On :   21 May 2026 8:33 PM IST

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