फैसला जल्द!: मराठवाड़ा में सूखे के हालात के बीच कृत्रिम बारिश की मांग, प्रशासन को दिया आवेदन

मराठवाड़ा में सूखे के हालात के बीच कृत्रिम बारिश की मांग, प्रशासन को दिया आवेदन
  • मंत्री जयकुमार गोरे बोले- कृत्रिम बारिश पर मुख्यमंत्री फडणवीस लेंगे फैसला
  • मराठवाड़ा में बारिश की कमी से बढ़ी चिंता

डिजिटल डेस्क, मुंबई. सोमदत्त शर्मा। महाराष्ट्र में बारिश की कमी से पैदा हुए सूखे जैसे हालात के बीच अब मराठवाड़ा के कुछ हिस्सों से कृत्रिम बारिश कराने की मांग उठने लगी है। जालना और बीड के स्थानीय लोगों ने प्रशासन से मुलाकात कर इस संबंध में आवेदन दिया है। उनका कहना है कि क्षेत्र में अपेक्षित बारिश नहीं होने से खेतों में खड़ी फसलें बर्बाद हो रही हैं और आने वाले दिनों में स्थिति और गंभीर हो सकती है। ऐसे में बादलों की उपलब्धता होने पर क्लाउड सीडिंग यानी कृत्रिम बारिश का प्रयोग करने पर सरकार को विचार करना चाहिए। इसी बीच कृत्रिम बारिश पर राज्य के ग्रामीण विकास मंत्री और सोलापुर के पालकमंत्री जयकुमार गोरे ने 'दैनिक भास्कर' से बातचीत में कहा है कि राज्य में कृत्रिम बारिश के प्रयोग को लेकर अंतिम फैसला मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस लेंगे। गोरे का यह बयान ऐसे समय आया है जब राज्य के कई हिस्सों में बारिश की कमी से किसान और ग्रामीण चिंतित हैं।

मराठवाड़ा में बारिश की कमी से बढ़ी चिंता

मराठवाड़ा में बारिश की कमी को लेकर कृत्रिम बारिश की मांग सामने आई है। अभी तक की रिपोर्टों के अनुसार मराठवाड़ा में सामान्य से करीब 38 प्रतिशत बारिश की कमी दर्ज की गई है जिससे सोयाबीन, कपास तथा बाजरा जैसी खरीफ फसलों पर इसका असर पड़ रहा है। लातूर सहित मराठवाड़ा के कई इलाकों में कम बारिश के कारण किसानों की चिंता बढ़ने की खबरें सामने आई हैं। कुछ दिनों पहले कांग्रेस के पूर्व विधायक धीरज देशमुख ने भी सरकार से मराठवाड़ा में कृत्रिम बारिश का प्रयोग तत्काल शुरू करने की मांग की थी। अब स्थानीय लोगों द्वारा की गई कृत्रिम बारिश की मांग ने मामले को और हवा दे दी है।

महाराष्ट्र में पहली बार कब बनी थी कृत्रिम बारिश की रूपरेखा?

महाराष्ट्र में कृत्रिम बारिश को लेकर सरकारी स्तर पर चर्चा 2015 में ही तेज हुई थी। जून 2015 में तत्कालीन महाराष्ट्र सरकार ने सूखे से प्रभावित मराठवाड़ा और विदर्भ में क्लाउड सीडिंग के जरिए कृत्रिम बारिश कराने की योजना पर काम शुरू किया था। उस समय इस योजना पर पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर 10 करोड़ रुपए खर्च करने का फैसला हुआ था। सरकार की योजना का उद्देश्य यह था कि यदि क्लाउड सीडिंग के प्रयोग से बारिश बढ़ाने में सफलता मिलती है तो इसे बड़े क्षेत्र में लागू किया जा सकेगा। लेकिन तत्कालीन कृषि मंत्री एकनाथ खड़से के तमाम प्रयासों के बाद कृत्रिम बारिश का यह प्रोजेक्ट असफल रहा। इसके बाद कृत्रिम बारिश का प्रयोग 2019 में मराठवाड़ा में हुआ था। मई 2019 में राज्य सरकार ने सूखे और मानसून में देरी की आशंका को देखते हुए मराठवाड़ा तथा विदर्भ के जलग्रहण क्षेत्रों में क्लाउड सीडिंग कराने का फैसला किया था। इसके लिए करीब 30 करोड़ रुपए की परियोजना को मंजूरी दी गई थी, लेकिन यह भी सफल नहीं हो सकी।

आखिर कृत्रिम बारिश होती कैसे है?

कृत्रिम बारिश को आम भाषा में 'आसमान से बारिश बनाना' कहा जाता है। इसे क्लाउड सीडिंग यानी बादलों में बीजारोपण कहा जाता है। इस प्रक्रिया में सबसे पहली और जरूरी शर्त है कि आसमान में पर्याप्त नमी वाले उपयुक्त बादल पहले से मौजूद हों। केवल साफ आसमान में विमान भेजकर बारिश नहीं कराई जा सकती। क्लाउड सीडिंग बारिश की कमी वाले इलाके में बादल लाने का विकल्प नहीं है, यह केवल पहले से मौजूद उपयुक्त बादलों में वर्षा बढ़ाने का प्रयास कर सकती है। विमान या अन्य निर्धारित माध्यमों से बादलों के भीतर ऐसे कण पहुंचाए जाते हैं जो पानी की बूंदों या बर्फ के क्रिस्टल बनने की प्रक्रिया को बढ़ावा देते हैं। इन कणों के आसपास बादल में मौजूद नमी बड़ी बूंदों या बर्फ के कणों का रूप लेती है। जब ये कण पर्याप्त बड़े और भारी हो जाते हैं तो वे बारिश या बर्फ के रूप में नीचे गिरते हैं।

Created On :   21 Sept 2026 7:55 PM IST

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