बॉम्बे हाई कोर्ट: सिद्धिविनायक मंदिर भूमि अधिग्रहण मामले में मकान मालिक और किरायेदार को बराबर मुआवजे का आदेश

सिद्धिविनायक मंदिर भूमि अधिग्रहण मामले में मकान मालिक और किरायेदार को बराबर मुआवजे का आदेश
  • राज्य सरकार ने भक्तों के लिए एक वेटिंग हॉल और 'भक्ति निवास' बनाने के लिए जमीन का किया है अधिग्रहण
  • सिद्धिविनायक मंदिर भूमि अधिग्रहण मामला

डिजिटल डेस्क, मुंबई. बॉम्बे हाई कोर्ट ने मंगलवार को मुंबई के श्री सिद्धिविनायक गणपति मंदिर ट्रस्ट के लिए अधिग्रहित प्रभादेवी स्थित एक संपत्ति के मामले में 10 करोड़ 94 लाख रुपए के मुआवजे को जमीन मालिकों और उनके लंबे समय से किरायेदार रहे सदानंद गैरेज के बीच बराबर के अनुपात में बांटने का आदेश दिया। 19 सितंबर 2002 की स्थिति के अनुसार 642.98 वर्ग मीटर के इस प्लॉट का बाजार मूल्य 1 लाख 70 हजार 200 प्रति वर्ग मीटर तय किया।

न्यायमूर्ति अमित बोरकर की एकलपीठ ने स्पेशल लैंड एक्विजिशन ऑफिसर की याचिका को खारिज करते हुए कहा कि भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894' की धारा 23 के तहत खुले बाजार मूल्य को तय करने के लिए इन दरों का कोई कानूनी आधार नहीं है। पीठ ने 'स्पेशल लैंड एक्विजिशन ऑफिसर' द्वारा 'रेडी रेकनर दरों' (सरकारी तय दरें) के आधार पर किए गए मूल्यांकन को खारिज कर दिया।

इसके बजाय पीठ ने आसपास की वैसी ही संपत्तियों के वास्तविक पंजीकृत सौदों के आधार पर मूल्यांकन किया। जमीन के लिए कुल मुआवजा 10 करोड़ 94 लाख रुपए के तय किया गया। इसके अलावा वहां मौजूद ढांचों और पेड़ों के लिए मालिकों को अलग से 3 लाख 85 हजार रुपए दिए गए। इस मुआवजे की रकम को बांटने को लेकर विवाद खड़ा हो गया था। जमीन मालिकों ने पूरी रकम की मांग की। जबकि सदानंद गैरेज ने 1971 से लगातार वहां काबिज होने का हवाला देते हुए मुआवजे में 75 प्रतिशत हिस्से का दावा किया।

पीठ ने पाया कि हालांकि गैरेज ने अपनी वैध किरायेदारी और वहां व्यवसाय करने की बात साबित कर दी, लेकिन वे पूरे खुले प्लॉट पर अपना मालिकाना हक या स्थायी पट्टा (परपेचुअल लीज) साबित करने में विफल रहे। पीठ ने कहा कि संपत्ति के मूल्यांकन में उस पर मौजूद वास्तविक बोझ (जैसे किरायेदार का कब्जा) को ध्यान में रखा जाना चाहिए।

पीठ ने कहा कि जब कोई किरायेदार संपत्ति पर काबिज हो, तो मालिक यह दावा नहीं कर सकता कि जमीन खाली थी और उसके अपने कब्जे में थी। पीठ ने निष्कर्ष निकाला कि मामले के तथ्यों को देखते हुए, मुआवजे की रकम को बराबर-बराबर बांटना ही उचित है। पीठ ने कहा कि मालिकों के पास स्वामित्व के महत्वपूर्ण अधिकार थे, लेकिन ये अधिकार गैरेज से जुड़े स्थापित किरायेदारी और कब्ज़े के अधिकारों के अधीन थे।

पीठ ने सेंचुरी डेवलपर्स के मुआवजे के दावे और फ्लैट खरीदने के इच्छुक लोगों की हिस्सेदारी तय करने की याचिकाओं को भी खारिज कर दिया। पक्षों को स्वतंत्र संविदात्मक उपायों का सहारा लेने का निर्देश दिया गया। सक्षम प्राधिकारी को आठ सप्ताह के भीतर राशि का भुगतान करने का निर्देश दिया गया।

Created On :  

Tags

Next Story