जब पार्टी बचाने एक शब्द बोलने को तैयार नहीं हुए थे बाला साहेब ठाकरे, वरिष्ठ पत्रकारों ने सुनाए संस्मरण

जब पार्टी बचाने एक शब्द बोलने को तैयार नहीं हुए थे बाला साहेब ठाकरे, वरिष्ठ पत्रकारों ने सुनाए संस्मरण
  • मंत्रालय व विधानमंडल पत्रकार संघ के सत्कार समारोह में वरिष्ठ पत्रकारों ने सुनाए संस्मरण
  • पार्टी बचाने एक शब्द बोलने को तैयार नहीं हुए थे बाला साहेब ठाकरे

Mumbai News. समय के साथ पत्रकारिता तेजी से बदल रही है। तेजी से बदलती तकनीक की दुनिया से पत्रकारिता भी अछुती नहीं रही है पर पत्रकारिता के मूल्य हमेशा बचे रहने चाहिए। पत्रकारों की नई पीढ़ी को इस का बात ख्याल रखने की जरुरत है। मंत्रालय स्थित पत्रकार कक्ष में मंत्रालय व विधानमंडल पत्रकार संघ की तरफ से आयोजित वरिष्ठ पत्रकार सुकृत खांडेकर के अमृतवर्ष समारोह के मौके पर वरिष्ठ पत्रकारों ने यह विचार व्यक्त किए। इस दौरान "दैनिक भास्कर' के समूह संपादक प्रकाश दुबे के हाथों श्री खांडेकर को सम्मानित किया गया।

इस मौके पर पत्रकारिता के पुराने दिनों को याद करते हुए खांडेकर ने कहा कि दिसंबर 1991 में विधानमंडल के नागपुर सत्र के दौरान शिवसेना के वरिष्ठ नेता छगन भुजबल ने पार्टी के 16 विधायकों को लेकर बगावत कर दी थी। भुजबल कहां हैं किसी को पता नहीं चल रहा था। खांडेकर ने बताया कि हम पत्रकार नागपुर में विधानमंडल की रिपोर्टिंग के लिए गए थे। हम कुछ पत्रकार तत्कालिन गृहमंत्री पद्मसिंह पाटील के पास पहुंचे और उनसे कहा की हमें भुजबल से मिलना है। पाटील ने एक वाहन से हमें उस स्थान पर भेजा जहां भुजबल थे। मैंने भुजबल ने कहा कि बाला साहेब ठाकरे ने आप को सबकुछ दिया, इसके बावजूद आप उनके खिलाफ बगावत क्यों कर रहे हैं। हमारी बातें सुन भुजबल भावुक हो गए और बोले बाला साहेब सिर्फ एक बार मुझ से फोन पर ही ये छगन..बोल दें तो मैं उनके पास तुरंत लौट जाऊंगा। वह दौर मोबाईल-इंटरनेट वाला नहीं था। मैंने शिवसेना के नेता शिशिर शिंदे से यह बात बताई। उन्होंने बाला साहेब तक यह संदेश पहुंचाया पर बाला साहेब भुजबल से बात करने को तैयार नहीं हुए और शिवसेना टूट गई। खांडेकर ने कहा कि वह अलग दौर थाष तब मंत्रालय में सबके दरवाजे खुले रहते थे। कहीं जाने के लिए पास की जरूरत नहीं रहती थी। इस दौरान खांडेकर ने अपने पुराने पत्रकार साथियों को याद किया। उन्होंने बताया कि 1973 के दौरान अखबार में मुझे वेतन 230 रुपये मालिक वेतन मिलता था।

दैनिक भास्कर के समूह संपादक प्रकाश दुबे ने कहा कि उस वक्त मुंबई से बड़ी संख्या में पत्रकार दिल्ली गए थे। सुकृत खांडेकर भी उनसे से एक थे। उन्होंने कहा कि समय के साथ पत्रकारिता में भी तेजी से बदलाव हो रहा। पत्रकारिता के सामने कई खतरे हैं। तीन साल से प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया का गठन नहीं हो सका है। सुकृत जैसे लोगों का पत्रकारिता में बड़ा योगदान है। स्थिति विपरीत हो तब भी लेखनी जरूर चलती रहनी चाहिए। वरिष्ठ टीवी पत्रकार राजीव खांडेकर ने कहा कि खांडेकर जैसे वरिष्ठ पत्रकारों ने पत्रकारिता को बदलते हुए देखा है। वरिष्ठ पत्रकार योगेश त्रिवेदी ने कहा कि सरकार से सवाल पूछना पत्रकार का कर्तव्य है। समारोह को मंत्रालय व विधानमंडल पत्रकार संघ के अध्यक्ष दिलीप सपाटे व वरिष्ठ पत्रकार राही भिडे व अभय देशपांडे ने भी संबोधित किया।

Created On :   23 July 2026 9:25 PM IST

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