अपेक्षाएं बदली: 28 सिंगल स्क्रीन में से 22 बंद, सिमट कर रह गए 6 - जहां तालियां बजती थीं, वहां अब सन्नाटा

28 सिंगल स्क्रीन में से 22 बंद, सिमट कर रह गए 6 - जहां तालियां बजती थीं, वहां अब सन्नाटा
  • शहर में बदल चुकी है सिनेमाई दुनिया
  • अब सिर्फ यादों में रह गया है सुनहरा दौर
  • निर्माता कलाकारों को लेकर आते थे नागपुर

डिजिटल डेस्क, नागपुर, अभय यादव. शहर में कभी सिंगल सिनेमागृहों का सुनहर दौर हुआ करता था। सिनेमाघर के बाहर टिकट की लंबी कतारें लगती थीं। ब्लैक में टिकट बेचने वालों की आवाजें गूंजती थी। पोस्टर बदलते ही फिल्म की चर्चा शुरू हो जाती थी। हर किसी के सिर चढ़कर फिल्म देखने का जुनून बोलता था। आज ये सिनेमागृह सिर्फ यादों में रह गए हैं। जो उस दौर के सिनेमाघर बच गए हैं, वे सिसकियां ले रहे हैं। वह दौर सिर्फ सिनेमा देखने का नहीं, सिनेमा जीने का दौर था। कभी नए-पुराने मिलाकर शहर में 28 सिंगल स्क्रीन सिनेमाघर थे। अब इनमें से महज 6 सिंगल स्क्रीन सिनेमागृह संचालित हैं। करीब 22 सिनेमाघर बंद हो गए, 15 से अधिक संचालकों ने सिनेमागृहों के संचालन का लाइसेंस जिलाधिकारी कार्यालय के मनोरंजन विभाग में सरेंडर कर दिया है।

जहां तालियां बजती थीं, वहां अब सन्नाटा

आशीर्वाद टाकीज, आनंद टाकीज, लक्ष्मी टाकीज, नटराज टाकीज, कृष्णा टाकीज, विजय टाकीज, सुदामा टाकीज, अलंकार, राजविलास, श्याम टाकीज, रिजंट टाकीज, रिगल टाकीज, चित्रा टाकीज जैसे नाम अब नागपुर के सिनेमाई इतिहास का हिस्सा हैं। इनमें से कई सिनेमागृह लीज पर थे तो कुछ निजी मालकियत की जगह पर संचालित हो रहे थे। कभी इन सिनेमाघरों के बाहर लगी फिल्म की होर्डिंग शहर के लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र होती थी। संगम टाकीज, वेरायटी टाकीज और स्मृति टाकीज ने बदलते समय के साथ खुद को मल्टीप्लेक्स के रूप में ढाल लिया, लेकिन पंचशील, जानकी टाकीज, जयश्री टाकीज सिंगल स्क्रीन की गरिमा को बचाए रखे हैं, यहां दर्शक आज भी फिल्में देखने पहुंचते हैं।

निर्माता कलाकारों को लेकर आते थे नागपुर

वर्ष 1970 और 1980 के दशक में सिंगल स्क्रीन का अपना अलग रुतबा था। फिल्म के निर्माता-निर्देशक कलाकारों के साथ नागपुर आते थे। दर्शकों से मुलाकात होती थी। फिल्म को लेकर उत्साह अलग ही स्तर का था। करीब पांच दशक से सिंगल सिनेमागृहों की दुनिया से जुड़े नागपुर शहर के दत्तात्रय चौधरी, राजूभाई टेकवाडे जैसे कई लोगों ने रील से डिजिटल दौर तक का सफर अपनी आंखों से देखा है। चौधरी बताते हैं कि कभी कर्मचारी को सिनेमाघर छोड़कर कहीं जाने तक की फुर्सत नहीं मिलती थी। इसी दुनिया से जुड़े कुछ लोग आगे चलकर फिल्म वितरक भी बने जिसमें राजूभाई का नाम शुमार है, तो कुछ आज उन्हीं सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों में नौकरी कर रहे हैं।

नौकरी नहीं, जुनून था

इस दुनिया की चमक का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उस दौर में कुछ युवाओं के लिए सिनेमा नौकरी नहीं, जुनून था। राजूभाई बताते हैं कि पुलिस भर्ती का कॉल लेटर आने के बावजूद वे भर्ती में नहीं गए। परिवार से साफ कह दिया था ‘सिनेमा ही सबकुछ है।’ आज वही लोग बदलते दौर को देखकर कहते हैं कि उन्हें अपने फैसले का मलाल नहीं, लेकिन सिनेमा और दर्शक दोनों बदल चुके हैं।

सवाल सिर्फ पर्दे पर फिल्म चलने का नहीं रहा

रील से डिजिटल तक का सफर देखने वाले दत्तात्रय चौधरी कहते हैं कि सिंगल स्क्रीन का भविष्य पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, उसे समय के साथ बदलना होगा। वरना आने वाली पीढ़ी के लिए ये सिनेमागृह नागपुर की तस्वीर बन कर रह जाएंगे।

अलग दर्शक वर्ग है

मल्टीप्लेक्स संस्कृति ने दर्शकों की अपेक्षाएं बदल दी हैं। परिवार के साथ दर्शक अब बेहतर सीट, साफ-सफाई, पार्किंग, एयरकंडीशनिंग, स्वच्छ शौचालय, बेहतर कैंटीन और सुरक्षित माहौल चाहते हैं। सिंगल स्क्रीन में रखरखाव की कमी और असुविधाएं उन्हें पीछे धकेल रही हैं। हालांकि आज भी मध्यम वर्गीय और क्षेत्रीय भाषा की फिल्मों के दर्शक सिंगल स्क्रीन तक पहुंचते हैं। इससे अभी भी कुछ सिंगल स्क्रीन सांसें ले रही हैं।

Created On :   4 Oct 2026 8:43 PM IST

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