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स्क्रीन से दूरी के टिप्स: ज्यादा स्क्रीन टाइम से नींद-व्यवहार और पढ़ाई पर पड़ रहा असर - लत छुड़ाने माता-पिता खुद बनें मिसाल

डिजिटल डेस्क, नागपुर। आज के दौर में मोबाइल बच्चों की जिंदगी का ऐसा हिस्सा बन गया है, जिससे उन्हें दूर करना अभिभावकों के लिए बड़ी चुनौती बन चुका है। खाना हो, पढ़ाई या बच्चा रो रहा हो, कई बार उसे चुप कराने के लिए मोबाइल थमा दिया जाता है। धीरे-धीरे यही आदत जरूरत से बढ़कर निर्भरता में बदल सकती है। ज्यादा स्क्रीन टाइम का असर बच्चों की नींद, व्यवहार, एकाग्रता और पढ़ाई पर पड़ सकता है। ऐसे में सवाल यह है कि बच्चे को मोबाइल से कैसे दूर रखा जाए और उम्र के हिसाब से कितना स्क्रीन टाइम उचित है?
विकासात्मक एवं व्यवहारिक बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. निराली लोहिया ने सुझाव दिया कि बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम तय करते समय उनकी उम्र, नींद, पढ़ाई, खेल और परिवार के साथ बिताए जाने वाले समय को प्राथमिकता देना जरूरी है।
छोटे बच्चों का मस्तिष्क वास्तविक दुनिया के अनुभवों, बातचीत और सामने रहकर किए गए संवाद से तेजी से विकसित होता है। इसलिए 0 से 24 महीने की उम्र में स्क्रीन टाइम से बचना चाहिए।
2 से 5 साल में अधिकतम एक घंटा
2 से 5 वर्ष की उम्र में रोजाना स्क्रीन टाइम अधिकतम एक घंटे तक सीमित रखने की सलाह दी जाती है। बच्चे को जो सामग्री दिखाई जा रही है, वह उसकी उम्र के अनुसार और उपयोगी होनी चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बच्चा अकेले स्क्रीन न देखे। माता-पिता उसके साथ बैठें, उससे सवाल करें और वह क्या देख रहा है, इस पर बातचीत करें। इससे स्क्रीन देखने का समय भी सीखने के अवसर में बदल सकता है।
5 साल से अधिक उम्र में नियम जरूरी
5 वर्ष से अधिक उम्र के बच्चों के लिए स्क्रीन का पूरी तरह इस्तेमाल बंद करना हमेशा व्यावहारिक नहीं होता। ऐसे में परिवार को स्पष्ट नियम बनाने चाहिए। स्क्रीन के कारण बच्चे की नींद, पढ़ाई, खेलकूद और परिवार के साथ बातचीत प्रभावित नहीं होनी चाहिए। स्क्रीन टाइम कितना हो, इसके साथ यह भी देखना जरूरी है कि बच्चा स्क्रीन पर क्या देख रहा है और कब देख रहा है।
सवाल : बच्चा मोबाइल मांगता रहे तो क्या करें?
जवाब : अचानक मोबाइल पूरी तरह छीन लेने के बजाय धीरे-धीरे समय कम करें। बच्चे के लिए दूसरे विकल्प तैयार रखें, जैसे खेल, कहानी, किताब, चित्रकारी, संगीत या परिवार के साथ बातचीत। बच्चे को व्यस्त रखने के लिए हर बार मोबाइल को समाधान न बनाएं।
सवाल : बच्चा खाना मोबाइल देखते हुए ही खाता है, क्या करें?
जवाब : खाने के समय मोबाइल की आदत धीरे-धीरे खत्म करें। परिवार के सभी सदस्य यदि भोजन के दौरान फोन दूर रखें तो बच्चे के लिए नियम अपनाना आसान होगा।
सवाल : पढ़ाई के लिए मोबाइल इस्तेमाल करता है, तो क्या स्क्रीन टाइम माना जाएगा?
जवाब : पढ़ाई और मनोरंजन के स्क्रीन उपयोग में अंतर करना जरूरी है। ऑनलाइन पढ़ाई की जरूरत हो सकती है, लेकिन उसके बाद अनावश्यक वीडियो, गेम या सोशल मीडिया का समय अलग से नियंत्रित किया जाना चाहिए।
सवाल : क्या ज्यादा स्क्रीन टाइम से बच्चे की नींद प्रभावित होती है?
जवाब : ज्यादा स्क्रीन टाइम नींद की समस्या से जुड़ सकता है। इसलिए सोने से पहले स्क्रीन से दूरी बनाना बेहतर है। रात में मोबाइल को बच्चे के बिस्तर के पास रखने के बजाय अलग स्थान पर रखना उपयोगी हो सकता है।
सवाल : मोबाइल कम कराने पर बच्चा चिड़चिड़ा हो जाता है, क्या करें?
जवाब : यह आदत बदलने की प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है। स्क्रीन बंद करने के बाद बच्चे को तुरंत कोई दूसरा आकर्षक विकल्प दें। सबसे जरूरी है कि माता-पिता खुद नियमों का पालन करें और धैर्य रखें।
ज्यादा स्क्रीन टाइम के संकेतों को नजरअंदाज न करें
लगातार ज्यादा स्क्रीन टाइम के कारण बच्चों में नींद की समस्या, व्यवहार में बदलाव, एकाग्रता में कमी और शैक्षणिक प्रदर्शन प्रभावित होने जैसी परेशानियां सामने आ सकती हैं। इसलिए केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि बच्चा कितने घंटे मोबाइल चला रहा है। यह भी देखना जरूरी है कि मोबाइल के कारण वह खेल, पढ़ाई, नींद और परिवार से बातचीत से तो दूर नहीं हो रहा।
बच्चों को मोबाइल से दूर करने का सबसे प्रभावी तरीका
इन टिप्स का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यही है कि, बच्चे देखकर सीखते हैं। यदि माता-पिता हर समय मोबाइल में व्यस्त रहेंगे, तो बच्चे के लिए भी मोबाइल को लगातार देखते रहना स्वाभाविक व्यवहार बन जाएगा। इसलिए परिवार में रोज कुछ समय 'स्क्रीन-मुक्त समय' तय किया जा सकता है। भोजन के दौरान, सोने से पहले और परिवार के साथ बातचीत करते समय मोबाइल को दूर रखें। बच्चे को समय दें, उसकी बातें सुनें और उसके साथ खेलें। क्योंकि बच्चे के लिए माता-पिता का समय और ध्यान किसी भी स्क्रीन से कहीं ज्यादा मूल्यवान है। कुल मिलाकर बात सिर्फ इतनी हा कि मोबाइल बुरा नहीं, लेकिन उसकी आदत का संतुलन बिगड़ना चिंता की बात है। आज की छोटी-सी जागरूकता बच्चों के बेहतर स्वास्थ्य और खुशहाल बचपन की मजबूत नींव बन सकती है।
Created On :   4 Oct 2026 9:25 PM IST
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