डायरेक्ट सीडेड राइस: डीएसआर से पानी की खपत में 35% तक कमी और खेती की लागत में ₹14,000 प्रति हेक्टेयर तक बचत संभव

नई दिल्ली: भारत में जल संसाधनों पर बढ़ते दबाव, श्रम लागत में वृद्धि और कृषि के पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने की आवश्यकता के बीच, फेडरेशन ऑफ सीड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया (FSII) ने मंगलवार को डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR) पर आयोजित एक सम्मेलन में अधिक संसाधन-कुशल खेती पद्धतियों की ओर बढ़ने का आह्वान किया। विशेषज्ञों ने कहा कि DSR एक जलवायु-अनुकूल और संसाधन-कुशल विकल्प के रूप में उभर रहा है, जो प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के साथ-साथ किसानों की आय में सुधार करने की क्षमता रखता है।
FSII ने “सस्टेनेबल और लाभकारी धान उत्पादन के लिए डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR)” विषय पर अपने सम्मेलन का दूसरा संस्करण 10 मार्च 2026 को नई दिल्ली के NASC कॉम्प्लेक्स में आयोजित किया। इस सम्मेलन में नीति-निर्माताओं, वैज्ञानिकों, उद्योग जगत के प्रतिनिधियों और कृषि विशेषज्ञों ने भाग लिया। चर्चा का उद्देश्य भारत के धान उत्पादक क्षेत्रों में DSR को व्यापक स्तर पर अपनाने के अवसरों और चुनौतियों पर विचार करना और इसके प्रसार को तेज करने के लिए एक रणनीतिक रोडमैप तैयार करना था।
भारत में धान की खेती पर अत्यधिक भूजल दोहन, विशेषकर उत्तर-पश्चिमी धान क्षेत्र में, बढ़ता दबाव डाल रहा है फेडरेशन ऑफ सीड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया (FSII) के अध्यक्ष और सवाना सीड्स के सीईओ एवं एमडी अजय राणा ने कहा, “पंजाब में भूजल दोहन वार्षिक पुनर्भरण का लगभग 156% तक पहुँच चुका है, जबकि हरियाणा में यह लगभग 137% है, जो जलभंडारों पर गंभीर दबाव को दर्शाता है। एक किलोग्राम चावल उत्पादन के लिए लगभग 3,000 से 5,000 लीटर पानी की आवश्यकता होती है, जिससे धान सबसे अधिक पानी-खपत वाली फसलों में शामिल है।
साथ ही, भारत में मीठे पानी की कुल निकासी का लगभग 80% कृषि क्षेत्र में होता है। ऐसे में अधिक जल-कुशल धान उत्पादन प्रणालियों की ओर संक्रमण अत्यंत आवश्यक है।" राणा ने कहा कि बीज उद्योग अनुसंधान संस्थानों और किसानों के साथ मिलकर तकनीकी नवाचारों के माध्यम से DSR को अपनाने में सहायता कर रहा है उन्होंने बताया, “DSR में खरपतवार प्रबंधन एक बड़ी चुनौती है। इसे दूर करने के लिए बीज उद्योग ने सार्वजनिक अनुसंधान प्रणाली के साथ मिलकर हर्बिसाइड-सहिष्णु (Herbicide Tolerant) तकनीक विकसित की है, जिससे किसान खरपतवारों को अधिक प्रभावी ढंग से नियंत्रित कर सकते हैं। पिछले खरीफ मौसम में लगभग एक लाख एकड़ क्षेत्र में ड्रिल आधारित बुवाई के साथ हर्बिसाइड-सहिष्णु धान की खेती की गई, जिसमें मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में सबसे अधिक अपनाने की रिपोर्ट मिली।” उन्होंने यह भी बताया कि अंकुरण के दौरान नेमाटोड संक्रमण जैसी उभरती चुनौतियों से निपटने के लिए भी नवाचार किए जा रहे हैं।
Created On :   19 March 2026 5:39 PM IST












