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कंपनी में काम कर रहे हैं 200 बंधुआ मजदूर, श्रीराम सेना ने उठाई आवाज

कंपनी में काम कर रहे हैं 200 बंधुआ मजदूर, श्रीराम सेना ने उठाई आवाज

डिजिटल डेस्क, हिंगना(नागपुर)।  शहर से करीब 14 किमी दूर अमरावती राष्टीय राजमार्ग पर चौदह मैल के समीप संजय इंडस्ट्रीज प्रा. लि. नामक कंपनी में  मजदूरों का शोषण किया जा रहा है।  यह कंपनी जिले में मैंगनीज का काम करती है। जहां सालों से मजदूरों का शोषण किया जा रहा है। यहां काम करने वाले अधिकांश मजदूर ओडिशा तथा मध्यप्रदेश के हैं। इन मजदूरों के लिए कंपनी के भीतर रहने की व्यवस्था की गई है। जरूरी सामान खरीदने के लिए ही बाहर जाने दिया जाता है। मजबूरी के चलते यह मजदूर चुप्पी साधे रहते हैं, लेकिन इन मजदूरों की आवाज उठाने के लिए एक संगठन श्री राम सेना सामने आया है। संगठन ने अपर कामगार आयुक्त से शिकायत की है।  कंपनी मालिक और ठेकेदार की मिलीभगत से यह काम सालों से चल रहा है, सब कुछ मालूम होने के बाद भी संबंधित विभाग चुप्पी साधे होने की जानकारी भी सामने आई है।

क्या कहता है सरकारी नियम
शासकीय नियम के अनुसार शासन निर्धारित वेतन मजदूर को मिलना चाहिए। साथ ही विशेष भत्ता भी दिया जाना चाहिए। महानगर पालिका, नगर पालिका और ग्रामीण क्षेत्र के हिसाब से कुशल, अर्धकुशल और अकुशल मजदूरों का वेतन निश्चित है, लेकिन  संजय इंडस्ट्रीज इन नियमों का कोई पालन नहीं किया जा रहा है। अकुशल मजदूरों को मासिक 8 घंटे काम करने का 9,218 रुपए वेतन मिलना चाहिए। जिसमे महीने की 4 छुट्टियां शामिल है,लेकिन मजदूरों को शासन निर्धारित वेतन न देकर उनका शोषण किया जा रहा है।

30 रु. प्रतिघंटे के हिसाब से मिलता है वेतन
कलमेश्वर तहसील के मौजा चिचभवन में स्थित संजय इंडस्ट्रीज में मैंगनीज का काम करने वाले मजदूरों को 30 रुपए प्रति घंटे के हिसाब से वेतन दिया जाता है, जबकि शासकीय नियमानुसार प्रति घंटे का वेतन 44 रुपए 50 पैसे होना चाहिए, लेकिन कंपनी में मजदूरों को 12 घंटे काम का 300 से 360 रुपए तक वेतन दिया जाता है। सप्ताह की छुट्टी का वेतन नहीं दिया जाता। मजदूरों को प्रतिदिन 8 घंटे काम की मजदूरी 354.50 रुपए दी जानी चाहिए, लेकिन कंपनी में 12 घंटे काम करने के बाद 8 घंटे का ही वेतन दिया जाता है।

नहीं मिलता ओवरटाइम
शासकीय नियमनुसार 8 घंटे से अधिक काम करने पर हर प्रतिघंटे का वेतन डबल दिया जाना चाहिए। लेकिन कंपनी मालिक और ठेकेदार दोनों मिलकर मजदूरों के हक छीन रहे हैं। गौरतलब है कि, इस कंपनी में रोजाना 200 से अधिक मजदूर काम करते हैं, लेकिन 12 घंटे काम कराकर उन्हें केवल 8 घंटे का ही वेतन दिया जा रहा है। 

हर रोज 1 मजदूर के डकार लेते हैं 356 रुपए
शासन निर्धारित वेतन न देकर अतिरिक्त 4 घंटे काम करने के 356 रुपए कंपनी मालिक और ठेकेदार की जेब में जा रहे हैं। उल्लेखनीय है कि, रोजाना 200 मजदूरों के हिसाब से 71,200 रुपए प्रतिदिन मजदूरों के अधिक काम का वेतन इन दोनों की जेब में जा रहा है। जो महीने का 21 लाख 36 हजार रुपए होता है।  

200 एकड़ में फैली है कंपनी
यह कंपनी करीब 200 एकड़ से अधिक क्षेत्र में फैली है। यहां महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, ओडिशा आदि क्षेत्र से मैंगनीज का पत्थर लाकर उसका पाउडर बनाकर लोहा आदि बनाने वाली कंपनियों में बेचा जाता है। ज्यादा ग्रेड का मैंगनीज का पत्थर कम ग्रेड का दिखाकर खरीदता जाता है। साथ ही बगैर टीपी का भी माल लाकर उसका पाउडर बनाकर बेचा जाता है। ऐसी जानकारी सूत्रों से मिली है। जानकारी के अनुसार संजय इंडस्ट्रीज में दो कंपनियों के नाम से काम चलता है। एक संजय इंडस्ट्रीज और दूसरा नागपुर पुरोलसाइट प्रा. लि. है।

हमेशा मिलती है शिकायत
संजय इडस्ट्रीज के बारे में शोषण किए जाने की मौखिक शिकायत मिलती रहती है। नियमानुसार मजदूरों को निर्धारित वेतन, पीएफ आदि सुविधा मिलनी चाहिए। यह विभाग हमारे कार्यक्षेत्र में नहीं आता।  -नंदू राऊत, प्रशासक, ग्रापं, निमजी, तहसील कलमेश्वर

सालों से हो रहा शोषण
संजय इंडस्ट्रीज में सालों से मजदूरों का शोषण हो रहा है। शिकायत के बावजूद कोई कारवाई नहीं की जाती। मजदूरों से अधिक काम लेकर न के बराबर वेतन दिया जाता है। खुलेआम सरकारी नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।
-संदीप भोयर, सामाजिक कार्यकर्ता, िनमजी

स्थानीय लोगों को नहीं मिलता रोजगार
इस कंपनी में स्थानीय लोगों को रोजगार नहीं दिया जाता। ओडिशा, मध्यप्रदेश के मजदूरों से बंधुआ मजदूरों की तरह काम करवाया जाता है। स्थानीय लोगों को काम दिया तो भीतर चल रहे गलत कामों की पोल खुल सकती है। -भगवान भोयर, पूर्व सरपंच, ग्रापं, िनमजी

मजदूरों के लिए करेंगे तीव्र आंदोलन
संजय इड्रस्टीज और नागपुर पुरोलसाइट प्रा.लि. कंपनी में काम करने वाले 200 से अधिक मजदूरों का सालों से शोषण किए जाने की शिकायत हमें  मजदूरों से मिली है। -कमलेश सिंह ठाकुर, िजलाध्यक्ष, श्री राम सेना

आपको इससे क्या लेना-देना है
इस मामले से आपका क्या लेना-देना है। यह हमारा निजी मामला है। इसमें आपको या किसी और को नहीं पड़ना चाहिए।
-आदित्य जयनारायन, संचालक, संजय इडस्ट्रीज एवं नागपुर पुरोलसाइट प्रा.लि.

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डिजिटल डेस्क, लखनऊ। उत्तरप्रदेश में अगले साल यानि कि 2022 में विधानसभा चुनाव होने हैं। इस चुनाव को लगातार दिलचस्प बना रहे हैं सपा प्रमुख अखिलेश यादव और उनके बाद बसपा सुप्रीमो मायावती। अखिलेश यादव की सक्रियता यूपी में देखने लायक है। बहन मायावती भी अब मुख्य चुनावी धारा में वापसी के लिए बेचैन नजर आने लगी हैं। पर मौजूदा हालात को देखते हुए यही कयास हैं कि बीजेपी की ही वापसी होगी। और संभवतः योगी आदित्यनाथ ही बीजेपी का चेहरा भी होंगे। इस चुनाव से पहले बीजेपी राम मंदिर मुद्दे को भी खत्म कर चुकी है। जनसंख्या नियंत्रण कानून पर भी चर्चा शुरू हो चुकी है। उसके बावजूद बीजेपी अपनी जीत को लेकर आश्वस्त नहीं बताई जाती। उसकी कुछ ये बड़ी वजह नजर आती हैं-

पूर्वांचल में पुराने साथियों का छूटना

2017 के विधानसभा चुनाव में पूर्वांचल फतह करने के लिए बीजेपी एक नए फॉर्मूले के साथ मैदान में उतरी थी। बीजेपी ने 2017 के विधानसभा चुनाव में उन छोटे राजनीतिक दलों के साथ में गठबंधन किया, जिनका अपना जातिगत वोटबैंक है। इसी फॉर्मूले का फायदा बीजेपी को मिला और बीजेपी को 2017 के विधानसभा चुनाव में 28 जिलों की 170 सीटों में से 115 सीटें मिली थीं। यह नंबर सच में करिश्माई थे लेकिन इस आंकड़े को अकेले बीजेपी ने अपने दम पर हासिल नहीं किया था। उसकी मदद इन छोटे राजनीतिक दलों से जुड़े उनके जातिगत वोटबैंक ने की थी। आइये समझते है पूर्वांचल में इन छोटे राजनीतिक दलों की ताकत जो किसी का भी खेल बना और बिगाड़ सकते हैं। 

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सपा का गठबंधन  

दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंक कर पीता है कुछ ऐसा ही हाल अखिलेश यादव का है। 2019 में बसपा का साथ लेकर सपा को जो नुकसान हुआ था। उसके बाद अब अखिलेश 2022 के लिए छोटे छोटे दलों के साथ गठबंधन कर रहे हैं। सपा ने राष्ट्रीय लोकदल, संजय चौहान की जनतावादी पार्टी और केशव मौर्या की महान दल के साथ में गठबंधन कर लिया है। 

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बनारस, मथुरा, अयोध्या में सपा की बल्ले बल्ले

जिला पंचायत चुनाव में भले ही बीजेपी ने बाजी मारी हो। पर कुछ नतीजे बीजेपी के लिए भी चौंकाने वाले थे। क्योंकि पार्टी को उन जगहों पर झटका लगा था जहां बिलकुल उम्मीद नहीं थी। अयोध्या में मंदिर मसला हल होने का फायदा जिला पंचायत चुनाव के नतीजों में नजर नहीं आया। यहां समाजवादी पार्टी का दबदबा दिखाई दिया। कमोबेश यही नतीजे बनारस और मथुरा में नजर आए। बता दें बनारस पीएम नरेंद्र मोदी की लोकसभा सीट है। 

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किसान आंदोलन

देश में किसान पिछले 8 महीनों से आंदोलन कर रहे हैं। इस आंदोलन का असर उत्तर प्रदेश की सियासत पर देखने को मिल रहा है। किसान आंदोलन का सबसे अधिक असर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश को जाट लैंड कहा जाता है, यहां पर एक कहावत कही जाती है कि 'जिसका जाट उसके ठाठ'। इसकी एक वजह यह है कि चौधराहट करने वाले इस समाज के निर्णय से कई जातियों का रुख तय होता है। किसान आंदोलन से यही जाट बीजेपी से खिसकते नजर आ रहे हैं।

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साल 2017 में बीजेपी ने पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की तो राजपूत समुदाय से आने वाले योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने। यही वजह है कि योगी सरकार में राजपूत बनाम ब्राह्मण के विपक्ष के नैरेटिव के मद्देनजर ब्राह्मण वोटों का अपने पाले में जोड़ने के लिए बसपा से लेकर सपा और कांग्रेस तक सक्रिय है।  विकास दुबे और उसके साथि‍यों के एनकाउंटर के बाद बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने उत्तर प्रदेश में योगी अदित्यनाथ की सरकार में  ब्राह्मणों पर अत्याचार बढ़ने का आरोप लगाया था। ब्राह्मण बुद्धिजीवियों का आरोप है कि एकतरफा समर्थन के बावजूद सरकार में ब्राह्मणों को राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से किनारे कर दिया गया है। 

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मोदी और योगी के बीच सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। उत्तर प्रदेश की राजनीतिक गलियारों में मोदी बनाम योगी को लेकर काफी चर्चाएं हैं। इन चर्चाओं ने ऐसे ही जन्म नहीं लिया है, इनके पीछे कुछ ठोस वजह हैं। हालांकि बीजेपी ने हर बार यही जाहिर किया है कि पार्टी के अंदर ऐसी कोई कलह नहीं है।

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ओलंपिक में जिमनास्टिक खिलाड़ियों ने पहली बार पहने ऐसे कपड़े, जिसने देखा रह गए हैरान

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डिजिटल डेस्क, टोक्यो। टोक्यो ओलंपिक में पूरी दुनिया से आए हुए खिलाड़ी अपनी प्रतिभा दिखा रहे हैं। खेल में अपनी प्रतिभा दिखाने के अलावा जर्मन की महिला जिमनास्टिक्स ने फ्रीडम ऑफ चॉइस यानी अपने मन के कपड़े पहनने की आजादी को अपने खेल के जरिए प्रमोट करने का फैसला किया है, जिससे उनकी हर तरफ चर्चा हो रही है। 

Germany Women's Gymnastics Team Wear Unitards at Olympics | POPSUGAR Fitness

जर्मनी की महिला जिमनास्ट रविवार को हुए टोक्यो ओलंपिक मुकाबले में फुल बॉडी सूट पहने नजर आई। खिलाड़ियों ने बताया कि इस सूट को फ्रीडम ऑफ चॉइस यानी अपनी पसंद के कपड़े पहनने की आजादी को बढ़ावा देने साथ ही महिलाओं को प्रोत्साहित करने के लिए डिजाइन किया गया है जिसे पहनकर महिला खिलाड़ी आरामदायक महसूस कर सकें।

Germany's gymnasts wear body-covering unitards, rejecting 'sexualization' of sport - CNN 
 

जर्मनी की 4 जिमनास्ट जिनके नाम है पॉलीन शेफर-बेट्ज, सारा वॉस, एलिजाबेथ सेट्ज और किम बुई लाल और सफेद रंग के इस यूनिटार्ड सूट में नजर आई जो लियोटार्ड और लेगिंग्स को मिलाकर बनाया गया था। खिलाड़ी इसी को पहन कर मैदान में उतरीं थी। 

German gymnastics team, tired of 'sexualisation,' wears unitards | Deccan Herald
 

जर्मनी की टीम ने अपनी ट्रेनिंग में भी इसी तरह के कपड़े पहने हुए थे और अपने कई इंटरव्यूज में खिलाड़ियों ने कहा था कि इस साल फाइनल कॉम्पटीशन में भी वो फ्रीडम ऑफ चॉइस को प्रमोट करने के लिए इसी तरह के कपड़े पहनेंगी। खिलाड़ी सारा वॉस ने द जापान टाइम्स को बताया था यूनिटार्ड को फाइनल करने से पहले उन्होंने इस पर चर्चा भी की थी। सारा ने ये भी कहा कि जैसे जैसे एक महिला बड़ी होती जाती है, वैसे ही उसे अपने शरीर के साथ सहज होने में काफी मुश्किल होती हैं। हम ऐसा कुछ करना चाहते थे जिसमें हम अच्छे भी दिखे और सहज भी महसूस करें। चाहे वो कोई लॉन्ग यूनिटार्ड हो या फिर शॉर्ट। 

Germany Women's Gymnastics Team Wear Unitards at Olympics | POPSUGAR Fitness
 

सारा ने यह भी बताया कि उनकी टीम ने इससे पहले यूरोपीय चैंपियनशिप में भी इसी तरह का फुल बॉडी सूट पहना था और इसका उद्देश्य सेक्सुलाइजेशन को कम करना है। हम लोगों के लिए एक रोल मॉडल बनना चाहते थे जिससे वो हमे फॉलो कर सकें। जर्मन के खिलाड़ियों की लोग काफी प्रशंसा भी कर रहे हैं। 


ओलंपिक प्रतियोगिताओं में जिमनास्ट महिलाओं को फुल या हाफ बाजू के पारंपरिक लियोटार्ड ही पहनना होता है साथ ही अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में फुल कपड़े पहनने की अनुमति तो है लेकिन किसी भी महिला जिमनास्ट ने इस तरह के कपड़े नहीं पहने थे। यह पहली बार था जब जर्मन खिलाड़ी महिलाओं ने इस तरह के कपड़े पहने थे। 
बीते कुछ सालों में खेल प्रतियोगिताओं में महिलाओं के शारीरिक शोषण के बढ़ते मामलों को देख महिला खिलाड़ियो की चिंता बढ़ती जा रही है अब एथलीटों की सुरक्षा को देखते हुए नए सेफ्टी प्रोटोकॉल बनाए जा रहे हैं।