लुकाछिपी: घास के पीछे छुप रहे बाघ, नहीं हो रहा सैलानियों को दीदार

November 6th, 2021

डिजिटल डेस्क, नागपुर। जंगल सफारी घूमने के शौकीनों को बाघ के दर्शन दुर्लभ हो गए हैं। किसी को बाघ दिख गया तो वह उसकी किस्मत। यह सब इसलिए हो रहा है, क्योंकि जंगलों में बारिश के बाद घास बहुत ज्यादा बढ़ गई है। घास के पीछे वन्यजीव आसानी से छुप रहे हैं। खासकर बाघ बहुत कम दिखाई दे रहे हैं। यही कारण है कि पिछले कुछ दिनों से पेंच, उमरेड करांडला आदि  अभयारण्य में भ्रमण के लिए आने वाले सैलानियों की संख्या कम हो रही है। हालांकि अधिकारियों का दावा है कि प्रतिदिन सैलानियों को बाघ देखने को मिल रहे हैं। शहर से दूर जंगल क्षेत्र में वन्यजीवों के बीच दिन बिताना किसे अच्छा नहीं लगता है। इंसान व वन्यजीवों का आमना-सामना होना खतरनाक हालत पैदा करता है, लेकिन जंगल सफारी में यही हालात रोमांच पैदा करता है। विदर्भ में गोरेवाड़ा, उमरेड करांडला, पेंच टाइगर रिजर्व, मेलघाट,   ताड़ोबा अंधारी, नवेगांव नागझिरा, टिपेश्वर, बोर व्याघ्र प्रकल्प आदि जंगल सफारियां हैं, जहां हिरण से लेकर बाघ के दर्शन होते हैं। जिप्सी में बैठकर सैलानी बाघ देखने का लुत्फ उठाते हैं, लेकिन जंगलों में बढ़ी घास के कारण इनके दर्शन दुर्लभ हो रहे हैं। 

महाराष्ट्र का पेंच अभयारण्य 700 से ज्यादा वर्ग किमी. में फैला है। यहां दो रेंज है जिसमें 6 से ज्यादा बीट हैं। इसमें पवनी यूनी कंट्रोल, देवलापार, ईस्ट पेंच, चोरबाहुली, सालेघाट आदि बीट शामिल हैं। हर साल यहां बाघों की संख्या बढ़ रही है। फिलहाल यहां 50 से ज्यादा बाघ हैं, लेकिन इन दिनों बाघों की साइडिंग नहीं होने की जानकारी सूत्रों ने दी है। उनका कहना है कि दिनभर चल रही सफारियों के बाद भी कभी-कभार बाघ देखने को मिलते हैं। इसके कारण धीरे-धीरे सैलानियों की संख्या कम होती जा रही है। 

कोरोना के बाद वन विभाग की पीआरटी टीम तैयार

वन क्षेत्र लगातार कम होने से वन्यजीव गांव की दहलीज तक पहुंच रहे हैं। कई बार बुनियादी सुविधाओं का अभाव होने से इंसान वन परिक्षेत्र में लकड़ी आदि के लिए घुसपैठ कर रहा है, जिससे आए दिन मानव वन्यजीवों में संघर्ष की स्थिति पैदा हो रही है। इससे कई बार वन्यजीव ग्राम निवासियों की मौत के लिए जिम्मेदार रहते हैं। परिणामस्वरूप गांव में रहने वालों के लिए इन वन्यजीवों के प्रति लगाव नहीं रहता है। संघर्ष की स्थिति में कई बार लोग वन्यजीवों को मारने में ही समझदारी समझते हैं। यह स्थिति पूरे राज्य में है। 

नागपुर विभाग में वन विभाग ने वर्ष 2018 में पीआरटी टीम तैयार की थी, जो नागपुर के अलावा यवतमाल, पवनी और भंडारा जिले में सक्रिय थी। इस टीम का काम यह था कि गांव गांव जाकर यहां रहनेवाले 25 हजार परिवार को प्रशिक्षण देना था। ताकि मानव-वन्यजीव का संघर्ष पूरी तरह से खत्म करे। लेकिन वर्ष पहले तो इस टीम के माध्यम से अच्छा कार्य भी शुरू हुआ था। 

2020 से टीम को गांवों में नहीं भेजा

कोरोना के कारण वर्ष 2020 से इस टीम को गांव-गांव नहीं भेजा गया। कोरोना संक्रमण के डर से टीम सक्रिय नहीं थी। ऐसे में वन्यजीवों द्वारा गांव की सीमा को पार करने की घटनाएं लगातार होने लगीं। गांववासियों को इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ा। उनके मवेशी भी बाघ और तेंदुए के शिकार हुए। हाल ही में नागपुर विभाग में ऐसी कई घटनाएं हुई हैं। इसे देखते हुए और कोरोना संक्रमण कम होने के कारण फिर से टीम को सक्रिय किया गया है।  नागपुर वन विभाग (प्रादेशिक) मेंे दक्षिण उमरेड, उत्तर उमरेड, नरखेड, कोंढाली, काटोल, हिंगना, देवलापार, पारशिवनी, रामटेक, पवनी, कलमेश्वर, सेमिनरी हिल्स, बुटीबोरी, खापा आदि इलाके आते हैं, जिनके आस-पास बड़ी संख्या में गांव बने हैं। जिन गांवों में आए दिन वन्यजीव-मानव संघर्ष की स्थिति बनती रहती हैं, ऐसे 523 गांवों को चुनकर वन विभाग अचानक आमना-सामना होने पर वन्यजीवों से कैसे बचे इस संबंध में टीम प्रशिक्षण देगी।

 

 

 

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