Shahdol news: पीढिय़ों से चली आ रही आस्था का केंद्र बूढ़ी माई मंदिर

पीढिय़ों से चली आ रही आस्था का केंद्र बूढ़ी माई मंदिर
कलचुरी काल से जुड़ा है प्राचीन बूढ़ी माई मंदिर

डिजिटल न्यूज़ शहडोल

शहडोल शहर की सीमा से लगे उमरिया जिले की सीमा क्षेत्र में स्थित मां बूढ़ी माई देवी मंदिर नवरात्र के दिनों में आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। सुबह से ही मंदिर में दर्शन-पूजन के लिए श्रद्धालुओं के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो जाता है। नौ दिनों तक चलने वाले नवरात्र उत्सव में विशेष पूजा-अर्चना और देवी के दर्शन के लिए आसपास के क्षेत्रों से भी श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। कलचुरी काल से जुड़ा यह प्राचीन मंदिर धार्मिक आस्था के साथ शहडोल अंचल की सांस्कृतिक विरासत का भी हिस्सा है। कलचुरी कालीन मंदिर में मां के प्रति लोगों की अगाध आस्था पूरे साल नजर आती है। मंदिर को लेकर कई लोक मान्यताएं पीढिय़ों से लोगों के बीच चली आ रही हैं। एक किवदंती यह भी है कि किसी निराश और दुखी व्यक्ति को मातारानी ने यहां बूढ़ी मां के रूप में दर्शन दिए, जिसके बाद यह स्थान बूढ़ी देवी के नाम से प्रसिद्ध हुआ। पांडवों द्वारा यहां पूजा किए जाने की मान्यता भी स्थानीय धार्मिक परंपरा का हिस्सा है। इन कथाओं का उल्लेख मान्यता और किवदंती के रूप में ही किया जाता है। नवरात्र पर्व में मंदिर परिसर में बढ़ती श्रद्धालुओं की आवाजाही इस आस्था की निरंतरता को सामने लाती है। बुजुर्गों से लेकर नई पीढ़ी तक परिवार के साथ मंदिर पहुंचकर पूजा-अर्चना करना यहां की परंपरा का हिस्सा है। समय बदला, शहर का विस्तार हुआ, लेकिन बूढ़ी माई के प्रति लोगों का विश्वास अब भी उसी तरह कायम है। यही वजह है कि बूढ़ी माई का यह धाम शहडोल की धार्मिक पहचान में आज भी अपनी अलग जगह बनाए हुए है। प्रतिदिन भंडारा, मुंडन से लेकर नामकरण- लोगों की आस्था के इस केंद्र में नवरात्र पर्व पर भंडारे का आयोजन किया जाता है। इसके साथ ही आसपास के लोग बच्चों का मुंडन व नामकरण संस्कार भी मंदिर परिसर में ही करते हैं।

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