दैनिक भास्कर हिंदी: संत स्वामी रामानन्दाचार्य जयंती पर जानें कुछ विशेष

January 14th, 2019

डिजिटल डेस्क । महान संत स्वामी रामानन्दाचार्य जी जयंती 27 जनवरी 2019 को है। उनके जन्म दिन को लेकर कई तरह की भ्रंतियां प्रचलित है, लेकिन अधिकांश जानकार मानते हैं कि स्वामीजी का जन्म 1300 ईस्वी में हुआ था। स्वामी रामानंद का जन्म प्रयागराज (इलाहाबाद) में एक ब्राह्मण परिवार में माघ कृष्ण सप्तमी को हुआ था। उनकी माता का नाम सुशीला देवी और पिता का नाम पुण्य सदन शर्मा था। 

 

स्वामी रामानंद को मध्यकालीन भक्ति आंदोलन का महान संत माना जाता है। उन्होंने रामभक्ति की धारा को समाज के निचले तबके तक पहुंचाया। ये ऐसे आचार्य हुए जिन्होंने उत्तर भारत में भक्ति का प्रचार किया। उनके बारे में प्रचलित कहावत है कि - द्वविड़ भक्ति उपजौ-लायो रामानंद। यानि उत्तर भारत में भक्ति का प्रचार करने का श्रेय स्वामी रामानंद को जाता है। उन्होंने तत्कालीन समाज में व्याप्त कुरीतियों जैसे छुआछूत, ऊंच-नीच और जात-पात का विरोध किया।

 

आरंभिक काल में हीं उन्होंने कई प्रकार के अलौकिक चमत्कार दिखाने शुरू कर दिये थे। धार्मिक विचारों वाले उनके माता-पिता ने बालक रामानंद को शिक्षा के लिए काशी के स्वामी राधवानंदजी के पास श्रीमठ भेज दिया। पंचगंगा घाट स्थित श्रीमठ में रहते हुए उन्होंने कठोर साधना की। संत कबीर और संत रविदास जैसे महान भक्त कवियों के गुरु स्वामी रामानंदाचार्य जी ने न सिर्फ भक्ति को विशिष्ठ लोगों के चंगुल से मुक्त कराकर आम लोगों तक पहुंचाया, उन्होंने उस समय समाज में व्याप्त अन्य बुराइयों जैसे छुआछूत, ऊंच-नीच आदि का भी विरोध किया।

 

स्वामी रामानंद ने भक्ति और ग्रंथों के अध्ययन को सबके लिए सुलभ कराया। कबीर और संत रविदास के साथ-साथ अनंतानंद, भवानंद, पीपा, सेन, धन्ना, नाभा दास, नरहर्यानंद, सुखानंद, सुरसरि आदि भी उनके शिष्य थे। उन्होंने आपसी कटुता और वैमनस्य को दूर करते हुए कहा -जात-पात पूछे नहिं कोई-हरि को भजै सो हरि का होई। यहां तक कि उन्होंने महिलाओं को भी समान स्थान दिया। उन्होंने रामानंद संप्रदाय की स्थापना की। उन्होंने भक्ति के प्रचार में संस्कृत की जगह लोकभाषा को प्राथमिकता दी और कई पुस्तकों की रचना की।

 

जिसमे वैष्णवमताब्ज भाष्कर उनकी प्रमुख रचना है। स्वामी रामानंद ने भक्ति मार्ग का प्रचार करने के लिए देश भर की यात्राएं की। वे पुरी औऱ दक्षिण भारत के कई धर्मस्थानों पर गये और रामभक्ति का प्रचार किया। पहले उन्हें स्वामी रामनुज का अनुयाय़ी माना जाता था लेकिन सम्प्रदाय का आचार्य होने के बाद भी उन्होंने अपनी उपासना पद्धति में ऱाम और सीता को वरीयता दी। उन्हें हीं अपना इस्टदेव बनाया। उनकी पवित्र चरण पादुकायें आज भी श्रीमठ, काशी में सुरक्षित हैं, जो करोड़ों रामानंदियों की आस्था का केन्द्र है। वैष्णव भक्ति के महान संतों की उसी श्रेष्ठ परंपरा में आज से लगभग सात सौ नौ वर्ष पूर्व स्वामी रामानंद का प्रादुर्भाव हुआ। उन्होंने श्री सीताजी द्वारा पृथ्वी पर प्रवर्तित विशिष्टाद्वैत (राममय जगत की भावधारा) सिद्धांत तथा रामभक्ति की धारा को मध्यकाल में अनुपम तीव्रता प्रदान की। 


स्वामीजी ने मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम को आदर्श मानकर सरल रामभक्ति मार्ग का निदर्शन किया। उनकी शिष्य मंडली में जहां एक ओर कबीरदास, रैदास, सेननाई और पीपानरेश जैसे जाति-पाति, छुआछूत, वैदिक कर्मकांड, मूर्तिपूजा के विरोधी निर्गुणवादी संत थे तो दूसरे पक्ष में अवतारवाद के पूर्ण समर्थक अर्चावतार मानकर मूर्तिपूजा करने वाले स्वामी अनंतानंद, भावानंद, सुरसुरानंद, नरहर्यानंद जैसे सगुणोपासक आचार्य भक्त भी थे। उसी परंपरा में कृष्णदत्त पयोहारी जैसा तेजस्वी साधक और गोस्वामी तुलसीदास जैसा विश्व विश्रुत महाकवि भी उत्पन्न हुआ। आचार्य रामानंद के बारे में प्रसिद्ध है कि तारक राममंत्र का उपदेश उन्होंने पेड़ पर चढ़कर दिया था ताकि सब जाति के लोगों के कान में पड़े और अधिक से अधिक लोगों का कल्याण हो सके। 

 

उन्होंने नारा दिया था-


जाति-पाति पूछे न कोई। हरि को भजै सो हरि का होई॥

आचार्यपाद ने बिखरते और नीचे गिरते हुए समाज को मजबूत बनाने की भावना से भक्ति मार्ग में जाति-पांति के भेद को व्यर्थ बताया और कहा कि भगवान की शरणागति का मार्ग सबके लिए समान रूप से खुला है।


||सर्व प्रपत्तिधरकारिणो मताः||

कहकर उन्होंने किसी भी जाति-वरण के व्यक्ति को राममंत्र देने में संकोच नहीं किया। चर्मकार जाति में जन्मे रैदास और जुलाहे के घर पले-बढ़े कबीरदास इसके अनुपम उदाहरण हैं।