दैनिक भास्कर हिंदी: क्या है सोम प्रदोष व्रत का महत्व और पूजा विधि

June 6th, 2018

डिजिटल डेस्क, भोपाल। अधिकमास सोम प्रदोष व्रत 11 जून और 25 जून 2018 को है। प्रदोष का व्रत करने वाला मनुष्य सदा सुखी रहता है। उसके सम्पूर्ण पापों का नाश इस व्रत से हो जाता है। इस व्रत को करने से सुहागन नारियों का सुहाग सदा अटल रहता है, बंदी कारागार से छूट जाता है। जो स्त्री पुरुष जिस कामना को लेकर इस व्रत को करते हैं, उनकी सभी कामनाएं कैलाशपति शंकर जी पूरी करते हैं। सूत जी कहते हैं- त्रयोदशी व्रत करने वाले को सौ गऊ दान का फल प्राप्त होता है। इस व्रत को जो विधि-विधान और तन, मन, धन से करता है उसके सभी दु:ख दूर हो जाते हैं।

 


पूजन सामग्री 

धूप, दीप, घी, सफेद पुष्प, सफेद फूलों की माला, आंकड़े का फूल, सफेद मिठाइयां, सफेद चंदन, सफेद वस्त्र, जल से भरा हुआ कलश, कपूर, आरती की थाली, बेल-पत्र, धतुरा, भांग, हवन सामग्री, आम की लकड़ी।

सोम प्रदोष व्रत की विधि

प्रदोष व्रत के दिन व्रत करने वाले को प्रात:काल उठकर नित्य कर्म से निवृत होकर स्नान कर शिव जी का पूजन करना चाहिए। पूरे दिन मन ही मन “ऊँ नम: शिवाय” का जप करें। पूरे दिन निराहार रहें। प्रदोष काल में अर्थात सूर्यास्त से तीन घड़ी पूर्व, शिव जी का पूजन करना चाहिए। प्रदोष व्रत की पूजा शाम 4:30 बजे से लेकर शाम 7:00 बजे के बीच की जाती है। व्रत करने वाले शाम को फिर से स्नान कर स्वच्छ श्वेत वस्त्र धारण कर लें। पूजा स्थल अथवा पूजा गृह को शुद्ध कर लें। चाहे तो शिव मंदिर में भी जाकर पूजा कर सकते हैं। पांच रंगों से रंगोली बनाकर मंडप तैयार करें। पूजन की सभी सामग्री एकत्रित कर लें। कलश अथवा लोटे में शुद्ध जल भर लें। कुश के आसन पर बैठ कर शिव जी की पूजा विधि-विधान से करें। “ऊँ नम: शिवाय” कहते हुए शिव जी को जल अर्पित करें। इसके बाद दोनों हाथ जो‌ड़कर शिव जी का ध्यान करें। ध्यान का स्वरूप- करोड़ों चंद्रमा के समान कांतिवान, त्रिनेत्रधारी, मस्तक पर चंद्रमा का आभूषण धारण करने वाले पिंगलवर्ण के जटाजूटधारी, नीले कण्ठ तथा अनेक रुद्राक्ष मालाओं से सुशोभित, वरदहस्त, त्रिशूलधारी, नागों के कुण्डल पहने, व्याघ्र चर्म धारण किये हुए, रत्नजड़ित सिंहासन पर विराजमान शिव जी हमारे सारे कष्टों को दूर कर सुख समृद्धि प्रदान करें।

ध्यान के बाद, सोम प्रदोष व्रत की कथा सुनें अथवा सुनाएं। कथा समाप्ति के बाद हवन सामग्री मिलाकर 11, 21 या 108 बार “ऊँ ह्रीं क्लीं नम: शिवाय स्वाहा” मंत्र से आहुति दें। उसके बाद शिव जी की आरती करें। उपस्थित जनों को आरती दें। सभी को प्रसाद वितरित करें । उसके बाद भोजन करें। भोजन में केवल मीठी सामग्रियों का उपयोग करें।

 


सोम प्रदोष व्रत कथा

सोम प्रदोष व्रत का महात्म्य बताने के लिए स्कंद पुराण में एक कथा कही गई है। इसके अनुसार, एक ब्राह्मणी अपने पति की मृत्यु के पश्चात भिक्षा मांगकर गुजारा करती थी। उसके साथ दो लड़के भी थे। एक उसका अपना पुत्र शुचिव्रत और दूसरा धर्मगुप्त नामक अनाथ बालक, जिसे वह पाल रही थी।

धर्मगुप्त वास्तव में युद्ध में खेल रहे विदर्भ के राजा का पुत्र, अर्थात राजकुमार था। एक दिन ब्राह्मणी की भेंट शाण्डिल्य मुनि से हुई। शाण्डिल्य मुनि ने उसे प्रदोष व्रत की महिमा बताई। उनसे व्रत की विधि जानने के पश्चात वह दोनों बालकों केसाथ पूर्ण आस्था के साथ प्रदोष व्रत करने लगी। चार माह बाद एक दिन शुचिव्रत नदी में स्नान करने गया। वहां उसे धन से भरा एक घड़ा मिला, जिसे लेकर वह अपनी मां के पास गया। मां धन से भरे घड़े को देख खुश हो गई और कहा कि इसे अपने भाई धर्मगुप्त के साथ आधा-आधा बांट लो। मगर धर्मगुप्त ने इस धन में हिस्सेदारी से मना करते हुए कहा, 'मैं किसी अन्य के भाग्य का भागी नहीं हो सकता। प्रत्येक व्यक्ति स्वयं के कर्म का फल भोगता है।'

एक वर्ष बीत गया। इसी समय ब्राह्मणी तथा दोनों बालक नियमित रूप से प्रदोष व्रत करते रहे। एक दिन शुचिव्रत और धर्मगुप्त वन में भ्रमण करने गए। एक जगह उन्होंने देखा कि अनेक गंधर्व कन्याएं खेल रही थीं। शुचिव्रत वहीं रुक गया और धर्मगुप्त से बोला, 'हमें इससे आगे नहीं जाना चाहिए। ये गंधर्व कन्याएं हैं, ये किसी को भी अपनी ओर आकर्षित कर सकती हैं।'

मगर धर्मगुप्त बिल्कुल निडर होकर आगे बढ़ता गया। जब मुख्य गंधर्व कन्या ने राजकुमार धर्मगुप्त को देखा, तो वह उसके प्रति आकर्षित हो गई। उसने अपनी सखियों को फूल चुनने के लिए भेज दिया और धर्मगुप्त के पास आने की प्रतीक्षा करने लगी।

उसे अकेला देख धर्मगुप्त उसके पास गया और उससे बातचीत शुरू की। उसने बताया कि मैं विदर्भ देश का राजकुमार हूं। मेरे माता-पिता अब इस संसार में नहीं रहे और शत्रु ने राज्य पर कब्जा कर लिया है। कन्या ने अपना परिचय देते हुए बताया कि मैं विद्रविक गंधर्व की पुत्री अंशुमति हूं तथा गायन में प्रवीण हूं।

उसने यह भी कहा कि मैं आपसे विवाह करना चाहती हूं। इतना कहकर उसने अपनी मोतियों की माला निकालकर धर्मगुप्त को पहना दी। धर्मगुप्त ने पूछा, 'तुम राजपाट गंवा चुके राजकुमार के साथ कैसे रह पाओगी? और अपने माता-पिता की अनुमति के बिना तुम मेरे साथ कैसे आ सकती हो?'

इस पर अंशुमति ने उत्तर दिया, 'चाहे जो हो जाए, मैं वही करूंगी, जो मैं चाहूंगी। परसों प्रात: यहां आकर मुझसे मिलो।' इतना कहकर वह वहां से चली गई। धर्मगुप्त ने लौटकर शुचिव्रत तथा मां को सारी बात बताई। दोनों बेहद प्रसन्न हुए। दो दिन बाद धर्मगुप्त पुन: उसी वन में गया। उसने पाया कि अंशुमति वहां अपने पिता के साथ उसकी प्रतीक्षा कर रही है। गंधर्व ने धर्मगुप्त से कहा, 'मैं कैलाशपुरी गया था। वहां शिवजी और पार्वतीजी ने मुझे बुलाकर कहा कि धर्मगुप्त नामक राजकुमार राज्य विहीन होकर भटक रहा है, जाओ और राज्य पुन: प्राप्त करने में उसकी सहायता करो।

अत: मैं उनकी आज्ञानुसार अपनी पुत्री अंशुमति का हाथ तुम्हारे हाथ में दे रहा हूं और राज्य प्राप्त करने में भी तुम्हारी सहायता करूंगा। मेरी कन्या 10 हजार वर्ष तक तुम्हारे साथ रहेगी और जब तुम शिवलोक में आओगे, तब भी वह इसी काया में तुम्हारे साथ रहेगी।'

धर्मगुप्त और अंशुमति का विवाह हो गया। अंशुमति के पिता ने अपनी गंधर्व सेना भी उसे दे दी। सेना की सहायता से उसने अपने शत्रुओं को परास्त कर दिया और अपने पिता का खोया हुआ राज्य पुन: प्राप्त कर लिया।

धर्मगुप्त अब राजा बन गया। उसने बुरे दिनों में उसे पालने वाली गरीब ब्राह्मणी को राजमाता का दर्जा दिया और शुचिव्रत को अपना छोटा भाई माना। इस प्रकार नियमित रूप से प्रदोष व्रत करने से ब्राह्मणी, धर्मगुप्त तथा शुचिव्रत को भरपूर धन-धान्य की प्राप्ति हुई। इस व्रत को करने वालों पर शिवजी इसी प्रकार प्रसन्न होते हैं।