दैनिक भास्कर हिंदी: क्यों पुरषोत्तमी परमा एकादशी को श्री कृष्ण ने बताया है सर्वश्रेष्ठ ?

May 20th, 2018

डिजिटल डेस्क, भोपाल। वैदिक धर्म में व्रत-उपवास को अलग महत्व दिया जाता है। सप्ताह का प्रत्येक दिन किसी ना किसी विशिष्ट देवी-देवता को समर्पित होता है, जिन्हें प्रसन्न करने के लिए उनके भक्त उस दिन उपवास रखते हैं। सप्ताहिक दिनों में उपवास रखने के अलावा हिन्दू कैलेंडर के अनुसार ऐसे बहुत से दिन भी आते हैं, जब उपवास रखने का सुखद फल व्यक्ति को मिलता है। इन्हीं दिनों में से एक है एकादशी का व्रत। एकादशी का व्रत रखने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। इस बार अधिक मास पद्मिनी एकादशी शुक्ल पक्ष यानी  25 मई 2018 को पड़ रही है और परमा एकादशी (हरिवल्लभा) अधिक मास के कृष्ण पक्ष यानी 10 जून 2018 को पड़ रही है। 

हिन्दू कैलेंडर के अनुसार प्रत्येक वर्ष में 24 एकादशियां आती हैं। लेकिन जब अधिकमास या मलमास आता है तब इनकी संख्या 24 से बढ़कर 26 हो जाती है। अधिक मास में दो एकादशी आती हैं जिन्हें परमा और पद्मिनी के नाम से जाना जाता है। अधिक मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी को हरिवल्लभा या परमा एकादशी कहा जाता है। इस व्रत के पीछे कई पौराणिक मान्यताएं हैं। जिससे आप इसके महत्व के बारे में जान पाएंगे। चलिए आपको बताते हैं इस व्रत को लेकर क्या है पौराणिक मान्यता। 

पौराणिक कथाओं के अनुसार सर्वप्रथम भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को परमा या पुरुषोत्तमी एकादशी के व्रत की कथा सुनाकर इसके माहात्म्य से अवगत करवाया था। काम्पिल्य नगरी में सुमेधा नामक एक ब्राह्मण अपनी पत्नी के साथ रहता था। वह ब्राह्मण धर्मात्मा और उसकी पत्नी पतिव्रता गुण से संपन्न थी। ये ब्राह्मण दंपत्ति बेहद परोपकारी थे, खुद भूखे रहकर ये अपने अतिथियों को भोजन कराते थे। वे दोनों धन के अभाव से जूझ रहे थे। एक दिन ब्राह्मण ने अपनी पत्नी से कहा “मुझे लगता है धन कमाने के लिए मुझे परदेस जाना चाहिए, क्योंकि धन की कमी की वजह से परिवार की जरूरतें पूरी नहीं हो पा रही हैं।” 

ब्राह्मण के ये कहने पर उसकी पत्नी ने कहा कि मनुष्य जो भी पाता है, वह सिर्फ और सिर्फ अपने भाग्य से ही पाता है। हमें यह दरिद्रता पूर्वजन्म में किए गए किसी पाप या अपराध के कारण मिली है, इसलिए हमें इसे स्वीकार कर लेना चाहिए। ब्राह्मण को भी अपनी पत्नी की बात सही लगी, उसने परदेस जाने का विचार त्याग दिया। एक दिन संयोगवश कौंडिण्य ऋषि उधर से गुजरते हुए ब्राह्मण के घर पधारे। कौंडिण्य ऋषि को देखकर ब्राह्मण दंपत्ति अत्याधिक प्रसन्न हुए, उन्होंने ऋषि की खूब सेवा की। कौंडिण्य ऋषि भी उनके सेवा भाव से बहुत प्रसन्न हुए। ब्राह्मण दंपती ने उनसे पूछा कि कब और कैसे उन्हें इस दरिद्रता से छुटकारा मिलेगा? 

इस सवाल पर ऋषि कौंडिण्य ने उनसे कहा कि अधिकमास के शुक्ल पक्ष में आने वाली परमा एकादशी का व्रत रखने से धन-वैभव की प्राप्ति होती है। इसके अतिरिक्त यह व्रत रखने से पाप का नाश और उत्तम गति प्राप्त होती है। ऋषि कौंडिण्य के अनुसार धन कुबेर ने भी परमा एकादशी का व्रत रखा था, जिससे प्रसन्न होकर स्वयं भगवान शिव ने कुबेर को धन कोषाध्यक्ष बना दिया।

जब अधिकमास की परमा एकादशी आई तब सुमेधा ब्राह्मण और उसकी पत्नी ने व्रत रखा, कुछ ही समय बाद उनकी गरीबी का अंत हुआ और पृथ्वी पर उन्होंने जितना भी समय गुजारा वह सुखमय और धन वैभव से भरा रहा । मृत्यु के बाद भी दोनों ने विष्णु लोक को प्रस्थान किया। 

परमा एकादशी व्रत विधि 

परमा एकादशी व्रत की विधि काफी कठिन है। इस व्रत में पांच दिन तक निराहार रहना पड़ता है। व्रत रखने वाले व्यक्ति को एकादशी के दिन स्नान कर भगवान विष्णु की प्रतिमा के सामने बैठकर अपने हाथ में जल और फूल लेकर व्रत का संकल्प करना होता है। 

चार दिन पूर्ण होने के पश्चात पांचवें दिन ब्राह्मण को भोज करवाकर, उपयुक्त दान-दक्षिणा देकर विदा करना चाहिए और उसके बाद ही स्वयं भोजन ग्रहण करना चाहिए।