Arshad Warsi Exclusive: ह्यूमर जिंदगी को आसान बनाता है, इसलिए मैं हर हाल में मुस्कुराता हूं-अरशद वारसी

डिजिटल डेस्क, मुंबई। कॉमेडी की दुनिया में जब भी किसी ऐसे अभिनेता का नाम लिया जाता है, जो अपने अलग अंदाज, बेहतरीन टाइमिंग और दमदार अभिनय से हर किरदार को यादगार बना दे, तो अरशद वारसी का जिक्र जरूर होता है। ‘सर्किट' से लेकर ‘जॉली एलएलबी' तक उन्होंने हर बार दर्शकों को हंसाने के साथ अपनी अभिनय क्षमता का भी लोहा मनवाया है। अब अरशद एक बार फिर कई बड़े प्रोजेक्ट्स के साथ दर्शकों का मनोरंजन करने के लिए तैयार हैं। साइबर क्राइम पर आधारित कॉमेडी वेब सीरीज ‘प्रीतम एंड पेड्रो' के अलावा वह ‘धमाल 4', ‘गोलमाल 5', ‘वेलकम टू द जंगल' समेत कई फिल्मों का हिस्सा हैं। इन तमाम प्रोजेक्ट्स, अपने किरदारों, कॉमेडी के बदलते दौर और फिल्मी सफर को लेकर अरशद वारसी ने दैनिक भास्कर से की खास बातचीत।
जिंदगी में ह्यूमर जरुरी है
कॉमेडी और ह्यूमर में बड़ा फर्क है। जब आप फिल्म के किसी गंभीर सीन में थोड़ा सा ह्यूमर डालते हो तो दर्शक उसे जरूर पसंद करते हैं। जबकि कॉमेडी का अपना स्टाइल है। सीन में ह्यूमर लाना बहुत मुश्किल काम है लेकिन राजू (राजकुमार हिरानी) ह्यूमर सीन लिखने में माहिर हैं। प्रीतम एंड पेड्रो के एक सीन में मैं कंप्यूटर के की-बोर्ड पर गुस्सा निकालता हूं। मैं काफी गुस्से में हूं लेकिन जो मैं बोलता हूं वो सुनकर आपको हंसी आ जाएगी। ठीक इसी तरह जिंदगी में भी ह्यूमर होता है। आप अगर जरा भी खुशमिजाज हैं तो मुसीबत में भी ह्यूमर निकाल लेंगे। मैं भी असल जिंदगी में ऐसा ही हूं।
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मैं फनी इंसान हूं, कॉमेडी मेरे लिए आसान
मैं तो हमेशा सेट हो या घर हर जगह हंसता और मस्ती करता रहता हूं। कॉमेडी मेरे लिए सबसे आसान है। इंसान को थोड़ा फनी होना भी होना चाहिए वरना जिंदगी गुजारना भारी हो जाएगा। वैसे आजकल की कॉमेडी मैं देखता हूं तो मुझे लगता है कि आज के बच्चे सीखना भूल गए हैं। हंसाना बेहद मुश्किल जॉनर है। सबसे पहले तो यह जरुरी है कि आपको अपना काम आना चाहिए। अगर आप काम में माहिर नहीं हैं तो गलतियां करेंगे। हमने सालों तक अपने काम को सीखा है तब ऐसी भूमिकाएं कर पाते हैं।
सीन की तैयारी पहले से नहीं करता
मैंने कई एक्टर्स को देखा है कि वे किसी एक किरदार के लिए दिन-रात आईने के सामने रिहर्सल करते हैं और पूरी तरह उसी किरदार में डूब जाते हैं। लेकिन मेरा तरीका बिल्कुल अलग है। मैं सेट पर पहुंचने से पहले कोई तैयारी नहीं करता। पहले निर्देशक की बात सुनता हूं, स्क्रिप्ट समझता हूं और फिर वहीं सीन की तैयारी करता हूं। अगर पहले से कुछ तय करके जाऊं और निर्देशक की सोच अलग निकले, तो बेवजह कन्फ्यूजन हो जाता है। कई बार निर्देशक की विजन और आपकी तैयारी के बीच टकराव भी हो सकता है। अपनी पुरानी तैयारी छोड़ना भी मुश्किल होता है। इसलिए मैं किसी तरह का स्ट्रेस नहीं लेता। सेट पर ही माहौल और निर्देशक के विजन के हिसाब से किरदार तैयार करता हूं। मुझे लगता है कि इससे परफॉर्मेंस ज्यादा सहज और नैचुरल रहती है।
सोशल मीडिया और एआई खरतानक
मैं सोशल मीडिया पर तभी एक्टिव होता हूं जब मेरी कोई फिल्म आने वाली होती है। मुझे लगता है यह माध्यम बेहद खतरनाक है। आपका टाइम खा जाता है। मैंने खुद यह महसूस किया मैंने फोन हाथ में लिया और लगभग डेढ़ घंटे तक उसमे खोया रहा जबकि मेरे पास 10 मिनट का भी हिसाब होता है। यहां मेरे कब डेढ़ घंटे बीत गए मुझे पता ही नहीं चला। इसके साथ ही पिछले हफ्ते मैंने पहली बार चैट जीपीटी यूज किया जिसमे मुझे सारी खबरें गलत मिली। आप इस टूल पर भी भरोसा नहीं कर सकते यह आपको आपके डाटा से ही जानकारी उपलब्ध कराता है। लेकिन आज की पीढ़ी ने इनका इस्तेमाल तेजी से शुरू किया है और सोचने समझने की कोशिश बंद कर दी है। मुझे उनकी चिंता होती है।
बेटा मेरे साथ नहीं, अपनी मेहनत से आगे बढ़ रहा है
मेरे बेटे जीक को अभिनय में जाना था लेकिन मैंने कहा पहले काम सीखो फिर कोई करियर निर्धारित करो। वह फिल्म ‘किंग' में असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर काम कर रहा है। जिसमे मैं भी एक्टिंग कर रहा हूं। इससे पहले वह राजकुमार हिरानी के साथ भी असिस्ट कर चुका है। मुझे इस बात की खुशी है कि उसने सीधे अभिनय नहीं, बल्कि फिल्म मेकिंग सीखने से अपनी शुरुआत की जिससे उसे इसकी बारीकियां समझ आएंगी। मैं नेपोटिज्म नहीं मेहनत में यकीन करता हूं। एक्टर होने के नाते मैंने कभी उसके लिए किसी से सिफारिश नहीं की। मैं चाहता हूं कि वह अपनी मेहनत, अनुशासन और काम के दम पर आगे बढ़े। इंडस्ट्री में टिकना तभी संभव है, जब आपकी पहचान आपके काम से बने, न कि आपके सरनेम से।
Created On :   1 July 2026 6:48 PM IST













