मनोरंजन: ‘हाउसफुल’ से ‘हाउस क्लोज्ड’ तक: क्यों गिर रहा है सिंगल स्क्रीन थिएटरों पर पर्दा?

डिजिटल डेस्क, मुंबई। कभी किसी शहर की पहचान उसके मशहूर सिनेमाघरों से भी होती थी। शुक्रवार को टिकट खिड़की पर लंबी कतारें, ‘हाउसफुल’ का बोर्ड और पर्दे पर हीरो की एंट्री के साथ सीटियों-तालियों से गूंजता हॉल... सिंगल स्क्रीन सिर्फ फिल्म देखने की जगह नहीं, बल्कि शहरों की धड़कन हुआ करते थे। लेकिन अब एक-एक कर इन पर्दों पर हमेशा के लिए ताला लग रहा है। बेंगलुरु का करीब 40 साल पुराना उर्वशी थिएटर भी 24 अगस्त को बंद हो गया। कहीं इनकी जगह मॉल बन रहे हैं तो कहीं कमर्शियल कॉम्प्लेक्स और बहुमंजिला इमारतें। क्या बड़े पर्दे पर सैकड़ों लोगों के साथ फिल्म देखने का वह सामूहिक अनुभव अब इतिहास बनने की ओर है? जयपुर के जाने-माने फिल्म वितरक, मल्टीप्लेक्स मालिक और फिल्म विश्लेषक राज बंसल ऐसा नहीं मानते। उनके मुताबिक, सिनेमा नहीं, सिनेमाघरों का पुराना मॉडल बदल रहा है। दर्शक की पसंद और सुविधाओं की अपेक्षाएं बदली हैं, लेकिन सबसे बड़ा बदलाव उस जमीन के आर्थिक गणित में आया है, जिस पर कभी बड़े-बड़े सिनेमाघर खड़े थे। दैनिक भास्कर से खास बातचीत में राज बंसल ने सिंगल स्क्रीन के बंद होने के पीछे की पूरी कहानी और बदलते सिनेमा कारोबार का गणित विस्तार से समझाया।
‘सिंगल स्क्रीन में कोई जाना ही नहीं चाहता’
राज बंसल के मुताबिक सिंगल स्क्रीन के संकट की सबसे बड़ी वजह बदलता दर्शक है। आज लोग सिर्फ फिल्म नहीं, बल्कि आरामदायक सीट, बेहतर साउंड, एयर कंडीशनिंग और साफ-सुथरी सुविधाओं वाला पूरा अनुभव चाहते हैं। लेकिन कई पुराने थिएटर समय के साथ खुद को नहीं बदल पाए। स्क्रीन, साउंड और दूसरी सुविधाएं पुरानी रह गईं, जबकि मल्टीप्लेक्स आधुनिक अनुभव के साथ आगे निकल गए। वे कहते हैं, ‘सिंगल स्क्रीन बंद इसलिए हो रहे हैं कि सिंगल स्क्रीन में कोई जाना ही नहीं चाहता।' इसका अनुभव बंसल खुद भी कर चुके हैं। उनका तर्क है कि कई जगह लाइट और साउंड सिस्टम पुराने हैं, स्क्रीन वर्षों से नहीं बदली और टॉयलेट जैसी बुनियादी सुविधाएं भी आधुनिक नहीं की गईं। उन्होंने बताया कि जयपुर में अपने सिंगल स्क्रीन थिएटर को करीब 15 साल तक बचाए रखने की कोशिश की, लेकिन धीरे-धीरे दर्शक आना लगभग बंद हो गए। जो कुछ लोग आते भी थे, उनके लिए टिकट खरीदना मुश्किल होता था। ऐसे में थिएटर को बचाने के लिए आखिरकार उन्हें उसे मल्टीप्लेक्स में बदलने का फैसला लेना पड़ा।
70-80 के दशक की जमीन, आज 50 से 100 गुना महंगी
राज बंसल सिंगल स्क्रीन के बंद होने की सबसे महत्वपूर्ण वजह रियल एस्टेट की कीमतों में जबरदस्त उछाल को मानते हैं। वे बताते हैं कि जब 1970 और 1980 के दशक में अधिकांश सिंगल स्क्रीन बने थे, उस समय जमीन की कीमत और आज की कीमत में 50 से 100 गुना तक का अंतर आ चुका है। यहीं से थिएटर मालिक का गणित बदल जाता है। एक तरफ पुराना सिनेमा हॉल है, जिसमें लगातार रखरखाव और आधुनिकीकरण पर पैसा लगाना होगा। दूसरी तरफ उसी जमीन पर कमर्शियल कॉम्प्लेक्स, ऑफिस स्पेस या दूसरी परियोजना विकसित करने का विकल्प है। राज बंसल की नजर में यही वह मुद्दा है जिस पर अब तक पर्याप्त चर्चा नहीं हुई। उनका मानना है कि जब जमीन का मूल्य इतना बढ़ जाए तो मालिक के लिए भावनात्मक लगाव के आधार पर घाटे में सिनेमा चलाते रहना आसान नहीं होता। यानी कई जगह सिनेमा की जमीन बच रही है, लेकिन उस जमीन पर सिनेमा नहीं बच रहा। मुंबई में तो इंच भर जमीन के लिए लड़ाई होती है तो थिएटर मालिक क्यों नुकसान उठाए ?
पहले थिएटर बनाना जरूरी था, अब बंद करना आसान
राज बंसल बताते हैं कि सिंगल स्क्रीन थिएटरों के तेजी से बंद होने के पीछे नियमों में आया बदलाव भी एक बड़ी वजह है। पहले किसी बड़े व्यावसायिक या निर्माण प्रोजेक्ट में थिएटर के लिए जगह रखना जरूरी होता था, लेकिन अब ऐसी अनिवार्यता नहीं रही। ऐसे में जब कोई पुराना थिएटर बंद होता है तो उसकी जमीन पर नया प्रोजेक्ट बनाते समय थिएटर को दोबारा शामिल करना जरूरी नहीं होता। यही कारण है कि कई जगह पुराने सिनेमाघरों की जगह मॉल, कमर्शियल कॉम्प्लेक्स और दूसरी इमारतें ले रही हैं।
महाराष्ट्र: 1,200 से 250-300 तक का सफर
सिंगल स्क्रीन के संकट की सबसे गंभीर तस्वीर महाराष्ट्र में दिखाई देती है। सितंबर 2025 की एक रिपोर्ट के अनुसार राज्य में कुछ दशक पहले 1,200 से ज्यादा सिंगल स्क्रीन थे, जबकि अब केवल करीब 250 से 300 थिएटर ही चल रहे हैं। रिपोर्ट में वित्तीय नुकसान, मल्टीप्लेक्स से प्रतिस्पर्धा, ओटीटी और संचालन खर्च को बड़ी वजहों में शामिल किया गया। इससे पहले 2023 में भी एक रिपोर्ट में महाराष्ट्र के करीब 1,200 में से लगभग 900 सिंगल स्क्रीन के स्थायी रूप से बंद होने की बात कही गई थी। दोनों रिपोर्टों से एक बात साफ हैं कि महाराष्ट्र में सिंगल स्क्रीन का संकट पिछले कुछ सालों में बेहद तेजी से बढ़ा है। पुणे और पिंपरी-चिंचवड की हाल की रिपोर्ट में भी 35 में से 28 सिंगल स्क्रीन बंद होने की खबर सामने आई है।
मुंबई में सिर्फ 45-50 थिएटर बचे, करीब 125 बंद
मुंबई महानगर क्षेत्र की तस्वीर और भी चिंताजनक है।सिनेमा ओनर्स एंड एक्सहिबीटर्स असोसिएशन ऑफ इंडिया की जून 2026 की अपडेटेड सूची के आधार पर अगस्त 2026 में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक मुंबई महानगर क्षेत्र में केवल 45 से 50 सिंगल स्क्रीन ही चालू हैं, जबकि करीब 125 बंद हो चुके हैं। यानी जिस शहर को भारतीय सिनेमा की राजधानी कहा जाता है, वहीं पारंपरिक सिनेमाघरों का अस्तित्व तेजी से सिमट रहा है। 2025 में बीएमसी के आंकड़ों के आधार पर आई एक रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि मुंबई के करीब दो दर्जन थिएटर मालिकों ने अपनी संपत्तियों के रीडेवलपमेंट के प्रस्ताव दिए हैं। इनमें कई जगह कमर्शियल टावर और कुछ जगह आवासीय परियोजनाएं बनाने की योजना है। यहीं राज बंसल की रियल एस्टेट वाली बात सबसे ज्यादा सटीक बैठती दिखाई देती है।
क्या आम दर्शक के लिए फिल्म देखना महंगा होता जा रहा है?
सिंगल स्क्रीन का एक बड़ा आकर्षण उसकी अपेक्षाकृत कम टिकट कीमत भी रही है। लेकिन मल्टीप्लेक्स के बढ़ते प्रभाव के साथ फिल्म देखने की लागत को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। राज बंसल ने एक अनुभव साझा किया। एक परिचित ने उनसे 12 रिक्लाइनर सीटों की टिकट बुक करने को कहा। कुल कीमत 21 हजार रुपए निकली। यानी प्रति टिकट लगभग 1,750 रुपए। कीमत सुनकर परिचित ने टिकट को ‘अनअफोर्डेबल’ बताते हुए बुकिंग रद्द करने को कहा। हालांकि बंसल यह भी मानते हैं कि आज दर्शक के पास विकल्प ज्यादा हैं। वीकेंड के महंगे शो की बजाय मंगलवार जैसे दिनों में टिकट 150-200 रुपए तक मिल सकता है। उनके अनुसार कम कीमत वाले दिनों की योजना का असर कलेक्शन पर भी दिखता है। लेकिन सवाल बना हुआ है, जिस दर्शक के लिए कभी 50-100 रुपए में सिंगल स्क्रीन पर फिल्म देखना आसान था, वह भविष्य में कहां जाएगा?
70 से 150 सीट वाले ‘जनता सिनेमा’ क्या बनेंगे विकल्प?
राज बंसल इस बदलाव में एक नई संभावना भी देखते हैं। उनके मुताबिक अब 50, 70 और 100 सीटों वाले छोटे सिनेमाघर, जिन्हें ‘जनता सिनेमा’ जैसे मॉडल के रूप में देखा जा रहा है, सामने आ रहे हैं। इनकी टिकट दरें कम रखने की कोशिश की जा रही है। वे बताते हैं कि अलग-अलग समूह 70 से 150 सीटों वाले छोटे सिनेमा मॉडल पर काम कर रहे हैं। इसमें बड़ी जमीन की जरूरत नहीं होती और जमीन मालिक तथा सिनेमा संचालक साझेदारी के मॉडल पर भी काम कर सकते हैं। यह मॉडल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत अभी भी पर्याप्त स्क्रीन वाला देश नहीं है। हाल की रिपोर्टों के अनुसार देश के 16,000 से अधिक पिन कोड में आज भी कोई सिनेमा स्क्रीन नहीं है। यानी एक तरफ पुराने बड़े सिंगल स्क्रीन बंद हो रहे हैं, दूसरी तरफ छोटे शहरों और कस्बों में नए, छोटे और किफायती सिनेमाघरों की जरूरत बनी हुई है। पीवीआर आइनॉक्स के प्रबंध निदेशक अजय बिजली कहते हैं कि ऐसे दर्शकों के लिए ही हमने कम कीमतों में स्मार्ट सिनेमा शुरू किया है जिससे दर्शक कम दाम में फिल्म देख सकें। भविष्य शायद 1,000 सीटों वाले एक बड़े हॉल का नहीं, बल्कि कम सीटों वाले कई आधुनिक और किफायती हॉल का है।
सिंगल थिएटर का अपना मैजिक है - अमित राय, निर्देशक
फिल्म निर्देशक अमित राय का कहना है कि असली सिनेमा का मजा सिंगल थिएटर ही देते रहे हैं। इनके बंद होने से सिनेमा का वो जादू भी ख़त्म होता जा रहा है जब एक साथ कई सीटियां और तालियां बजती थी और खराब फिल्म भी अच्छी लगने लगती थी। मल्टीप्लेक्स को चलाने के लिए आपको उतना निवेश भी करना पड़ेगा जबकि सिंगल स्क्रीन को ही अगर आधुनिक कर दें तो समस्या हल हो सकती है लेकिन इस कहानी का दूसरा पक्ष भी है। भारत में कुल स्क्रीन संख्या अभी भी करीब 10 हजार के आसपास है। सिंगल स्क्रीन बंद हो रहे हैं तो उनकी जगह मल्टीप्लेक्स और छोटे आधुनिक सिनेमाघर आ रहे हैं। इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि भारत में सिनेमा मर रहा है या नहीं। असली सवाल यह है कि आने वाले समय में आम दर्शक फिल्म कहां, किस कीमत पर और किस तरह के सिनेमाघर में देखेगा।
Created On :   27 Aug 2026 1:00 AM IST










