दैनिक भास्कर हिंदी: आजादी से पहले यहां दी जाती थी काला पानी की सजा, कैदियों को दी जाती थी यातनाएं

August 12th, 2017

डिजिटल डेस्क,भोपाल। इस साल 15 अगस्त पर देश को आजाद हुए 70 साल हो जाएंगे। देश की आजादी के लिए भारत के कई वीरों ने लंबी लड़ाई लड़ी, कई यातनाएं सहीं और अपनी जान गंवाईं। इन सबकी दास्तां बताती एक ऐसी जगह है, जहां स्वतंत्रता सेनानियों पर अत्याचार और मौत दी जाती थी। हम बात कर रहे हैं सेल्युलर जेल यानी काला पानी की...ये नाम सुनते ही मन सिहर जाता है। काला पानी की सजा जिसे भी मिली वो वापस नहीं लौटा। ये जेल अब भारतीयों के लिए 'स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान का प्रतीक' है और पर्यटक यहां जाते हैं। 

राजनीतिक कैदियों को दी जाती थीं यातनाएं

अंडमान-निकोबार के पोर्ट ब्लेयर में स्थित काला पानी की जेल का इस्तेमाल ब्रिटिश काल में राजनीतिक कैदियों को रखने के लिए किया जाता था। आज इस जगह को राष्ट्रीय स्मारक बना दिया गया है।

यहां बनी काल कोठरियों में आज़ादी के लिए लड़ने वाले उन वीरों को कई यातनाएँ दी। जिन्हें काला पानी की सजा हुई उनमें से लौटने का विचार किसी के सपने में भी नहीं आता था। कुछ खुशनसीब वहां से लौटे और यातनाओं के भयंकर मंजर सुनाए, जिसे सुनकर लोगों का खून खौल जाता था। और आज भी वो कहानियां सुनकर दिल दहल जाता है।

जेल का निर्माण 1896 में शुरू हुआ और ये 1906 में बनकर पूरा हुआ। इमारत के लिए ईंटें बर्मा से लाई गई थीं। जेल सात हिस्सों में बंटा है। आजादी के बाद दो खंड को ध्वस्त कर दिया गया।

प्रत्येक शाखा तीन मंजिल की बनी थीं। इनमें कोई शयनकक्ष नहीं था और कुल 698 कोठरियां बनी थीं। कोठरियों को इस तरह से बनाया गया था कि एक कोठरी का कैदी दूसरी कोठरी के कैदी से कोई संपर्क नहीं रख सकता था। 

कैसे दी जाती थी सजा

कैदियों को जंजीरों में जकड़ कर रखा जाता था। उनसे नारियल का तेल निकालने जैसे काम करवाए जाते थे और उन्हें बाथरूम जाने के लिए भी इजाजत लेनी होती थी। यहां हजारों लोगों को फांसी पर लटकाया गया, पेड़ों पर बाँधकर फाँसी दी गई और तोपों के मुंह पर बांधकर उन्हें उड़ाया गया। सबसे पहले 200 विद्रोहियों को जेलर डेविड बेरी और मेजर जेम्स पैटीसन वॉकर की सुरक्षा में यहां लाया गया। उसके बाद 733 विद्रोहियों को कराची से लाया गया। भारत और बर्मा से भी यहां सेनानियों को लाया गया था।  

कई मील दूर और पानी से छिरे होने की वजह से अंग्रेज इसे विद्रोहियों को सजा देने के लिए अनुकूल जगह समझी जाती थी। उन्हें सिर्फ समाज से अलग करने के लिए यहां नहीं लाया जाता था, बल्कि उनसे जेल का निर्माण, भवन निर्माण, बंदरगाह निर्माण आदि के काम में भी लगाया जाता था। यहां आने वाले कैदी ब्रिटिश शासकों के घरों का निर्माण भी करते थे। 19वीं शताब्दी में जब स्वतंत्रता संग्राम ने जोर पकड़ा, तब यहा कैदियों की संख्या भी बढ़ती गई।  

वीरों ने जेल में काटी सजा

वीर सावरकर को इसी कमरे में जेल में रखा गया था। उनके अलावा डॉ. दीवान सिंह, योगेंद्र शुक्ल, भाई परमानंद, सोहन सिंह, वामन राव जोशी और नंद गोपाल जैसे लोग भी इसी जेल में रहे थे।

1942 में जापान ने अंडमान द्वीप पर कब्जा कर अंग्रेजों को खदेड़ दिया था। हालांकि 1945 में दूसरा विश्वयुद्ध खत्म होने पर ये फिर से अंग्रेजों के कब्जे में आ गया।