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देह अन्त्येष्टि या देह दान ? सोलह संस्कारों में से एक है अन्त्येष्टि

BhaskarHindi.com | Last Modified - December 05th, 2018 15:14 IST

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देह अन्त्येष्टि या देह दान ? सोलह संस्कारों में से एक है अन्त्येष्टि

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। हिन्दू धर्म में देह अन्त्येष्टि करना एक संस्कार माना जाता है जो द्विजों द्वारा किए जाने वाले सोलह संस्कारों में से एक है। मनु, याज्ञवल्क्य आदि स्मृतियों के अनुसार संस्कार वैदिक मन्त्रों के साथ किए जाते हैं। स्मृतियों के अनुसार ही स्त्रियों और शूद्रों के संस्कार बिना वैदिक मन्त्रपाठ के सामान्य रीति-रिवाज से ही किए जाते थे। सनातन काल से लेकर आज तक अन्त्येष्टि कर्मों में ऋग्वेद के दशम् मंडल के 14 से 18 सूक्तों के मन्त्रों का प्रयोग किया जाता है। 

सम्पादन अनिवार्य
बौध धर्म के अनुसार जन्म संस्कार और मृत्तक संस्कार दोनों ही ऋण-स्वरुप हैं अर्थात् इनका सम्पादन अनिवार्य है। दाह संस्कार और श्राद्ध कर्म श्रोताग्नि, स्मार्ताग्नि और जो कोई भी अग्नि नहीं रखते, उन सबके लिए किए जाते हैं। जो स्त्री है, बच्चा है, परिव्राजक है, जो दूर देश में मरता है, जो अकाल मृत्यु पाता है या आत्महत्या करता है या दुर्घटनावश मर जाता है। उनके लिए अन्त्येष्टि-कृत्य अलग-अलग प्रकार के होते हैं। 

गृह्यसूत्र के अनुसार
शतपथ ब्राह्मण एवं पारस्कर गृह्यसूत्र के अनुसार नित्य अग्निहोत्र करने वाले आहिताग्नि को तीनों वैदिक अग्नियों के साथ और केवल जनेऊधारी स्मार्त्य या औपासन अग्नि के साथ जलाया जाता है तथा साधारण लोगों का शव केवल साधारण अग्नि से जलाया जाता है। एक ही विषय की कृत्य-विधियों के लिए श्रौत और गृह्यादि सूत्रों, स्मृतियों, पुराणों और अन्य ग्रन्थों में विभिन्न मत मिलते हैं। निर्णयसिन्धु के अनुसार अन्त्येष्टि संस्कार के नियम प्रत्येक शाखा में अलग रुप से किए जाते हैं।

एकरुपता कभी नहीं
अनेक धर्म ग्रन्थों से यह पता चलता है कि पौराणिक काल से आज तक अंतिम संस्कार संबंधी नियम विधियों में एकरुपता कभी नहीं रही। ये कालभेद, जातिभेद, परम्पराभेद, पात्रभेद, देशभेद के अनुसार अलग-अलग प्रकार से प्रचलन में रही हैं। जो लोग परदेश में अज्ञात रूप से मर जाते हैं उनकी अंत्येष्टि पुलिस या अन्य लोग कर देते हैं। 

संस्कार विधियां 
जंगली जानवरों द्वारा खा लिए जाने पर भी कोई संस्कार नहीं हो पाता है। परिजनों को बाद में पता चलता है तो वे और्धदैहिक संस्कार कर देते हैं। सभी बच्चों को जमीन में गाड़ा जाता है, साधू-सन्यासी और गोंसाई, जोगी आदि हिन्दु जातियों में समाधि बना दी जाती है। विश्व की प्राचीनतम विकसित सभ्यता मिश्र, सुमेरु, अक्काद, एलम, समर्रा सहित भारत की सैंधव-सरस्वती सभ्यताओं तक, सभी में शव दफनाने की परम्परा अबाध रुप से पाई जाती है। अतः दाह संस्कार और समाधिदान दोनों ही विधियां स्मार्त्तों, जनजातियों में प्रचलित हिन्दु संस्कार विधियां हैं। यहां तक कि जल-समाधि की परम्परा भी कहीं-कहीं देखने को मिल जाती है। 

अंतेष्टि संस्कार अनिवार्य
उपरोक्त विवरण के अनुसार अंतिम संस्कार के विभिन्न प्रकार हो सकते हैं जिनमें से दाह संस्कार मात्र भारत और इससे प्रभावित देशों में ही प्रचलित है। ऐसा लगता है कि दाह संस्कार मानव सृष्टि में, श्रौत-स्मार्त्त धर्म तथा सभ्यता-संस्कृति के पूर्ण विकास के बाद से समाज में प्रयोग में लाया जा रहा है। उसमें भी वैदिक मंत्रों सहित संस्कार केवल उपनयन संस्कारित द्विजवर्ग का ही मान्य है। इससे लगता है कि सामान्यतया अंतेष्टि संस्कार अनिवार्य नहीं है। यह शव को सा-सम्मान पंचतत्व में विलीन करने की एक विकसित परंपरा मात्र है।

व्यवहार
महर्षि दधीचि ने अपना देहदान इंद्र को अस्थिवज्र प्रदान करने के लिए किया था उनका अंतिम संस्कार नहीं हुआ और देववताओं ने उसे मान्य भी किया था। चन्द्रवंशी राजा शिवि जिनके नाम पर पाकिस्तान में बलोचिस्तान का एक शहर और मंडल शिबि प्रसिद्ध है, उन्होंने बाजरुपी धर्मराज को अपना देहदान किया था, जिससे उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। वैदिक शास्त्रीय नियम भी देश, काल और पात्र के अनुसार परिवर्तन होते रहे हैं। कुछ व्यवहार सतयुग, त्रेता, द्वापर में थे वे कलियुग में वर्जित हैं। हिन्दुओं में ही विवाह संबंधी नियम भी जाति और स्थानों के अनुसार अलग-अलग होते हैं। 

सूर्यास्त से पहले दाह संस्कार :- 
हिंदू धर्मानुसार, सूर्यास्त के बाद कभी भी दाह संस्कार नहीं किया जाता है। यदि किसी की मृत्यु सूर्यास्त के बाद हुई है तो उसे अगले दिन सुबह के समय ही दाह संस्कार किए जाने का नियम है। ऐसी मान्यता है कि सूर्यास्त के बाद दाह संस्कार करने से मृतक की आत्मा को परलोक में भारी कष्ट सहना पड़ता है और अगले जन्म में उसे किसी अंग में दोष भी हो सकता है। 

दाह संस्कार के नियम :- 
धर्मज्ञ मानते हैं कि अच्छी तरह से लकड़ी की चिता बनाकर मृतक को उस पर लेटाकर और पूर्ण रीति-रिवाज से दाह-संस्कार करना ही श्रेष्ठ कर्म है, अन्य तरीके से दाह-संस्कार करना धर्म विरुद्ध है। इस क्रिया को धार्मिक रीति से संपन्न कराया जाता है। संपूर्ण सम्मान और आदर के साथ ही उसका दाह संस्कार किया जाना उचित होता है। इस समय लोगों को अनुशासन में रहना चाहिए और श्मशान से जाने से पूर्व मृतक के प्रति संवेदना के दो शब्द कहना मृतक की आत्मा को शांति प्रदान करती है। 

परंपराओं का निर्वहन
मृत्यु के बाद सभी धर्मो में अपने रीति-रिवाज से अंतिम संस्कार किए जाने की परंपरा है। इसे देखते हुए एनाटॅमी विभाग में देहदान के पहले अंतिम संस्कार की परिजनों की इच्छा भी पूरी की जा रही है। देश-प्रदेश के कई मेडिकल, विश्वविद्यालयों के एनाटॅमी विभाग ने इसके लिए सभी धर्मो के धर्मगुरुओं से एक करार भी किया हुआ है। ये धर्मगुरु एनाटॅमी विभाग में ही व्यापक पूजा-पाठ, यज्ञ और प्रतीकात्मक रूप से फूल चुनने जैसी परंपराओं का निर्वहन करा देते हैं। 

अतः वैदिक विचार धारा के अनुसार देहदान करने में धार्मिक या शास्त्रीय नियमों का कोई उल्लंघन नहीं होता है। विद्वानों को डाक्टरों से मिलकर देहदान करने वाले मृत्तक की धार्मिक क्रियाओं के लिए सार्वजनिक, सार्वभौमिक नियम बनाने चाहिए। देहदान में भी शरीर के कुछ अवशिष्ट तो अवश्य बच ही जाते हैं जिससे उनके दाह संस्कार की व्यवस्था कर सकते हैं।

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