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घरों के सामने और चौराहों पर आज जलेगी लोहड़ी, जानिए त्यौहार की खासियत

January 13th, 2019 12:43 IST

डिजिटल डेस्क। उत्तर भारत और खासकर पंजाब का सबसे प्रसिद्ध त्यौहार है लोहड़ी। इस दिन सभी अपने घरों और चौराहों के बाहर लोहड़ी जलाते हैं।आग का घेरा बनाकर दुल्ला भट्टी की कहानी सुनाते हुए रेवड़ी, मूंगफली और लावा (मखाने) खाते हैं। लोहड़ी महोत्सव इस बार 13 जनवरी 2019 को है। लोहड़ी महोत्सव के अनेक रोचक तथ्य हैं। त्यौहार एक और नाम अनेक। भारत के अलग-अलग प्रांतों में मकर संक्रांति के दिन या आसपास कई त्यौहार मनाएं जाते हैं, जो कि मकर संक्रांति के ही दूसरे रूप हैं। उन्हीं में से एक है लोहड़ी। पंजाब और हरियाणा में लोहड़ी पर्व बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है।


साल की सभी ऋतुओं पतझड, सावन और बसंत में कई तरह के छोटे-बड़े त्यौहार मनाए जाते हैं, जिन में से एक प्रमुख त्यौहार लोहड़ी है जो बसंत के आगमन के साथ 13 जनवरी 2019 को हिन्दू महीने पौष की अंतिम रात्री को मनाया जाता है। इसके अगले दिन को सक्रांति के रूप में मनाया जाता है। कहा जाता है कि संत कबीर की पत्नी लोई की याद में ये पर्व मनाया जाता है। ये भी मान्यता है कि सुंदरी एवं मुंदरी नाम की लड़कियों को राजा से बचाकर एक दुल्ला भट्टी नामक डाकू ने किसी अच्छे लड़कों से उनकी शादी करवा दी थी।

बैसाखी त्यौहार की तरह लोहड़ी का सबंध भी पंजाब के गांव, फसल और मौसम से है। इस दिन से मूली और गन्ने की फसल बोई जाती है। इससे पहले रबी की फसल काटकर घर में रख ली जाती है। खेतों में सरसों के फूल लहराते दिखाई देते हैं। लोहड़ी की संध्या को लोग लकड़ी जलाकर अग्नि के चारों ओर चक्कर काटते हुए नाचते-गाते हैं और आग में रेवड़ी, मूंगफली, खील, मक्की के दानों की आहुति देते हैं। अग्नि की परिक्रमा करते और आग के चारों ओर बैठकर लोग आग सेंकते हैं। इस दौरान रेवड़ी, खील, गज्जक, मक्का खाने का आनंद लेते हैं।

लोहड़ी के दिन विशेष पकवान बनते हैं जिसमें गजक, रेवड़ी, मुंगफली, तिल-गुड़ के लड्डू, मक्का की रोटी और सरसों का साग प्रमुख होते हैं। लोहड़ी से कुछ दिन पहले से ही छोटे बच्चे लोहड़ी के गीत गाकर लोहड़ी हेतु लकड़ियां, मेवे, रेवडियां, मूंगफली इकट्ठा करने लग जाते हैं। पंजाबियों के लिए लोहड़ी उत्सव खास महत्व रखता है। जिस घर में नई शादी हुई हो या बच्चा हुआ हो उन्हें विशेष तौर पर बधाई दी जाती है। प्राय: घर में नव वधू या बच्चे की पहली लोहड़ी बहुत विशेष होती है। इस दिन बड़े प्रेम से बहन और बेटियों को घर बुलाया जाता है।

लोहड़ी को पहले तिलोड़ी कहा जाता था। यह शब्द तिल तथा रोड़ी (गुड़ की रोड़ी) शब्दों के मेल से बना है, जो समय के साथ बदल कर लोहड़ी के रूप में प्रसिद्ध हो गया। मकर संक्रांति के दिन भी तिल-गुड़ खाने और बांटने का महत्व है। पंजाब के कई इलाकों मे इसे लोही या लोई भी कहा जाता है। पौराणिक मान्यता अनुसार सती के त्याग के रूप में यह त्यौहार मनाया जाता है। कथानुसार जब प्रजापति दक्ष के यज्ञ की आग में कूदकर शिव की पत्नीं सती ने आत्मदाह कर लिया था। उसी दिन की याद में यह पर्व मनाया जाता है।

आधुनिकता के चलते लोहड़ी मनाने का तरीका बदल गया है। अब लोहड़ी में पारंपरिक पहनावे और पकवानों की जगह आधुनिक पहनावे और पकवानों को शामिल कर लिया गया है। लोग भी अब इस उत्सव में कम ही भाग लेते हैं। ईरान में भी नववर्ष का त्यौहार इसी तरह मनाते हैं। आग जलाकर मेवे अर्पित किए जाते हैं। पंजाब, हरियाणा और दिल्ली में मनाई जाने वाली लोहड़ी और ईरान का चहार-शंबे सूरी बिल्कुल एक जैसे त्यौहार हैं। लोहड़ी के त्यौहार को ईरानी पारसियों या प्राचीन ईरान का उत्सव मानते हैं।

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