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महावीर जयंती : सुविधाओं को त्याग, समाज को दी थी वैज्ञानिक अवधारणा


डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को महावीर जयंती मनाई जाती है। जैन समाज इस बार 17 अप्रैल को महावीर जयंती मना रहा है। भगवान महावीर स्वामी, जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर थे जिनका जीवन ही उनका संदेश है। उनके सत्य, अहिंसा, के उपदेश एक खुली किताब की भांति है। बचपन में इन्हें वर्धमान के नाम से पुकारा जाता था। इन्होंने जैन धर्म की खोज के साथ ही इसके प्रमुख सिद्धांतों को स्थापित किया। यह उत्सव जैन समुदाय का सबसे प्रमुख पर्व है।

इस पर्व को पूरे देशभर के जैन मंदिरों में बड़े ही जोश और उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस दिन सभी जैन मंदिरों को भव्य रूप से सजाया जाता है। इस दिन भगवान महावीर की प्रतिमा को पारंपरिक स्नान कराया जाता है और इसके बाद भव्य जुलूस, शोभायात्राएं निकाली जाती हैं। जैन मुनियों द्वारा इस दिन जैन धर्म के सिद्धांतों को लोगों तक पहुंचाने के लिए मंदिरों में प्रवचन देते हैं। इस दिन गरीबों को कपड़े और जरूरत का सामान भी वितरित करने की परंपरा है।

रहस्यवाद का मौलिक दर्शन
भगवान महावीर उस युग में पैदा हुए जब वैदिक क्रियाकांडों का बोलबाला था। तीर्थंकर महावीर ने प्रतिकूल वातावरण की कोई परवाह न कर साहस के साथ अपने सिद्धांतों को जनमानस के बीच रखा। उन्होंने ढोंग, पाखंड, अत्याचार, अनाचारत व हिंसा के नकारते हुए दृढ़तापूर्वक अहिंसक धर्म का प्रचार किया। महावीर ने समाज को अपरिग्रह, अनेकांत और रहस्यवाद का मौलिक दर्शन समाज को दिया। कर्मवाद की एकदम मौखिक और वैज्ञानिक अवधारणा महावीर ने समाज को दी। 

24वें और आखिरी तीर्थंकार
महावीर स्वामी जैन धर्म के 24वें और आखिरी तीर्थंकार थे। जिन्होंने 540 ईस्वी पूर्व भारत में बिहार के एक राजसी परिवार में जन्म लिया था। यह राजा सिद्धार्थ और रानी त्रिशला के पुत्र थे। इनके जन्म के समय सभी लोग खुश और समृद्ध थे, इस वजह से इनका नाम वर्धमान रखा गया। माना जाता है कि, उनके जन्म के समय से ही इनकी माता को इनके बारे में अद्भुत सपने आने शुरु हो गए थे कि, ये सम्राट बनेंगक या फिर तीर्थंकर। इनके जन्म के बाद इन्द्रदेव ने इन्हें स्वर्ग के दूध से तीर्थंकर के रुप में अनुष्ठान पूर्वक स्नान कराया था। 

पूरे भारत वर्ष में यात्रा
एक राजपरिवार में जन्म लेने के बावजूद उन्होंने युवावस्था में कदम रखते ही संसार की मोह- माया, सुख-ऐश्वर्य और राज्य को छोड़ दिया। स्वामी महावीर ने 30 वर्ष की उम्र में धार्मिक जागरुकता की खोज में घर त्याग दिया था और 12 साल 6 महीने के गहरे ध्यान से इन्हें ज्ञान प्राप्त करने में सफलता हासिल हुई थी। जिसके बाद इन्होंने पूरे भारत वर्ष में यात्रा करना शुरु कर दिया और लोगों को सत्य, असत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह की शिक्षा देते हुए 30 वर्षों तक लगातार यात्रा की। 72 वर्ष की उम्र में इन्होंने निर्वाण को प्राप्त किया और जैन धर्म के महान तीर्थंकरों में से एक बन गए, जिसके कारण इन्हें जैन धर्म का संस्थापक माना जाता है।
 

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