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प्रार्थना क्या है? प्रार्थना करते समय भूलकर भी ना करें ये गलतियां 

BhaskarHindi.com | Last Modified - May 14th, 2018 14:17 IST

प्रार्थना क्या है? प्रार्थना करते समय भूलकर भी ना करें ये गलतियां 

डिजिटल डेस्क, भोपाल।  प्रार्थना में अद्भुत शक्ति है। प्रार्थना करने एक सकारात्मक सोच होती है और सकारात्मकता वो चीज है, जो बुरी चीजों को भी अच्छा नजरिया देती है। सकारात्मक सोच अनहोनी चीजों को भी होनी में बदल सकती है। प्रार्थना में यह सकारात्मक्ता देने की अद्भुत ताकत है, लेकिन ये पूरी तरह प्रार्थना करने के तरीके पर निर्भर करता है। यदि प्रर्थना सही तरीके से नहीं की जाती है तो इसका बुरा परिणाम भी भुगतना पड़ सकता है।

प्रार्थना क्या है ? 

प्रार्थना भी परेशानियों से निकलने की प्रक्रिया है। अध्यात्म में इसका बेहद महत्व है। आप कर्मकांड मानने वाले हैं या विशुद्ध सांसारिक प्राणी, आस्तिक हों या नास्तिक, लेकिन प्रार्थना अध्यात्म की वो प्रक्रिया है जो नश्वर संसार में मनुष्य को प्रकृति या ईश्वर से जोड़ती है।

पूरी हुई इच्छाओं के लिए धन्यवाद 

क्या कभी आपने किसी और के लिए कुछ नहीं करते हुए अपने लिए अच्छा करने की प्रार्थना या इच्छा की है। क्या आपकी हर प्रार्थना या इच्छा में किसी ना किसी रूप में ‘नहीं’ शब्द शामिल होता है। क्या कभी अपनी प्रार्थना में इच्छाएं पूरी करने की चाह के अलावा ‘पूरी हुई इच्छाओं के लिए धन्यवाद’ किया है। जैसे ही आप अपनी इच्छाओं में ‘नहीं’ शब्द जोड़ते हैं, आपकी चीजें नकारात्मक शक्तियों के साथ जुड़ जाती हैं।

‘ना’ या ‘नहीं’ 

एक प्रेरक प्रसंग के अनुसार भगवान ‘नहीं’ शब्द सुनने से वंचित हैं। इसलिए जब भी आप “हे भगवान! काश कि ऐसा नहीं हो” या “काश कि ऐसा नहीं हो!” सोचते हैं या प्रार्थना करते हैं, तो उस अदृश्य शक्ति के पास ‘नहीं’ को हटाते हुए वह इस रूप में पहुंचती है: "हे भगवान! काश कि ऐसा हो!” या “काश कि ऐसा हो!” दूसरे शब्दों में, इस तरह अनजाने में आप जो नहीं चाहते हैं, वही होने की प्रार्थना कर रहे होते हैं।

बुरी चाह 

जब आप किसी का बुरा चाहते हुए अपना अच्छा करने की सोचते हैं, तो इसका सीधा अर्थ किसी के लिए कुछ ‘नहीं’ करते हुए आपके लिए कुछ करने का होता है। यहां भी अध्यात्म का यह नियम लागू होता है। इसलिए अक्सर आपने देखा होगा और कहा भी जाता है कि बुरा चाहने वालों का खुद ही बुरा होता है।

क्या है इसका वास्तविक अर्थ? 

वास्तविकता की जमीन पर यह कोई चमत्कृत करने वाली चीज या टोटका नहीं है, लेकिन यह आपकी सोच को वह दिशा देता है जो आपके उस काम को पूरा करने के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है। और वह दिशा है सकारात्मक या नकारात्मक सोच।

आप जीवन में निराशा का सामना कर रहे हों, किसी मुश्किल सी लगने वाली चीज को सफलता पूर्वक करना चाहते हों, आपके लिए जो विकट परिस्थितियां ला सकता है, ऐसे व्यक्ति या ऐसी स्थिति से बचना चाहते हों। वहां ‘प्रार्थना’ शब्दों का वह रूप है जो आभासी अस्तित्व के साथ मस्तिष्क के किसी कोने में आपको यह यकीन दिलाता है कि ‘ऐसा हो सकता है’।

किस तरह जुड़ती हैं प्रार्थनाएं आपसे? 

यह एक संभावना आपके लिए उस क्षण में बहुत छोटी ही क्यों ना हो, लेकिन कहीं ना कहीं आपके अंतर्मन को उस कार्य या चाह के सफल होने का विश्वास दिलाती है। यह आपको दोगुने प्रयासों से उस कार्य को करने के लिए प्रेरित करता है और आप ऐसा करते भी हैं। वही प्रयास आपके उस कार्य को सकारात्मक या नकारात्मक रूप में सफल होने की ओर अग्रसर करते हैं।

काश ऐसा होता 

जब आप सोचते हैं “काश ऐसा होता!”।। तो सीधे-सीधे आपके मस्तिष्क तक यह संदेश जाता है कि बहुत संभव है, यह कार्य पूरा हो ही जाए। अचेतन मस्तिष्क में ये आपमें उत्साह भरता है और आप पहले से भी ज्यादा लगन से काम करते हैं। जो उसे हर हाल में सफल बनाता है।

सकारात्मक सोच का प्रभाव 

यह कोई जादू या चमत्कार नहीं होता, बल्कि पूरी तरह आपकी सकारात्मक सोच का प्रभाव होता है। नकारात्मक सोच आपको निष्क्रिय बनाती है, जो हर प्रकार से आपको असफलता देने और मन के विपरीत कार्यों के होने का कारण बनते हैं। इससे ठीक उलट, सकारात्मक सोच आपको विपरीत से विपरीत और कठोर से कठोर परिस्थितियों में भी विजयी बनने के लिए प्रेरित करते हैं। यह आपसे ना सिर्फ कोशिश, बल्कि बार-बार कोशिशें कराता है और अंतत: वही होता है जो आप चाहते हैं।

सफलता और विजय का सूत्र 

विकट परिस्थितियों में भी प्रार्थना करना मनुष्य के लिए संजीवनी बूटी के समान है, जो उसमें मनोनुकूल चीजें होने के लिए उम्मीद की किरण जगाती है। किंतु प्रार्थना हमेशा सिर्फ अच्छे स्वरूप में हो। अपनी अच्छी चाह को सोचें, बुरी चाह को शब्दों का रूप ना लेने दें।

‘ना या नहीं’ के अस्तित्व को हटाएं जीवन से 

आपको पता नहीं चलता कि कब बुरी चाह आपकी सोच में आ जाती है। इस तरह नकारात्मकता को आप अपने जीवन से दूर नहीं रख पाते। इसलिए जब भी प्रार्थना करें या कोई इच्छा स्वयं से या किसी और से प्रकट करें, सोच के शब्दों पर ध्यान दें कि किसी भी वाक्य में ‘ना या नहीं’ शब्द हर रूप में दूर रहे।

हो सकता है संभव 

अभ्यास से यह संभव है। शुरुआत में कई बार आपको लगेगा कि ऐसा कैसे संभव है, पर हर भाषा में वाक्यों के दो स्वरूप होते हैं, एक सकारात्मक और दूसरा नकारात्मक। आप पहले स्वरूप को हर बार उपयोग करने की कोशिश करें। किसी भी वाक्य में ना या नहीं शब्द किसी भी तरह प्रयोग ना करें, जो नकारात्मक वाक्यों की श्रेणी में आएगा।

धन्यवाद की भावना 

लोग अक्सर ‘धन्यवाद’ शब्द का अर्थ ‘औपचारिक व्यवहार’ के लिए लेते हैं, जबकि इससे यह हमारे जीवन में कई बेहद महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाता है, किसी कार्य के सफल संपादन के लिए ‘धन्यवाद ज्ञापन’ का अर्थ है खुद को यह विश्वास दिलाना कि हां, आप ऐसा करने में सक्षम रहे! हो सकता है आप धन्यवाद किसी और को कह रहे हों, किंतु अगर आप ऐसा कह रहे हैं तो निश्चित तौर पर इसलिए क्योंकि आपका कोई काम सफल हुआ है।

इसलिए बहुत ज़रूरी है कि जब भी परेशानियों के बाद उससे निजात मिलने का एहसास आए या कुछ बहुत मुश्किल हल हो जाना समझ आए, तो इसके लिए भगवान, प्रकृति या स्वयं, जिसमें भी आप विश्वास रखते हों, उसे धन्यवाद करना ना भूलें। यह आपका आत्मविश्वास बढ़ाता है और अगली बार आपके सफल होने की संभावनाएं दोगुनी हो जाती हैं। इसमें भी वही सकारात्मक और नकारात्मक सोच की और उसके साथ की स्थितियां पैदा होने के मूल नियम लागू होते हैं। 

 

 

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