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क्यों किया जाता है नवरात्रि में गरबा, जानिए इसकी धार्मिक मान्यताएं

BhaskarHindi.com | Last Modified - October 12th, 2018 19:25 IST

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क्यों किया जाता है नवरात्रि में गरबा, जानिए इसकी धार्मिक मान्यताएं

डिजिटल डेस्क । भारतीय लोगों की किसी भी धार्मिक पर्व या त्यौहार को लेकर कुछ न कुछ विशेषता निश्चित ही होती है। फिर चाहे वो त्यौहार किसी भी धर्म, जाति या सम्प्रदाय से संबंध क्यों न रखते हों लेकिन सभी के बीच एक समानता का भाव अवश्य ही होता है। कोई भी पर्व या त्यौहार अपने अतीत के आधार पर ही मनाया जाता है, उनके अतीत से ही पर्व की सत्यता एवं महत्व का पता चलता है। साथ ही प्रदेश या क्षेत्रों के अनुसार भी लोग त्यौहारों को कुछ ऐसे रिवाजों से जोड़ देते हैं, जो एक बार शुरू हो जाए तो सदियों तक धर्म नीति का रूप धारण कर लेते हैं। उदाहरण के अनुसार नवरात्रि का पर्व शक्ति का पर्व माना जाता है, इन नौ दिनों में माता के नौ अलग-अलग रूपों की पूजा, अर्चना या साधना की जाती है। पूजा-साधना के साथ ही प्रसन्नता प्रकट करने का चलन चल पड़ा है, जिसे गरबा कहा जाता है।

क्या है गरबा खेलने का महत्व ?

नवरात्रि का त्यौहार आने से पहले ही सम्पूर्ण भारत में ही गरबा की व्यवस्था चालू हो जाती हैं। नगर-नगर, ग्राम-ग्राम नवरात्रि के मेले लगने लगते हैं, जहा पर धूमधाम से गरबा नृत्य किया जाता है। आज के चलन के अनुरूप गरबा में गीत गाने के लिए विशेषरूप से प्रसिद्ध गायकों को बहुत सारा सेवा शुल्क देकर आमंत्रित किया जाता है। गायक पूरी रात लोगों का मनोरंजन करते हैं और इनके गीतों पर लोग गरबा करने से थकते भी नहीं हैं। नवरात्रि के पूरे नौ दिन ऐसा ही वातावरण बना रहता है। गरबा का चलन आजकल इतना बढ़ गया है कि जो लोग हिन्दू धर्म से संबंध भी नहीं रखते या जो लोग नवरात्रि का अर्थ भी नहीं जानते वो भी गरबा से मनोरंजन का लाभ लेने से नहीं चूकते हैं।

माता को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है गरबा

वेसे तो आजकल हर गली और चौराहे पर हम नवरात्रि में गरबा की धमक देख सकते हैं और जैसे ही कोई गरबा का नाम लेता है तो मन में सर्वप्रथम भारतीय राज्य गुजरात याद आ जाता है। गरबा गुजरातियों में प्रसिद्ध है। कढ़ाई वाली चोली, सुंदर दुपट्टे लिए महिलाएं और लंबी कुर्ती और धोती में पुरुष, यह गरबा का पारम्परिक आवरण है। आम धारणा की बात करें तो ऐसा कहा जाता है कि नवरात्रि की सभी नौ रातों में माता को प्रसन्न करने के लिए नृत्य किया जाता है। वैसे तो वर्षों से ही हिन्दू मान्यताओं में नृत्य को भक्ति एवं साधना का एक मार्ग बताया गया है।

ये मान्यता प्रचलित हो गई है कि गरबा के माध्यम से सभी माता को प्रसन्न करने का प्रयत्न करते हैं। गरबा का संस्कृत नाम गर्भ-द्वीप है। गरबा के आरंभ में देवी जी के निकट कच्चे घट को फूलों से सुसज्जित कर उसमें जलता हुआ दीप रखा जाता है। इस दीप को ही दीपगर्भ या गर्भ दीप कहा जाता है। किन्तु जैसे-जैसे गर्भ दीप भारत के विभिन्न क्षेत्रों तक पहुंचता गया तो इसके नाम में बदलाव आते गए और अंत में अब ये शब्द ‘गरबा’ बन गया अब सब लोग इस नृत्य को गरबा के नाम से ही जानते हैं, लेकिन गर्भ दीप के जो रीति-रिवाज अतीत में  किए जाते थे, वो आज भी उसी रूप में किए जाते हैं। जैसे कि इस गर्भ दीप के ऊपर एक नारियल रखा जाता है। नवरात्रि की पहली रात गरबा की स्थापना कर उसमें ज्योति प्रज्वलित की जाती है। इसके बाद महिलाएं इसके चारों ओर ताली बजाते हुए फेरे लगाती हैं।

महिलाओं का घूमना अनिवार्य है

इस घेरे में महिलाओं का घूमना अनिवार्य माना गया है। यह प्रथम शुभ नृत्य होता है। लेकिन इसके अलावा यदि आप इस नृत्य को और भी गहराई से जानेंगे तो आपकी इस नृत्य में रूचि और बढ़ती जाएगी। गरबा नृत्य में ताली, चुटकी, खंजरी, डंडा या डांडिया और मंजीरा आदि का उपयोग ताल या सुर देने के लिए किया जाता है। महिलाएं समूह में मिलकर नृत्य करती हैं। इस समयावधि में देवी के गीत गाए जाते हैं।

तथ्यों की बात करें तो गरबा का इतिहास लगभग 70 वर्ष का है। ये आजाद भारत से भी पहले की है। गरबा नृत्य गुजरात और राजिस्थान राज्य की ही शान हुआ करता था और अन्य किसी जगह पर यदि गरबा होता भी था तो केवल मनोरंजन के लिए और वह भी गुजरातियों द्वारा ही। आजादी के बाद जब गुजराती लोगों का अपने प्रदेश से बाहर निकलना चालू हुआ तब उनके साथ यह गरबा नृत्य परंपरा भी अन्य प्रदेशों में पहुंच गई। आज के समय में गरबा को भारत के विश्व प्रसिद्ध नृत्यों में से एक माना जाता है। अब यह कोई आम या साधारण नृत्य नहीं रहा  विश्व भर में इस गरबा नृत्य का प्रचार-प्रसार किया जाता है। 

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