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शीतला अष्टमी: इस दिन लगता है बासी भोजन का भोग, घर में चूल्हा जलाना है वर्जित

March 03rd, 2018 20:44 IST

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। 'शीतला अष्टमी' हिन्दुओं का प्रमुख त्यौहार है, जिसमें शीतला माता का व्रत और पूजन किया जाता है। ये त्यौहार पूरे भारत वर्ष में अलग अलग नाम से मनाया जाता है। शीतला अष्टमी होली कुछ दिन बाद मनायी जाती है। चैत्र मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली सप्तमी तिथि को शीतला सप्तमी और अष्टमी तिथि को शीतला अष्टमी के नाम से जाना जाता है। इस पर्व को 'बसोरा' या बसौड़ा भी कहते हैं। 'बसौड़ा' का अर्थ है- 'बासी भोजन'।

शीतला अष्टमी की तिथि

 इस साल 2018 में शीतला अष्टमी होली के 8 दिन बाद 9 मार्च, शुक्रवार के दिन मनाई जाएगी।

 शीतला अष्टमी पूजन का समय

 पूजन का शुभ मुहूर्त प्रातः 06:41 बजे से सायं 06:21 बजे तक है। मुहूर्त की कुल अवधि 11 घंटे 40 मिनट की है।

 अष्टमी तिथि का प्रारंभ 9th मार्च, शुक्रवार प्रातः 03:44 बजे से होगा। जिसका समापन 10th मार्च, शनिवार प्रातः 06:00 बजे होगा।

इस मंत्र से करें पूजन

वन्देऽहंशीतलांदेवीं रासभस्थांदिगम्बराम्।।

मार्जनीकलशोपेतां सूर्पालंकृतमस्तकाम्।।

कैसे मनाया जाता है बासौड़ा?

शीतला अष्टमी के दिन घर में ताजा भोजन नहीं बनाया जाता। एक दिन पहले ही भोजन बनाकर रख देते हैं, फिर दूसरे दिन तड़के महिलाओं द्वारा शीतला माता का पूजन करने के बाद घर के सब व्यक्ति बासी भोजन को खाते हैं। मान्यता है कि इस दिन के बाद से बासी भोजन खाना बंद कर दिया जाता है। क्योंकि होली से गर्म दिनों की शुरुआत हो जाती है, गर्म दिनों में बासी खाना बीमारियों का कारण बनता है, इसलिए इस दिन आखिरी बार बासी खाना खाया जाता है। मान्यता के अनुसार इस व्रत को करने से देवी प्रसन्न होती हैं और व्रती के कुल में समस्त शीतलाजनित दोष दूर हो जाते हैं। दाहज्वर, पीतज्वर, चेचक, नेत्र विकार तथा अनेक त्वचा रोग भी दूर होते हैं।

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पुराणों में भी है इस दिन का महत्व

इसका विस्तृत उल्लेख पुराणों में मिलता है। शीतला माता का मंदिर वट वृक्ष के समीप ही होता है। शीतला माता के पूजन के बाद वट का पूजन भी किया जाता है। प्राचीन मान्यता है कि जिस घर की महिलाएं शुद्ध मन से इस व्रत को करती हैं, उस परिवार को शीतला देवी धन-धान्य से पूर्ण कर प्राकृतिक विपदाओं से दूर रखती हैं। उत्तरी भारत में जहां इन्हें माता शीतला के नाम से जाना जाता है वहीं दक्षिण भारत में इन्हें देवी पोलेरम्मा व देवी मरियम्मन के नाम से पूजा जाता है।

शीतलाष्टमी के व्रत का महत्व 

शीतला माता की पूजा के दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता। चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ और आषाढ़ के कृष्ण पक्ष की अष्टमी शीतला देवी की पूजा-अर्चना के लिए समर्पित होती है। इसलिए यह दिन शीतलाष्टमी के नाम से विख्यात है। आज के समय में शीतला माता की पूजा स्वच्छता की प्रेरणा देने के कारण महत्वपूर्ण है। ऋतु परिवर्तन होने के कारण मौसम में कई प्रकार के बदलाव आते हैं और इन बदलावों से बचने के लिए साफ सफाई का पूर्ण ध्यान रखना होता है। चेचक रोग जैसे अनेक संक्रमण रोगों का यही मुख्य समय होता है। ऐसे में शीतला माता की पूजा का विधान पूर्णत: महत्वपूर्ण और सामयिक है।

   

वर्जित है गर्म भोजन 

माता शीतला के पूजन में किसी प्रकार की गर्म वस्तु का न तो सेवन किया जाता है और न ही घर में इस दिन चूल्हा आदि जलाया जाता है। यहां तक कि चाय आदि भी नहीं पी जाती तथा पहले दिन बनाया गया भोजन भी बिना गर्म किए खाने की परम्परा है। ठंडी वस्तुएं खाने से ही व्रत पूरा होता है।

बसौड़ा पर्व की पौराणिक कथा


किंवदंतियों के अनुसार बसौड़ा की पूजा माता शीतला को प्रसन्न करने के लिए की जाती है। कहते हैं कि एक बार किसी गांव में गांववासी शीतला माता की पूजा-अर्चना कर रहे थे और गांववासियों ने गरिष्ठ भोजन माता को प्रसादस्वरूप चढ़ा दिया, शीतलता की प्रतिमूर्ति मां भवानी का मुंह गर्म भोजन से जल गया और वे नाराज हो गईं।


उन्होंने कोपदृष्टि से संपूर्ण गांव में आग लगा दी, बस केवल एक बुढ़िया का घर सुरक्षित बचा हुआ था। गांव वालों ने जाकर उस बुढ़िया से घर न जलने के बारे में पूछा तो बुढ़िया ने मां शीतला को गरिष्ठ भोजन खिलाने वाली बात कही और कहा कि उन्होंने रात को ही भोजन बनाकर मां को भोग में ठंडा-बासी भोजन खिलाया। जिससे मां ने प्रसन्न होकर बुढ़िया का घर जलने से बचा लिया।


बुढ़िया की बात सुनकर गांव वालों ने मां से क्षमा मांगी और रंगपंचमी के बाद आने वाली सप्तमी के दिन उन्हें बासी भोजन खिलाकर मां का बसौड़ा पूजन किया।

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शीतला माता के मंदिर 

पूरे भारत वर्ष में शीतला माता के कई मंदिर हैं जैसे- 'शीतला मन्दिर' गुड़गांव हरियाणा, 'शीतला माता मंदिर' सुंदरनगर जिला मंडी हिमाचल प्रदेश तथा 'शीतला माता मंदिर' राजस्थान आदि अधिक प्रसिद्ध हैं।

'नवरात्रि' के पावन दिनों में गुड़गांव वाले शीतला माता के मन्दिर में भक्तों की भीड़ काफी बढ़ जाती है। देश के सभी प्रदेशों से श्रद्धालु यहां मन्नत मांगने आते हैं। लोगों की मान्यता है कि यहां पूजा करने से शरीर पर निकलने वाले दाने, जिन्हें 'माता' और ‘चेचक’ कहा जाता है, नहीं निकलते हैं। इसके अलावा नवजात शिशुओं के बालों का प्रथम मुंडन भी यहां पर ही होता है।

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