MP News: ई-वेस्ट को लेकर एनजीटी ने जताई चिंता, सिर्फ 10 प्रतिशत का वैज्ञानिक तरीके से निपटारा, 4 हफ्ते में रिपोर्ट देने के आदेश

ई-वेस्ट को लेकर एनजीटी ने जताई चिंता, सिर्फ 10 प्रतिशत का वैज्ञानिक तरीके से निपटारा, 4 हफ्ते में रिपोर्ट देने के आदेश
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने भोपाल में ई-कचरे (ई-वेस्ट) को लेकर गंभीर बताया है। ट्रिब्यूनल ने ई-वेस्ट के अवैज्ञानिक निस्तारण और अनियंत्रित प्रसंस्करण के चलते पैदा होने वाली स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का जिक्र किया।

डिजिटल डेस्क, भोपाल। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने भोपाल में ई-कचरे (ई-वेस्ट) को लेकर गंभीर बताया है। ट्रिब्यूनल ने ई-वेस्ट के अवैज्ञानिक निस्तारण और अनियंत्रित प्रसंस्करण के चलते पैदा होने वाली स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का जिक्र किया। एनजीटी ने सरकार, प्रदूषण नियंत्रण अधिकारियों, भोपाल नगर निगम और अन्य विभागों को जवाब देने का निर्देश दिया है।

ट्रिब्यूनल ने मामले की जांच करने और चार सप्ताह के अंदर तथ्यात्मक और की गई कार्रवाई की रिपोर्ट सौंपने के लिए पांच सदस्यों की एक कमेटी बनाई है। सोमवार को न्यायमूर्ति श्यो कुमार सिंह, विशेषज्ञ सदस्य सुधीर कुमार चतुर्वेदी की पीठ के समक्ष सुनवाई हुई। नितिन सक्सेना की याचिका में भोपाल में ई-कचरे के कथित अनुचित निस्तारण, प्रसंस्करण और खुले में जलाने से संबंधित गंभीर चिंताएं उठाई गई। आदेश में कहा गया है कि मप्र में हर साल लगभग 5000 टन ई-वेस्ट पैदा होने का अनुमान है। 2019 में यह आंकड़ा लगभग 500 टन था। छह सालों में लगभग दस गुना बढ़ोतरी हुई। राज्य को देश में ई-वेस्ट पैदा करने वाला नौवां सबसे बड़ा राज्य है। एनजीटी ने 31 अगस्त को मामले की सुनवाई की जिसमें सामने आया कि भोपाल में होने वाले ई-वेस्ट का केवल 10 प्रतिशत ही वैज्ञानिक तरीके से प्रोसेस किया जा रहा। बाकी बचे वेस्ट को गैर कानूनी तरीके से (अवैज्ञानिक) अलग किया जा रहा। लगभग 250 कबाड़ यूनिट्स में गैर-कानूनी तरीके से हैंडल और अलग-अलग किया जा रहा है।

ट्रिब्यूनल ने कहा कि मोबाइल फ़ोन, कंप्यूटर और अन्य इलेक्ट्रॉनिक वेस्ट को खुले में जलाने या गलत तरीके से निपटाने से हवा, पानी और मिट्टी में लेड, मरकरी, कैडमियम और क्रोमियम जैसे ज़हरीले पदार्थ मिल सकते हैं। इनके संपर्क में आने से सेहत को गंभीर खतरा हो सकता है। किडनी, फेफड़े और दिमाग को नुकसान पहुंचने की संभावना है। ट्रिब्यूनल ने इस मामले में सरकार, भोपाल कलेक्टर, मप्र पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड के सदस्य सचिव, बीएमसी कमिश्नर और पर्यावरण, इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक्स, और स्वास्थ्य विभागों के प्रधान सचिवों को पक्षकार बनाया है। सभी संबंधित अधिकारियों को चार हफ़्तों के भीतर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया गया है। इसके साथ ही पांच सदस्यीय समिति में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के भोपाल क्षेत्रीय कार्यालय, सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड, स्वास्थ्य विभाग, इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक्स विभाग और मप्र पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड के प्रतिनिधि शामिल हैं। राज्य पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड समिति के काम में तालमेल बिठाने का कार्य करेगा। मामले में 1 अक्टूबर को अगली सुनवाई होगी।

बच्चों के लिए खतरनाक ई-वेस्ट

एनजीटी ने कहा ई-वेस्ट साइट्स पर कई गलत तरीके अपनाए जाते देखे गए हैं, जिनमें से कबाड़ बीनना , ज़मीन या जलाशयों में कचरा फेंकना , सामान्य कचरे के साथ लैंडफिलिंग, खुले में जलाना या गर्म करना, एसिड बाथ या एसिड लिंचिंग, प्लास्टिक की कोटिंग हटाना और टुकड़े करना उपकरणों को हाथ से खोलना या अलग-अलग करना। एनजीटी ने आदेश में कहा कि पता नहीं है कितने बाल मजदूर अनौपचारिक ई-वेस्ट रीसाइक्लिंग में शामिल हैं। ई-वेस्ट के संपर्क में आने से गर्भावस्था के दौरान और शिशुओं व बच्चों में स्वास्थ्य पर ये बुरे असर पड़ सकते हैं। नवजात शिशुओं पर बुरा असर, जैसे कि मृत बच्चे का जन्म (स्टिलबर्थ) और समय से पहले जन्म की बढ़ी हुई दरें,न्यूरो-डेवलपमेंट (दिमाग का विकास), सीखने और व्यवहार पर असर, खासकर अनौपचारिक ई-वेस्ट रीसाइक्लिंग गतिविधियों से निकलने वाले लेड (सीसे) के कारण, फेफड़ों और सांस लेने की क्षमता में कमी और अस्थमा का ज़्यादा खतरा, जो कई ई-वेस्ट रीसाइक्लिंग साइटों पर मौजूद बहुत ज्यादा प्रदूषित हवा से जुड़ा हो सकता है।

ई-वेस्ट की असल मात्रा सही अनुमान लगाना मुश्किल

ट्रिब्यूनल ने कहा कि ई-वेस्ट की मात्रा का अनुमान लगाने के लिए कोई पक्का और एक जैसा फ़ॉर्मूला नहीं है। जिसके चलते पिछले दो सालों का डेटा साफ़ नहीं है। ई-वेस्ट की असल मात्रा और वैज्ञानिक तरीके से प्रोसेस किए जा रहे हिस्से का सही अंदाजा लगाना मुश्किल है। अनुमान के मुताबिक इंदौर में सालाना ई-वेस्ट उत्पादन लगभग 800 टन , भोपाल में लगभग 415 टन, ग्वालियर में 400 टन और उज्जैन में 315 टन है। आने वाले सालों में यह मात्रा और बढ़ने के भी संकेत हैं। ई-वेस्ट का डेटा अभी भी अनिश्चित है। ई-वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स, 2022 में मैन्युफ़ैक्चरर्स, प्रोड्यूसर्स, रिफ़र्बिशर्स, बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करने वालों और रीसायकलर्स की जिम्मेदारी तय की गई हैं। ई-वेस्ट को रजिस्टर्ड रीसायकलर्स तक पहुँचाना ज़रूरी है। इसके लिए सही रिकॉर्ड रखना होगा। राज्य सरकार की जिम्मेदारी है कि वह डिस्मेंटलिंग और रीसाइक्लिंग के लिए जगह दे, और कर्मचारियों की सेहत और सुरक्षा को लेकर ध्यान दे।

मेडिकल ई-वेस्ट भी जांच के दायरे में

एक्स-रे, सीटी स्कैन, पीईटी स्कैन और अन्य मेडिकल उपकरणों से निकलने वाले ई-वेस्ट के निपटान पर भी एनजीटी ने चिंता जाहिर की। इसकी जांच होनी चाहिए । निर्देश दिया कि जांच समिति में सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड के एक प्रतिनिधि शामिल किया जाए। जिसे रेडिएशन और रेडियोएक्टिव मैटेरियल के निपटान में महारत हासिल हो, ताकि इस पहलू की जांच हो सके। ये भी कहा गया है कि जन-स्वास्थ्य के लिए चिंताजनक 10 रसायन में डाइऑक्सिन, लेड और मरकरी शामिल हैं।

Created On :   2 Sept 2026 1:05 AM IST

Tags

Next Story